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लोकसभा चुनाव 2019 : एक बार फिर निकला 'भारत में असहिष्णुता' का जिन्न

बाल मुकुन्द ओझा | UPDATED Jan 15 2019 12:09PM IST
लोकसभा चुनाव 2019 : एक बार फिर निकला 'भारत में असहिष्णुता' का जिन्न

सहिष्णुता पर एक बार फिर भारत में सियासत गरमा गई है। इस बार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के देश से बाहर दिए एक भाषण से राजनीतिक पारा उफान पर है। संयुक्त अरब अमीरात  के दौरे पर गए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भारत में असहिष्णुता का राग फिर छेड़ा और बीजेपी पर निशाना साधा। दुबई में भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित करते हुए राहुल ने कहा कि संयुक्त अरब अमीरात और भारत के लोगों को साथ लाने वाले मूल्य विनम्रता और सहिष्णुता हैं। विभिन्न विचारों, धर्मों और समुदायों के लिए सहिष्णुता। उन्होंने कहा कि साल 2019 सहिष्णुता का साल है।

राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर हमला करते हुए कहा कि पिछले साढ़े चार सालों में भारत में असहिष्णुता बढ़ी है। भाजपा ने पलटवार करते हुए विदेशी धरती पर दिए भाषण को भारत विरोधी करार दिया है। सहिष्णुता भारतीय जनजीवन का मूलमंत्र है। मगर देखा जा रहा है कि समाज में सहिष्णुता समाप्त होती जार ही है और लोग एक दूसरे के खिलाफ विषाक्त वातावरण बना रहे हैं।

जिससे हमारी परम्पराओं के नष्ट होने का खतरा मंडराने लगा है। सहिष्णुता को लेकर इस समय देश की सियासत गरमाई हुई है। नेताओं के जहरीले बयानों और भाषणों से वातावरण विषाक्त हो रहा है। इससे हमारी लोकतांत्रिक परम्पराएं कमजोर और क्षतिग्रस्त हुई हैं।

प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर विराजमान व्यक्तियों सहित देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए जिस प्रकार की शब्दावली का उपयोग हो रहा है वह हम सब के लिए बेहद चिंताजनक और निराशाजनक है।

सोशल मीडिया इसमें सबसे आगे है। जहां ऐसे-ऐसे शब्दों को देखा जा रहा है जिनकों इस आलेख में लिखा जाना कतई मुनासिब नहीं है। इसके लिए कोई एक पक्ष दोषी नहीं है। इस मैली गंगा में सभी अपना हाथ धो रहे हैं। इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर हो रही बहस घृणास्पद और निम्नस्तरीय है।

इस वर्ष देश में लोकसभा चुनाव होने जा रहे हैं और ऐसे समय में एक बार फिर सहिष्णुता और असहिष्णुता को लेकर नेताओं के भाषण से सियासी पारा चढ़ने लगा है। सहिष्णुता का अर्थ है सहन करना और असहिष्णुता का अर्थ है सहन न करना।

सब लोग जानते हैं कि सहिष्णुता आवश्यक है और चाहते हैं कि सहिष्णुता का विकास हो। सहिष्णुता केवल उपदेश या भाषण देने मात्र से नहीं बढ़ेगी। जीवन में आगे बढ़ने के लिए सहनशील होना आवश्यक है। सहनशीलता व्यक्ति को मजबूत बनाती है,

जिससे वह बड़ी से बड़ी परेशानी का डटकर मुकाबला कर सकता है। अक्सर देखा जाता है हम छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा कर देते हैं, जिससे बात आगे बढ़ जाती है और अनिष्ट भी हो जाता है। ऐसी ही छोटी-छोटी बातों को मुस्कुराते हुए सुनने वाला व्यक्ति ही सहनशील है।

सहनशीलता का शब्दिक अर्थ है शरीर और मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता को सहन करना। मानव व्यक्तित्व के विकास और उन्नयन का मुख्य आधार तत्व सहिष्णुता है। स्वयं के विरूद्ध किसी भी आलोचना को स्वीकार नहीं करना मोटे रूप में असहिष्णुता है।

सहिष्णुता मनुष्य को दयालु और सहनशील बनाती है वहीं असहिष्णुता मनुष्य को अहंकारी बनाती है। अहंकार अंधकार का मार्ग है जो मनुष्य और समाज का सर्वनाश कर देती है। सहिष्णुता ही लोकतंत्र का प्राण है।

मनुष्य को सहनशील और संस्कारी बनाने के लिए प्रारम्भ से ही सहिष्णुता की शिक्षा दी जानी चाहिये ताकि वे बड़े होकर चरित्रवान और संस्कारी बने। हम बड़ी-बड़ी बातें सहनशीलता की अवश्य करते हैं मगर उस पर अमल नहीं करते।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने कथनी और करनी के भेद को मिटाकर सही मायनों में  सहिष्णुता को अपनाएं तभी देश और समाज को आगे बढ़ा पाएंगे।


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