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हिंदू-मुस्लिम के बीच फंसी कांग्रेस को चाहिए तिनके का सहारा

कांग्रेस पिछले तीस सालों से अजीब दौर से गुजर रही है। जब भी हिंदू मुस्लिम का कोई मुद्दा आता है तो उसे समझ में नहीं आता कि वह क्या करे। नतीजा यह होता है कि उसके नेता परस्पर विरोधी बातें बोलते हैं।

हिंदू-मुस्लिम के बीच फंसी कांग्रेस को चाहिए तिनके का सहारा

कांग्रेस पिछले तीस सालों से अजीब दौर से गुजर रही है। जब भी हिंदू मुस्लिम का कोई मुद्दा आता है तो उसे समझ में नहीं आता कि वह क्या करे। नतीजा यह होता है कि उसके नेता परस्पर विरोधी बातें बोलते हैं। दिग्विजय सिंह और मणिशंकर अय्यर के बाद इस कड़ी में नया नाम जुड़ा है शशि थरूर का।

थरूर का कहना है कि यदि 2019 में भाजपा की सरकार फिर बनी तो भारत हिंदू पाकिस्तान बन जाएगा। यह कांग्रेस की सत्तर साल पुरानी रणनीति है कि मुसलमान का वोट लेना है तो उसे हिंदुओं का भय दिखाओ। वह चाहते तो कह सकते थे कि नरेन्द्र मोदी फिर जीते तो देश को हिंदू राष्ट्र बना देंगे। पर इसकी बजाय हिंदू पाकिस्तान का इस्तेमाल भय पैदा करने के लिए है।

आजादी के सत्तर सालों में मुस्लमान को कुछ देने या उसकी शिक्षा, रोजगार और गुरबत की समस्याओं को हल करने की जिम्मेदारी से बचने के लिए कथित घर्मनिरपेक्ष पार्टियां उसे डराती रही हैं कि पहले यह चिंता करो कि जिंदा कैसे रहोगे। बाकी मसले तो जिंदा रहने के बाद के हैं। जिंदा रहना है तो हमें वोट दो।

जनता पार्टी और राज्यों में सत्ता को छोड़ दें तो भाजपा दस साल केंद्र में सत्ता में रही। 2002 के गुजरात दंगे को छोड़कर उसके राज में कोई बड़ा दंगा नहीं। साल 2014 के लोस चुनाव के समय इसी गुजरात दंगे का डर दिखाकर गैर भाजपा दल डर का ऐसा माहौल पैदा कर रहे थे कि मोदी के आते ही मुसलमानों को देश छोड़ना पड़ेगा।

चार साल के मोदी राज में मुस्लिम समुदाय के विकास के लिए जितना काम हुआ है उतना शायद ही किसी और सरकार के समय हुआ हो। शशि थरूर के बयान को हालांकि कांग्रेस ने उनका निजी विचार कहके पल्ला झाड़ लिया है लेकिन यह वास्तविकता नहीं है। थरूर ने जो कहा है वह कांग्रेस की सोच में रचा बसा है।

आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार को रोकने का जवाहर लाल नेहरू ने हर संभव प्रयास किया। उसके उद्घाटन समारोह में उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद को जाने से मना किया। वह नहीं माने तो नेहरू उनके जीवित रहने तक ही नहीं उनके मरने के बाद भी उनसे नाराज रहे। भारत के पहले राष्ट्रपति को पद से हटने के बाद न तो आवास की सुविधा मिली और न ही इलाज की।

उनकी मौत के समय नेहरू राजस्थान के दौरे पर थे। राजेन्द्र बाबू के अंतिम संस्कार में खुद तो गए नहीं बल्कि राजस्थान के राज्यपाल सम्पूर्णानंद को भी नहीं जाने दिया। उन्होंने सम्पूर्णानंद से कहा कि तुम्हारे राज्य में देश का प्रधानमंत्री है तुम राज्य कैसे छोड़ सकते हो। इतना ही नहीं सरदार पटेल की मौत के बाद केएम मुंशी ने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का काम पूरा कराने का संकल्प लिया तो नेहरू ने नाराज होकर उनसे कहा कि तुम हिंदू पुनर्जागरण का काम कर रहे हो।

नेहरू अपने को अक्सर ऐक्सीडेंटल हिंदू कहते थे। शाहबानो के मसले पर राजीव गांधी की सरकार ने क्या किया और उसका क्या हश्र हुआ सबको पता है। अतीत से निकल कर निकट वर्तमान में आएं तो यूपीए सरकार के दस सालों में कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद का शिगूफा छोड़ा। फिर उसको सच साबित करने के लिए बड़े पैमाने पर षड्यंत्र रचा गया। लोगों को झूठे मामलों में फंसाया गया।

उन्हें मारपीट का मन मुताबिक बयान दिलवाया गया। अपने उद्देश्य को हासिल करने के लिए मनमोहन सिंह की सरकार ने देश की दो प्रीमियर एजेंसियों सीबीआई और इंटेलिजेंस ब्यूरो को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया। यहां तक कि आईबी के एक स्पेशल डायरेक्टर को गिरफ्तार करवाने और जेल भिजवाने का असफल प्रयास किया।

सिर्फ इसलिए कि वह अधिकारी गलत काम करने या तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदम्बरम के मुताबिक कुछ लोगों को जबरन फंसाने के लिए तैयार नहीं हुआ। चिदम्बरम के बाद गृह मंत्री बने सुशील कुमार शिंदे ने तो कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में कह दिया कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा हिंदू आतंकवादियों को हथियार चलाना सिखाने का प्रशिक्षण शिविर चलाते हैं।

मंच पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह सहित कांग्रेस के सारे वरिष्ठ नेता मौजूद थे। किसी ने उन्हें टोका नहीं। यह अलग बात है कि भाजपा के विरोध के कारण शिंदे को इस बयान के लिए संसद में माफी मांगनी पड़ी। गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी को मंदिर मंदिर घुमाने के बाद कांग्रेस को यह डर सता रहा है कि लोकसभा चुनाव में मुस्लमान उससे छिटक न जाय।

इस डर से बचने के लिए वह मुसलमानों को डरा रही है। यह कोई इत्तफाक नहीं कि राहुल गांधी के मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मिलने और शशि थरूर के बयान में महज कुछ घंटों का अंतराल है। राहुल गांधी ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों से माफी मांगी और कहा कि कांग्रेस पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई थी। अब ऐसा नहीं होगा। कांग्रेस की हालत नदी में डूबते हुए उस आदमी की तरह है जो बचने के लिए हाथ पैर मार रहा है।

इस कोशिश में उसे तिनका भी सहारे जैसा लग रहा है। पिछले चार साल से कांग्रेस लगातार ढलान की ओर है। पंजाब को छोड़ दें तो वह किसी बड़े राज्य में अकेले सत्ता में नहीं है। कर्नाटक में मतदाता ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया था पर पिछले दरवाजे से वह वापस आ गई है। इस बार के लोकसभा चुनाव न केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि राहुल गांधी का राजनीतिक अस्तित्व दांव पर लगा है।

उन्हें साबित करना है कि वे पार्टी को वोट दिला सकते हैं। अभी तक राहुल गांधी इस कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं। साल 2019 का लोकसभा चुनाव उनके लिए आखिरी मौका भी हो सकता है। कांग्रेस इस समय हताशा के दौर से गुजर रही है। राष्ट्रीय जनता दल के अलावा कोई विपक्षी दल राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

उसका जनाधार बढ़ना तो दूर, जो है वह भी खिसक रहा है। शशि थरूर के बयान को इसी रोशनी में देखना चाहिए। कांग्रेस की बढ़ती हताशा उसके नेताओं से ऐसे बयान दिलवा रही है। दरअसल उसके पास कोई वैकल्पिक राष्ट्रीय विमर्श नहीं है जिसके आधार पर वह भाजपा और मोदी का मुकाबला कर सके। उसी कमी को पूरा करने के प्रयास में कांग्रेस के नेता ऐसे बेतुके और देश का मान घटाने वाले बयान दे रहे हैं। इससे कांग्रेस को केवन नुकसान ही होगा।

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