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लोकसभा चुनाव 2019: पीएम मोदी की इन अच्छाइयों पर ध्यान भी दीजिए

लोकसभा चुनाव 2019 में अपना मत का इस्तेमाल करने से पहले सही और गलत को ध्यान में रखना होगा। क्योंकि आकार हम उपरी सतेह को देखकर ही वोट दे देते हैं। पीएम मोदी ने बीते सालों में कई अच्छी योजनाओं पर काम किया है। लेकिन फिर भी राहुल गांधी हों, मायावती, तेजस्वी, अखिलेश या फिर लोकसभा चुनाव 2019 में अर्जुन की तरह सत्ता की आंख पर निशाना गड़ाए बैठीं ममता बनर्जी सबने सरकार को नाकाम बताया है।

लोकसभा चुनाव 2019: पीएम मोदी की इन अच्छाइयों पर ध्यान भी दीजिए

आम चुनावों की उल्टी गिनती का साल शुरू हो गया। अगले साल लोकसभा चुनाव 2019 के रंग में देश रंग जाएगा। मोदी सरकार के चार साल बीतने के बाद अपने लोकतांत्रिक समाज में विपक्ष की ओर से सवाल नहीं उठते तो ही हैरत होती। इसलिए राहुल गांधी हों, मायावती, तेजस्वी, अखिलेश या फिर लोकसभा चुनाव 2019 में अर्जुन की तरह सत्ता की आंख पर निशाना गड़ाए बैठीं ममता बनर्जी सबने सरकार को नाकाम बताया है।

अव्वल तो इन सुरों में मीडिया विवेकी ढंग से सुर मिलाना चाहिए था, लेकिन उसने नीर-क्षीर को किनारे रख दिया है। लेकिन मोदी सरकार की कम से कम दो योजनाएं ऐसी हैं, जिन्होंने ना सिर्फ गेम चेंजर बल्कि सामाजिक बदलाव की भूमिका निभाई है। स्वच्छता सीधे-सीधे संस्कृति और परंपरा से जुड़ी है। यूरोप आज भले ही साफ नज़र आ रहा है।

लेकिन कुछ सौ साल पहले तक यूरोप में स्वच्छता की संस्कृति कैसी थी, इस पर सोपान जोशी ने शोधपरक किताब लिखी है जल, थल, मल। इस पुस्तक से गुजरते हुए पता चलता है कि यूरोप कुछ सौ साल पहले तक गंदगी की संस्कृति से लबरेज था। जबकि उसकी तुलना में भारतीय समाज स्वच्छता की अहमियत को समझता था। भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर आदिवासियों के गांवों में जाकर देखिए।

वहां फूस और मिट्टी की झोपड़ियों में भी स्वच्छता दिखेगी। यह शोध का विषय है कि आखिर नगरीय भारतीय समाज में स्वच्छता की सार्वजनिक अवधारणा कब और कैसे बदली। लेकिन यह सच है कि भारतीय समाज में व्यक्तिगत स्वच्छता को लेकर कोई सवाल नहीं रहा है। लेकिन सार्वजनिक स्वच्छता के मामले में भारतीय समाज में एक खास तरह का पिछड़ापन जरूर रहा।

अपने घर को साफ करना और घर के कूड़े को गली में फेंकने का रिवाज भारतीय समाज में रहा है। गांधी जी ने आजादी से ज्यादा जरूरी देश की स्वच्छता को बताया था। गांधी के बाद नरेंद्र मोदी ही पहले राजनेता हैं, जिन्होंने स्वच्छता को राष्ट्रीय अभियान बनाने का संकल्प लिया। 15 अगस्त 2014 को स्वतंत्रता दिवस के अपने पहले ही संबोधन में जिस तरह उन्होंने देश को खुले में शौच मुक्त करने के अभियान की रूपरेखा पेश की, वह हैरत में डालने वाली थी।

सुलभ नाम से देश में स्वच्छता की संस्कृति को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभा चुके बिंदेश्वर पाठक मोदी के इस कदम को क्रांतिकारी बताते हुए नहीं थकते हैं। इस उद्बोधन में मोदी ने गांधी जी की डेढ़ सौंवी जयंती पर देश को पूरी तरह खुले में शौच से मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। 2 अक्टूबर 2014 को उन्होंने दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर से स्वच्छता अभियान की शुरूआत की।

इसका असर स्वच्छता की संस्कृति में बदलाव के तौर पर नजर आने लगा है। अब बच्चे तक सड़कों पर थूकने या कूड़ा फेंकने वाले को टोक देते हैं। इसलिए अब लोग गंदगी फैलाने की अपनी अवचेतन तक में बैठी आदत के सार्वजनिक इजहार से बचने लगे हैं। संस्कृति में बदलाव का असर बरसों बाद दिखता है। क्योंकि यह सीधे-सीधे सोच के बदलाव का मसला है।

पुरानी पीढ़ी की सोच इतनी आसानी से नहीं बदलती, इसीलिए स्वच्छता अभियान की पूरी कामयाबी नजर नहीं आ रही। लेकिन बाद की पीढ़ियों ने इसे लेकर सचेतन रूख जरूर अख्तियार किया है। अंग्रेजों ने हमारे यहां जिस नौकरशाही तंत्र का विकास किया है, जिसे लौह आवरण कहा जाता है। जिस पर सरकारी योजनाओं को ईमानदारी से लागू करने की जिम्मेदारी है, उसके लिए स्वच्छता अभियान निश्चित तौर पर फोटो खींचने का जरिया बन गया है।

मोदी सरकार को इस पर काबू पाने के लिए जरूरी कदम उठाने होंगे। सरकारी तंत्र में तो आलोचनाएं भी होने लगी हैं कि मोदी ने उन्हें झाड़ू पकड़ने के लिए मजबूर कर दिया। बहरहाल करीब 68 फीसद ग्रामीण जनसंख्या और गरीबी रेखा से नीचे जीने वाले करीब 40 करोड़ लोगों वाले देश में यह संकल्प चुनौतीपूर्ण है। देश में करीब छह लाख 40 हजार गांव हैं।

मोदी सरकार का दावा है कि चार साल के कार्यकाल में तीन लाख 60 हजार से ज्यादा गांवों के साथ ही 17 केंद्र शासित प्रदेश एवं राज्य खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। 2014 में स्वच्छता कवरेज का जो आंकड़ा 38.7 प्रतिशत था, वह बढ़कर 83.17 प्रतिशत हो गया है। इन चार सालों में करीब सवा सात करोड़ शौचालय बनाए गए हैं। मोदी सरकार की गेम चेंजर योजना उज्ज्वला है।

2016 के मजदूर दिवस को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से शुरू उज्ज्वला योजना इस तथ्य की गवाह है कि ईमानदारी से पूरी तरह किसी योजना को लागू किया जा सकता है। भारतीय महिलाओं की आधी जिंदगी चूल्हे के धुएं में अपने फेफड़ों को जलाते, हिलाते गुजरती रही है। इन महिलाओं के दर्द को मोदी सरकार ने समझा और उज्ज्वला योजना की शुरूआत की।

शुरू में इस योजना के तहत मोदी सरकार ने तीन साल में पांच करोड़ गैस कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा था, जिनमें से 3.8 करोड़ कनेक्शन दिए जा चुके हैं। जिसे अब पांच से बढ़ाकर साल 2020 तक 8 करोड़ कनेक्शन कर दिया गया है। इस योजना को ईमानदारी से लागू करने का ही असर है कि महिलाओं की नजर में मोदी ज्यादा भरोसेमंद नजर आ रहे हैं।

इसके लिए सरकार ने शुरू में तो पैसे का इंतजाम किया, लेकिन बाद में उसने समर्थ लोगों से गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील की। अब तक डेढ़ करोड़ लोग अपनी गैस सब्सिडी छोड़ चुके हैं। हालांकि इस योजना की खामी यह है कि गरीब महिलाओं के पास बाद में हमेशा गैस भरवाने का पैसा नहीं रहता। सरकार को इसकी तरफ भी ध्यान देना होगा।

केंद्र सरकार की एक और बड़ी योजना कामयाबी के शिखर छू रही है। आज देशभर में कहीं जाना रेलमार्ग से भले ही कठिन हो, सड़क मार्ग से बेहद आसान हो गया है। अब देश में राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क का विस्तार तेजी हो रहा है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने से पहले जहां रोजाना 12 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग बन रहे थे, वहीं अब रोजाना 27 किलोमीटर राजमार्ग बन रहे हैं।

राजमार्ग मंत्रालय संभालने वाले नितिन गडकरी की योजना इसके लिए रोजाना 40 किलोमीटर का लक्ष्य तय करना है। उनका मानना है कि लक्ष्य बड़ा होगा तो असफल होने पर भी परिणाम बड़े निकलेंगे। इसी तरह ग्रामीण सड़कों का भी लगातार विस्तार हुआ है।

भाजपा की सरकार बनने से पहले तक जहां 52 प्रतिशत गांव ही बारहमासी सड़कों से जुड़े थे, अब उनकी संख्या 82 प्रतिशत हो गई है। इससे गांवों तक परिवहन बढ़ रहा है। हालांकि गांवों तक खरीददारों की पहुंच वैसी नहीं बढ़ी है, जैसी उम्मीद की जा रही थी। इसलिए इस पर ध्यान देना होगा।

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