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लोकसभा व विधानसभा चुनाव साथ होना जरूरी, चुनावों को लोकतंत्र के महाकुंभ की संज्ञा

भारत में चुनावों को लोकतंत्र के महाकुंभ की संज्ञा दी जाती है। यहां लोकसभा और विधानसभाओं के लिए होने वाले चुनाव उत्साव का रूप ले लेते हैं।

लोकसभा व विधानसभा चुनाव साथ होना जरूरी, चुनावों को लोकतंत्र के महाकुंभ की संज्ञा
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भारत में चुनावों को लोकतंत्र के महाकुंभ की संज्ञा दी जाती है। यहां लोकसभा और विधानसभाओं के लिए होने वाले चुनाव उत्साव का रूप ले लेते हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान देश में 81.4 करोड़ पात्र मतदाता थे, जो कि अमेरिका में मतदाताओं की संख्या के करीब तीन गुना ज्यादा हैं, लेकिन ये चुनाव न सिर्फ खर्चीले होते हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर मानव संसाधन की भी जरूरत होती है। इन समस्याओं को देखते हुए देश में बार-बार यह प्रश्न उठता रहा है कि क्यों न लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं? उम्मीद की जा रही है कि आगामी 2019 से देशभर में एक साथ चुनाव होने लगेंगे। इस संबंध में केंद्र सरकार एक कानून भी लाने की तैयारी में है।

दरअसल, कार्मिक, लोक शिकायत और विधि एवं न्याय संबंधी राज्यसभा की स्थाई समिति ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने की संभावना के प्रस्ताव पर विचार करने की प्रक्रिया शुरू की है। माना जा रहा है कि समिति इसी सत्र में संसद को रिपोर्ट सौंपेगी। उसके बाद सभी राज्य सरकारों व राजनीतिक दलों कीइस पर राय ली जाएगी। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं सोचा जा रहा है। देश में लोकसभा के साथ ही विधानसभाओं के चुनाव 1967 तक होते रहे थे, लेकिन बाद में कुछ राज्य विधानसभाओं को भंग करने से यह सिलसिला टूट गया। वहीं 1970 में लोकसभा को भी भंग कर दिया गया जिसके बाद क्रम कभी बना ही नहीं। मौजूदा समय में देश के 29 राज्यों और सात केंद्र शासित क्षेत्रों में कभी भी चुनाव का बिगुल बज जाता है।

इसके चलते राजनीतिक दल हमेशा चुनावी तैयारी में ही लगे रहते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो हर साल औसतन कम से कम चार-पांच राज्यों में चुनाव होते हैं। पिछले साल भी पांच राज्यों में चुनाव हुए थे। एक चुनाव के दौरान एक से डेढ़ महीने के लिए आचार संहिता लग जाती है। इस दौरान सिर्फ रूटीन के काम ही हो पाते हैं। बाकी सब ठप रहता है। सरकार कोई नीतिगत फैसला नहीं ले पाती है। जिससे विकास कार्य प्रभावित होते हैं। साथ साथ चुनाव हो जाएंगे तो सियासी दलों के नेताओं-मंत्रियों को काम करने का मौका मिलेगा। अभी ज्यादातर बडेÞ नेता, केंद्रीय और राज्यों के मंत्री चुनावों में ही व्यस्त हो जाते हैं। इसके अलावा इससे लगातार बढ़ते चुनाव खर्च पर भी लगाम लगेगा। 2014 के लोकसभा चुनाव में सरकार को करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये खर्च करने पड़े थे। यह 2009 से 131 फीसदी ज्यादा है। राजनीतिक दलों का खर्चा अलग होता है। इस प्रकार इससे चुनाव आयोग का धन और समय दोनों बचेगा। हालांकि इसके साथ कुछ समस्याएं भी हैं जिस पर समिति को गहन विचार विमर्श करने की जरूरत है। जैसे लोकसभा-विधानसभा के चुनावों को एक साथ किस तरह समायोजित किया जाएगा, क्योंकि कई राज्यों के कार्यकाल 2019 के पहले तो कई के इसके बाद पूरे होंगे। वहीं यदि स्पष्ट बहुमत नहीं मिले तो फिर सरकार कैसे बनेगी? यदि बीच में ही लोकसभा या विधानसभा भंग हो जाती हैं तो अगले कार्यकाल तक सरकारें कैसे चलेंगी? इस पर लोकतांत्रिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कोई सर्वमान्य फॉर्मूला निकालना होगा।

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