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अवधेश कुमार का लेख : लोजपा की फूट स्वाभाविक

लोजपा का आंतरिक संघर्ष व विभाजन कतई अस्वाभाविक नहीं। वास्तव में चिराग पासवान के विरुद्ध उनके चाचा पशुपति कुमार पारस सहित पांच सांसदों और कई बड़े नेताओं का असंतोष उसी समय झलकने लगा था जब उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में राजग से अलग अपने उम्मीदवार उतारे। अगर चिराग दहाई संख्या तक भी विधायक जीता कर ला पाते तो शायद असंतोष अभी विद्रोह में नहीं बदलता। अभी लोजपा की यह लड़ाई कई रूप लेगी। संसद के भीतर और बाहर न्यायालय में असली लोजपा की वैधानिक लड़ाई की परिणति पर सबकी नजर रहेगी। इस राजनीतिक प्रकरण के चार महत्वपूर्ण पहलू हैं।

अवधेश कुमार का लेख : लोजपा की फूट स्वाभाविक
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अवधेश कुमार

अवधेश कुमार

लोजपा का आंतरिक संघर्ष व विभाजन कतई अस्वाभाविक नहीं। वास्तव में चिराग पासवान के विरुद्ध उनके चाचा पशुपति कुमार पारस सहित पांच सांसदों और कई बड़े नेताओं का असंतोष उसी समय झलकने लगा था जब उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में राजग से अलग अपने उम्मीदवार उतारे। अगर चिराग दहाई संख्या तक भी विधायक जीता कर ला पाते तो शायद असंतोष अभी विद्रोह में नहीं बदलता। जाहिर है, चिराग पासवान ने नीतीश कुमार के समानांतर स्वयं को बिहार के नेता के तौर पर उभारने की महत्वाकांक्षा से राजनीतिक भूल कर दी। उन्होंने इसकी संभावी परिणतियों का आकलन नहीं किया। नीतीश और जदयू तो उनके जानी दुश्मन हुए ही भाजपा के लिए भी विकट स्थिति निर्मित हो गई। बिहार में जदयू का विधानसभा चुनाव के समय से अभी तक कोई सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्मन है तो वह चिराग पासवान। लोजपा के एक विधायक जीते थे उन्हें भी जदयू ने अपने में समाहित कर लिया। कई जिलों के जिला अध्यक्ष सहित भारी संख्या में लोजपा के लोग जदयू में शामिल होते चले गए।

पारस सहित लोजपा के सांसदों, कई नेताओं, कार्यकर्ताओं का मानना रहा कि चिराग पासवान की गलत राजनीति के कारण उनका राजनीतिक भविष्य अधर में लटक जाएगा। पारस नीतीश के मंत्रिमंडल में रहे हैं इसलिए उनका व्यक्तिगत संपर्क ही बना रहा। ऐसा नहीं था कि चिराग पासवान और उनके सलाहकारों को इसकी भनक नहीं थी, लेकिन वे कुछ करने की स्थिति में नहीं रह गए। पूरे देश ने देखा जब चिराग स्वयं गाड़ी चला कर पशुपतिनाथ पारस के घर गए, लेकिन उनके लिए दरवाजा आसानी से नहीं खुला। पांच सांसदों द्वारा पारस को संसदीय दल का नेता तथा अन्य नेताओं के साथ मिलकर सूरजभान सिंह को कार्यकारी अध्यक्ष निर्वाचित करने के बाद चिराग ने भी प्रतिक्रियात्मक कदम उठाए हैं। इस स्थिति में उनके पास दो ही विकल्प थे। या तो पारस के नेतृत्व में संसदीय दल में शामिल रहें या फिर अपनी अलग धारा बनाएं। आकलन यह है कि रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद मंत्रिमंडल में उनकी सीट के स्वाभाविक दावेदार चिराग पासवान थे।

जदयू किसी सूरत में चिराग को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होते नहीं देखना चाहती, इसलिए उसने फूट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देखना होगा प्रधानमंत्री मोदी अगले मंत्रिमंडल में इनमें से किसी को शामिल करते हैं या नहीं और करते हैं तो किसे। अभी लोजपा की यह लड़ाई कई रूप लेगी। संसद के भीतर और बाहर न्यायालय में असली लोजपा की वैधानिक लड़ाई की परिणति पर सबकी नजर रहेगी। इस राजनीतिक प्रकरण के चार महत्वपूर्ण पहलू हैं। पहला, लोजपा का तात्कालिक एवं दूरगामी राजनीतिक भविष्य। अगर पारस को मोदी मंत्रिमंडल में जगह मिलती है तो तत्काल वे मजबूत होंगे और चिराग कमजोर। वर्तमान समय में जिसके हाथ सत्ता होती है लोग उसके इर्द-गिर्द इकट्ठे होते हैं, लेकिन दूरगामी दृष्टि से कुछ कहना अभी कठिन है। चिराग या पारस में किसी का व्यक्तित्व रामविलास पासवान के समरूप नहीं। दोनों के लिए नेतृत्व में पार्टी को साथ बनाए रखना संभव नहीं दिखता। पारस न तो बिहार के कभी बड़े नेता रहे न संगठन की दृष्टि से ही उनको कभी कद्दावर माना गया। रामविलास पासवान की छत्रछाया में परिवार के सदस्य के नाते ही राजनीति में उनका आविर्भाव हुआ। चिराग को पासवान ने अपने जीवन काल में ही नेतृत्वकारी भूमिका में ला दिया था। दूसरे, चिराग का राजनीतिक भविष्य भी इस समय अधर में लटका लग रहा है। जो कदम उन्होंने उठाया है उसके परिणाम कई कारकों पर निर्भर करेगा। इस समय न उनके पास एक विधायक हैं, न सांसद और प्रदेश में पार्टी अत्यंत कमजोर हो चुकी है। तो संभव है बची हुई पार्टी के अंदर अपने प्रति सहानुभूति पैदा कर लोगों को साथ लाने की कोशिश करें और व्यक्तिगत जनाधार बढ़ाने के लिए भी बिहार में काम करें, इसलिए अभी कहना कठिन है कि लोजपा का और चिराग पासवान का दूरगामी भविष्य क्या होगा। तीसरा पहलू है बिहार की राजनीति में इसका असर। जदयू चिराग के साथ कतई नहीं जाएगी।

चिराग पासवान ने 135 स्थानों पर अपने उम्मीदवार लड़ाए जिनमें से 115 जदयू के स्थानों पर थे। जदयू कहती है और गणित भी बताते हैं कि 36 स्थानों पर उसकी पराजय लोजपा के कारण हुई। जदयू इस समय तो पारस का समर्थन करेगी और इनके नेतृत्व में लोजपा का जनाधार उसे दिखाई दिया तो आगे भी वह यही चाहेगी कि राजग में पारस हीं रहे। अगर वैसा होता है तो चिराग पासवान क्या करेंगे? क्या वे तेजस्वी से हाथ में मिला सकते हैं? इसका उत्तर भी भविष्य के गर्भ में है। इसका चौथा पहलू है भाजपा का रुख। भाजपा ने अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है। लोजपा के दो भाग कायम रहने पर भाजपा जिसके साथ रहेगी बिहार की राजनीति में लोजपा के उस गुट का प्रभाव ज्यादा रहेगा। भाजपा अगर जदयू के सुझाव या दबाव को दरकिनार कर सकी तो वह इनके जनाधार का आकलन करेगी और उसी आधार पर उसका निर्णय होगा। लोजपा का मुख्य जनाधार बिहार में पासवानों के बीच रहा है। हालांकि रामविलास पासवान के बिहार में प्रभावी नेता के रूप में उदय लालू राबड़ी विरोधी राजनीति से हुआ। 28 अक्टूबर 2000 को स्थापना के बाद उन्होंने प्रदेश में लालू विरोध अभियान तेज किया। उसी के परिणामस्वरूप फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में 178 स्थानों पर लड़कर उनके 29 उम्मीदवार जीते तथा प्रमुख राजनीतिक शक्ति बने। उनके सहयोग के बिना सरकार नहीं बन सकती थी। नीतीश के नेतृत्व में राजग की सरकार उन्होंने नहीं बनने दी। पहले प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ और अंततः फिर से चुनाव की घोषणा हुई। लोगों और नेताओं में भी उनके खिलाफ नाराजगी थी और लोजपा टूट गई। अक्टूबर 2005 में उन्होंने 203 स्थानों पर उम्मीदवार खड़े किए, लेकिन केवल 10 ही विधानसभा व पहुंच सके। 2010 के विधानसभा चुनाव में 75 पर लड़ने के बावजूद लोजपा को केवल 6.7 प्रतिशत मत और तीन सीटें ही प्राप्त हुई। इसका कारण था कि लालू के साथ वे चुनाव लड़ने चले गए तो जनता ने नकार दिया।

इस तरह लोजपा की स्थापना से अभी तक के राजनीतिक प्रभाव पर नजर दौड़ाएं तो साफ दिखाई देगा कि अगर मोदी लहर में भाजपा ने उनके सिर पर हाथ नहीं रखा होता तो बिहार की राजनीति में उनका अस्तित्व खत्म था। आज चिराग या पारस का रामविलास पासवान जैसा न कद है न राजनीतिक संबंध ही। हां, चिराग की पहचान पारस से काफी ज्यादा है। लोजपा का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता था जब ये साथ रहने के साथ राजग में रहें। यह स्थिति बदल चुकी है। इस समय की स्थिति में चिराग के साथ बड़े नेताओं का अभाव हैं, जदयू जैसी सत्तासीन पार्टी उनके राजनीतिक भविष्य को जिस तरह नेस्तनाबूद करने को तत्पर है उसमें उनकी कठिनाई काफी बढ़ी हुई है। सच कहें तो चिराग ही नहीं और लोजपा के भविष्य पर बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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