Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

एक दिन में 35 लाख मुकदमों का निपटाकर लोक अदालतों ने बनाया विश्व रिकॉर्ड

देश भर में एक साथ लोक अदालतें लगीं और एक दिन में ही करीब 35 लाख मुकदमों को निपटाकर विश्व रिकॉर्ड बना डाला। इनमें 39 लाख मुकदमों की सुनवाई होनी थी।

एक दिन में 35 लाख मुकदमों का निपटाकर लोक अदालतों ने बनाया विश्व रिकॉर्ड

लंबित मुकदमों के बोझ से देश की न्यायिक व्यवस्था करीब-करीब चरमरा-सी गई है। दशक बीत जाने के बाद भी फरियादियों को बमुश्किल न्याय नसीब हो पा रहा है। इस दरम्यान अदालतों का चक्कर लगाते-लगाते कितने पीड़ित और आरोपी दुनिया से कूच कर जाते हैं। यह हमारी न्यायपालिका का एक स्याह पक्ष है। परंतु शनिवार को एक उम्मीद की लौ भी नजर आई, जब देश भर में एक साथ लोक अदालतें लगीं और एक दिन में ही करीब 35 लाख मुकदमों को निपटाकर विश्व रिकॉर्ड बना डाला। इनमें 39 लाख मुकदमों की सुनवाई होनी थी, लेकिन मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वहां के लंबित मुकदमों को कुछ दिनों के लिए टाल दिया गया। इस मौके पर मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम ने कहा कि अदालत का मुख्य उद्देश्य शीघ्र न्याय दिलाना और यह सुनिश्चित करना है कि फिर अपील दायर नहीं हों। दरअसल, लोक अदालतों का फैसला अंतिम होता है और इन फैसलों के खिलाफ अपील नहीं हो सकती। इसमें वकीलों की जरूरत भी नहीं होती।

वहीं राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन करने की पहल करने वाले न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी ने कहा कि लोक अदालत या मध्यस्थता जल्द न्याय देने का एक सबसे शक्तिशाली औजार है जो संविधान की प्रस्तावना के मकसद की पुष्टि करता है। देश में समय-समय पर लोक अदालतें लगाई जाती हैं और इसकी तारीख लीगल सर्विस अथॉरिटी तय करता है। इस अदालत की खासियत यह है कि अन्य अदालतों में जहां मुकदमों में हार-जीत होती है, परंतु यहां न तो किसी की हार है न जीत। सुलह-समझौतों से रंजिश भी खत्म हो जाती है। जिससे भविष्य में किसी तरह का विवाद होने की संभावना भी नहीं रहती। लोक अदालत में तमाम तरह के सिविल और समझौतावादी आपराधिक मामलों का निपटारा किया जाता है। अर्थात ऐसे मामलों को निपटाने के लिए गठित होती हैं जहां आपसी सहमति से फैसले हो सकते हैं।

गैर-समझौतावादी मामलों को लोक अदालत में रेफर नहीं किया जाता। त्वरित व सस्ता न्याय आज समय की मांग है, किंतु संसाधनों की अनुपलब्धता इसमें सबसे बड़ी बाधा है। ऐसे में लोक अदालतें काफी मददगार साबित हो रहीं हैं। इसको और बढ़ावा देने की जरूरत है। इस समय सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों में तीन करोड़ से अधिक मामले चल रहे हैं। हर साल करीब 1.5 करोड़ नए मामले आते हैं। और करीब इतने ही मामले एक साल में लंबित रह जाते हैं। इसके कारण बहुत से हैं और गिनाए भी जाते रहे हैं-जैसे जजों की कमी और पर्याप्त अदालतों का न होना आदि। इन सब कारणों से अदालतों में मामलों की सुनवाई धीमी रही है। ऐसे मुकदमों की संख्या भी कम नहीं है, जिनमें वर्षों से ट्रायल शुरू नहीं हुआ है। बस तरीखें दी जाती हैं और आरोपी सालों से जेल में बंद हैं।

यह मानवाधिकार और नैसर्गिक न्याय के भी खिलाफ है। पीड़ित और आरोपी दोनों के लिए मुकदमों का वर्षों तक लंबित रहना उचित नहीं है। लंबे समय से जो मामले लंबित हैं, उनमें लोक अदालतों और इसी तरह की अन्य व्यवस्था करके त्वरित न्याय मिल सकता है। इससे अन्य अदालतों का बोझ कम होगा और लोगों को त्वरित, सस्ता और उचित न्याय मिलेगा।

Next Story
Top