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लोकसभा चुनाव 2019: फेक न्यूज को लेकर सोशल मीडिया पर उठते सवाल?

इंटरनेट क्रांति के वर्तमान दौर में सोशल मीडिया का वर्चस्व लगातार बढ़ते जा रहा है। यह एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा विचारों और योजनाओं को कुछ ही मिनटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। आज के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षणिक एवं सभी प्रकार के विकास में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। सोशल मीडिया आज आम आदमी के जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, परंतु अब इस मीडिया का नाकारात्मक स्वरूप भी बड़ी तेजी से उभर कर सामने आने लगा है।

लोकसभा चुनाव 2019: फेक न्यूज को लेकर सोशल मीडिया पर उठते सवाल?

इंटरनेट क्रांति के वर्तमान दौर में सोशल मीडिया का वर्चस्व लगातार बढ़ते जा रहा है। यह एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा विचारों और योजनाओं को कुछ ही मिनटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। आज के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षणिक एवं सभी प्रकार के विकास में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। सोशल मीडिया आज आम आदमी के जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, परंतु अब इस मीडिया का नाकारात्मक स्वरूप भी बड़ी तेजी से उभर कर सामने आने लगा है। कुछ सोशल मीडिया प्लेटफार्म में सक्रिय यूजर्स के अवांछनीय गतिविधियों के चलते यह मीडिया अपनी विश्वसनीयता खोने लगी है। फेसबुक, वॉट्सएप और इंस्टाग्राम जैसे अनेक सोषल मीडिया प्लेटफार्म दुष्प्रचार, फेक न्यूज, आपत्तिजनक और अश्लील कटेंट्स के चलते सवालों के घेरे में है।

इस मीडिया की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें उपलब्ध सूचनाओं के विश्वसनीयता और संपादन की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। फलस्वरूप यह अनियंत्रित हो चुका है। इन सोशल साइट्स की आलोचना इस बात पर भी हो रही है कि वे गलत जानकारी को रोकने में लगभग नाकाम हैं। सोशल मीडिया में कुछ लोग नफरत फैलाने व गाली-गलौच की सीमा को लांघ चुके हैं। दुनिया भर में फेक न्यूज चिंता का विशय बनी हुई है। विभिन्न देशों की सरकारें फेक न्यूज के असर और समाज में इससे फैलने वाली अशांति से परेशान है। चुनावों के दौरान फेक न्यूज को कई राजनीतिक दल हथियार भी बनाते हैं। वहीं, इससे सौहाद्र बिगड़ने के भी कुछ मामले सामने आए हैं।
सोशल मीडिया से जुड़े एक अधीनस्थ अधिकारी का कहना है कि इंटरनेट किसी सुचारू रूप से चल रहे लोकतांत्रिक ढांचे को बहुत हद तक नुकसान पहुंचा सकता है। आलम यह है कि इस मीडिया में देष के महापुरूशों और अधीनस्थ राजनेताओं के बारे में बेहद आपत्तिजनक सूचनाएं तथा एडीटेड व फेक फोटो एवं वीडिया पोस्ट किए जा रहे हैं। सायबर अपराध इस मीडिया से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि देश में इससे निबटने के लिए अनेक आईटी कानून मौजूद है। बावजूद इस पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा है। विगत पारंपरिक मीडिया की घटती साख के बीच सोशल मीडिया से लोगों को निष्पक्ष और विश्वसनीय सूचनाएं मिलने की अपेक्षा थी, लेकिन अब लोग निराश होने लगे हैं। बहरहाल भारत जैसे विकासशील देश में सोशल मीडिया का जूनून लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है।
यह एक ऐसा प्लेटफार्म है जिसमें सभी धर्म, जाति, उम्र तथा आर्थिक हैसियत वालों को वैचारिक स्वतंत्रता मिली हुई है। नि:संदेह पिछले डेढ़ दशक में सोशल मीडिया ने भारत के सामाजिक स्वरूप और मानव स्वभाव में बड़े बदलाव किए हैं। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआईएमएआई) के पिछले साल की रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर छह माह में सोशल मीडिया यूजर्स की संख्या 17–18 फीसदी की दर से बढ़ रही है, जो कि दुनिया में सबसे ज्यादा है। भारत में सोशल मीडिया यूजर्स की कुल संख्या 50 करोड़ से उपर पहुंच गयी है, इनमें से फेसबुक से 27 करोड़, व्हाटसएप से 20 करोड़ तथा ट्विटर से 3.3 करोड़ यूजर्स जुड़े हुए हैं। छत्तीसगढ़ में लगभग 1.70 करोड़ लोग सोषल मीडिया से जुड़े हुए हैं। इसका मतलब देश की लगभग आधी आबादी बड़ी तेजी से एक ऐसे समाज में तब्दील हो रहा है जो सोशल मीडिया के जरिए ही अपने सामाजिक सारोकारों को पूरे कर रहे हैं।
वैसे तो सोशल मीडिया से सभी आयु के लोग जुड़े हुए हैं परंतु इस मीडिया के उपयोग में युवा वर्ग सबसे आगे हैं जो देश के भविष्य के साथ–साथ विकास और बदलाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। एक शोध के मुताबिक देश के 84 फीसदी युवा सोशल मीडिया प्लेटफार्म से जुड़े हुए हैं। संचार की इस नई तकनीक ने एक नई दुनिया को जन्म दिया है जिसे आभासी दुनिया या वर्चुअल वर्ल्ड का नाम दिया गया है। यह एक ऐसी तकनीक है जिसने युवाओं के बीच देष, भाशा, धर्म, जाति व लिंग के बंधनों को खत्म कर दिया। सोशल मीडिया इस दौर की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है, जिसने पारंपरिक मीडिया की ताकत को भी विभाजित कर दिया है। नि:संदेह युवाओं के जीवन में सोशल मीडिया नेटवर्किंग साइट्स ने क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है लेकिन इस माध्यम का स्याह पक्ष युवाओं के लिए अब ज्यादा घातक साबित होने लगा है।
सोशल मीडिया का नकारात्मक प्रभाव देश के राजनीतिक, सामाजिक समरसता और कानून व्यवस्था पर दृष्टिगोचर होने लगा है। चूंकि देश की बहुत बड़ी आबादी युवाओं की है इसलिए वे कई राजनीतिक और धार्मिक संगठनों के निशाने पर है। अनेक धार्मिक, जातिवादी और अलगाववादी चरमपंथी संगठन इस मीडिया का दुरूपयोग युवाओं को गुमराह करने, उनमें धार्मिक व जातिवादी कट्टरता का बीज बोने में कर रहे हैं। संप्रेशण और सूचना का सबसे बड़ा साधन सोषल मीडिया धर्म और राजनीति के लिए दोधारी तलवार साबित हो रही है। देष में घटित कई आतंकी घटनाओं, जातिगत तथा धार्मिक दंगों में युवाओं की संलिप्तता के पीछे सोषल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस मीडिया की बढ़ती लत की चलते युवाओं के ‘शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ रहा है।
एक शोध के मुताबिक भारतीय युवा अपना 70 फीसदी समय सोशल मीडिया पर बीता रहे हैं जबकि अमरीका जैसे विकसित देष में यह मात्र 30 फीसदी है। विडंबना यह भी कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स जहां लोगों को उनके पुराने मित्रें व रिश्तेदारों से मिला कर खुश कर रहा है वहीं लोगों के वैवाहिक, पारिवारिक, सामाजिक, शारीरिक एवं मानसिक अवस्थाओं पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। ब्रिटेन के एक लॉ एडवाइजर कंपनी ने हाल ही में यह खुलासा किया है कि दुनिया भर में अपने साथी के सोशल नेटवर्किंग साइट में अत्याधिक समय बीताने से उबकर तलाक लेने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। सोशल मीडिया के चलते दरकते वैवाहिक संबंधो का अंदाजा‘स्लेटर एंड गॉर्डन लॉयर्स’के इस अध्ययन से लगाया जा सकता है कि शीर्षस्थ सोशल नेटवर्किंग प्लेटफार्म ‘फेसबुक’ वैवाहिक संबंधो को बिगाड़ने में सबसे उपर है।
अध्ययन के अनुसार आधे लोग अपने जीवन साथी की फेसबुक गतिविधियों की गुप्त रूप से पड़ताल करते पाए गए। वेबसाइट ‘गीकवायर डॉट कॉम’ के अनुसार एक रिसर्च में शामिल 25 फीसदी लोगों ने कहा कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर उनके साथी से हफ्ते में एक बार जरूर झगड़ा होता है। इसी तरह 17 फीसदी लोगों ने बताया कि अपने साथी के बारे में सोशल मीडिया में मिले किसी न किसी चीज से उनके बीच हर रोज झगड़ा होता है। चौंकाने वाला तथ्य यह कि सोशल मीडिया से जुडे़ दंपत्ति या प्रेमी युगल में से 58 फीसदी लोग अपने पार्टनर के सोशल मीडिया अकाउंट पर गोपनीय रूप से नजर रखते हैं।
सोशल मीडिया के चलते जहां लोगों के रिश्तो पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है वहीं महिलाओं की निजता भी खतरे में है, एक शोध के अनुसार 85 फीसदी फेसबुक यूजर महिलाएं ऐसी है तो अपने दोस्तों से परेशान है। युवाओं और किषोरों के लगातार सोषल मीडिया एडिक्ट होने का दु”परिणाम यह हो रहा है कि वे समाज और परिवार से कटने लगे हैं, इन परिस्थितियों का सर्वाधिक खामियाजा परिवार के बुजुगोंर् को उठाना पड़ रहा है। एक ‘शोध के मुताबिक देष के 78 फीसदी बुजुर्गों ने कहा है कि मोबाईल, कम्प्यूटर, इंटरनेट व सोषल मीडिया के चलते उनके बच्चे और नाती–पोते उनकी ओर ध्यान नहीं दे पाते फलस्वरूप वे अपने आप को उपेक्षित और अकेला महसूस करने लगे हैं। बहरहाल यह कितना विरोधाभाष है कि जो तकनालॉजी हमे दुनिया से जोड़ती है वही अपनों से जुदा भी कर रही है।
सोशल मीडिया सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन को ही प्रभावित नहीं कर रहा है अपितु इसका असर देश और दुनिया के राजनीतिक परिदृष्य में भी दृष्टिगोचर होने लगा है। आज भारत ही नहीं वरन समूची दुनिया में सोशल मीडिया राजनीतिक दलों और राजनेताओं के लिए जनसंपर्क और प्रचार के लिए बहुत बड़ा माध्यम बन चुका है। दुनिया भर के राजनेता सोषल मीडिया पर आम लोगों से सीधा संवाद कर रहे हैं वहीं इन राजनेताओं व सरकार के ट्विटर पर उपलब्ध बयानों व निर्णयों को आधिकारिक मान्यता भी प्राप्त है। अमूमन हर राजनीतिक दलों के अपने आईटी सेल हैं जो अपनी हैण्डल्स के द्वारा पार्टी की विचारधारा, योजनाओं व कार्यक्रमों को सोषल मीडिया के माध्यम से लाखों यूजर तक निरंतर पहुंचा रहे हैं। लेकिन इसके आड़ में राजनीतिक दलों से जुड़े लोग विभिन्न सोषल साइट्स में फर्जी अकाउंट व ग्रुप बनाकर लोगों को दिग्भ्रमित भी कर रहे हैं।
पिछले साल फेसबुक ने 58 करोड़ फर्जी एकाउंट को बंद किया था तथा 83.7 करोड़ आपत्तिजनक और भ्रामक पोस्ट को हटाया था। सैंकड़ों ऐसे खातों को बंद किया है जो फेक और हेट न्यूज को शेयर करते थे। इस साल फरवरी में ही फेसबुक ने जानकारी दी है कि उसके पास अभी भी 25 करोड़ से ज्यादा फर्जी खाते हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि सोषल मीडिया के चलते यूजर्स की निजता भी संकट में है। गूगल सर्च इंजन के अलावा तमाम ऐसे सोशल साइट्स है जिनके पास लोगों की निजी जानकारियां हैं।
विडंबना यह है कि इन साइट्स ने निजी जानकारियां लोगों से गोपनीयता कायम रखने की भरोसे पर ली थी, परन्तु ये साइट्स अपने व्यवसायिक हितों के चलते यूजर्स की डेटा अनेक ऐसे संस्थानों को दे रहे हैं जो इनका उपयोग चुनाव प्रचार सहित दूसरे अभियानों में कर रहे हैं। 2016 के अमरीकी चुनाव और ब्रिटेन के बे्रग्जिट के लिए हुए जनमत संग्रह के अलावा नाइजीरिया, केन्या, ब्राजील और भारत के चुनाव प्रचार अभियान में डेटा लीक के द्वारा जनमत प्रभावित करने के दावे भी किए गए हैं। डेटा लीक के चलते अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देषों ने फेसबुक पर सख्ती भी बरती है। दूसरी ओर ऑक्सफर्ड युनिवर्सिटी के एक शोध में खुलासा किया गया है कि सोषल मीडिया के द्वारा भारत जैसे देशों के चुनावों को प्रभावित किया जा सकता है।
गौरतलब है कि हाल ही में फेसबुक ने प्रमुख राजनीतिक दलों से जुड़े सैकड़ों पेज को अपने प्लेटफार्म से हटाया है। चुनाव आयोग की सख्ती के चलते भारत में सोशल मीडिया चुनाव प्रचार अभियान का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है। हालांकि चुनाव आयोग की सोषल मीडिया में इलेक्षन कैम्पेनिंग पर पैनी निगाह है लेकिन इसके बावजूद इस पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पाया है। विचारणीय है कि भले ही इंटरनेट ने विकास को नए आयाम दिए हों लेकिन सोषल मीडिया का बढ़ता दुष्प्रभाव और बेढंगापन सरकार और समाज दोनों के लिए चिंता का विशय है।
इन परिस्थितियों के चलते देष को सशक्त डेटा सुरक्षा तंत्र और आईटी कानून में सुधार की जरूरत है क्योंकि विगत दो दशकों में सूचना प्रौद्योगिकी में हुए बदलाव के चलते अब ये अपर्याप्त है। हालांकि भारत सरकार ने सोशल मीडिया पर नकेल कसने के लिए‘सोशल मीडिया कम्यूनिकेशन हब’गठन करने का फैसला लिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सरकार ने अपने कदम वापस खींच लिए। बहरहाल वर्तमान परिवेष में यदि सोषल मीडिया देष के लोकतंत्र, कानून–व्यवस्था, सामाजिक और पारिवारिक समरसता और युवाओं के बेहतरी के रास्ते में बाधक बनने लगा है तो इस पर सवाल उठना लाजमी है।
-लेखक, शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, रायपुर में सहायक प्राध्यापक हैं।
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