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प्रकृति की रुसवाई से लें सीख, कृषि क्षेत्र में ऐसे होगा विकास

यह कितना वीभत्स है कि फागुन-चैत-बैशाख मार्च-अप्रैल की इस बेमौसमी बारिश ने कैसे किसानों के चेहरे सुखा दिए हैं।

प्रकृति की रुसवाई से लें सीख, कृषि क्षेत्र में ऐसे होगा विकास

उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में रामनगर से काशीपुर के सारे रास्ते में इन दिनों गेहूं की पकी फसल को देखकर ऐसा लगा करता था मानो जमीन पर सड़क के समानांतर दो फीट की ऊंचाई पर सुनहले रंग की एक और सड़क कुदरत ने बना दी हो और उस पर सरपट चला जा सकता है। पूरे यौवन के साथ लहलहाती हुई गेहूं की ये बालियां किसान की समृद्घि और उसके विस्तार का प्रतीक हुआ करती थीं। हरियाणा, पंजाब व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही नजारा अभी पिछले वर्ष तक दिखा करता था। पर इस साल सब कुछ चौपट हो गया। वे बालियां मुरझाई हुई पड़ी हैं और किसान के माथे पर चिंता की लकीरें। कुछ छोटे किसानों को तो बरबादी का यह आलम देखते ही दिल का दौरा पड़ गया। कुछ ने इस चिंता से बचने के लिए खुदकुशी कर ली। उनकी हिम्मत नहीं हुई कि कैसे वे अपनी इस बरबादी का मंजर देखें। किसान करे भी तो क्या करे। उसके पास न तो खरीफ का पैसा आया न रबी से उम्मीद बची। कर्ज और भविष्य के खचरें से सिहरे किसान के पास अपने बचाव का कोई जरिया नहीं है। आखिर इस साल का पूरा चक्र गड़बड़ा गया।

जुलाई-अगस्त सूखा निकला और मार्च-अप्रैल में खूब पानी बरसा। इसे सिर्फ दैवी प्रकोप मानकर हंसी में नहीं टाला जा सकता। यह संकेत है उस मौसम चक्र में बदलाव का जिसके बूते पूरा उत्तर और पूर्वी भारत अपना कृषि उद्योग चलाता रहा है। आज तक एक परंपरा चलती आ रही है कि जून के आखिरी हफ्ते या जुलाई के पहले हफ्ते तक इस पूरे कृषि प्रधान क्षेत्र में वर्षा होने लगती थी और खरीफ की बुआई शुरू हो जाती थी। इसके बाद नवंबर और दिसंबर की बारिश से रबी की फसल का काम शुरू हो जाता था। लेकिन अब यह चक्र बदलने लगा है तो कृषि वैज्ञानिकों और जानकारों को विचार करना चाहिए कि फसलों की कटाई और बुआई का चक्र भी बदला जाए। मगर पैदावार बढ़ाने पर विचार तो होता है लेकिन इस पर कभी विचार नहीं किया जाता कि कैसे परंपरागत खेती की बजाय ऐसी फसलों को विकसित किया जाए ताकि फसलों को बचाया जा सके। पर भारत में शहरी मध्यवर्ग कृषि को लेकर कभी गंभीर नहीं होता और मानकर चला जाता है कि कृषि पिछड़े हुए समाज की द्योतक है इसीलिए कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि वैज्ञानिकों ने आज तक कभी मौसम की मार से बचाने का कोई उपाय नहीं तलाशा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कौशल विकास को महज उद्योग तक सीमित कर दिया जाता है और कभी यह नहीं सोचा जाता कि हिंदुस्तान में कौशल विकास की असली परीक्षा तो कृषि क्षेत्र में ऐसे विकास से होगी। अभी शुक्रवार को नोएडा के सेक्टर 18 स्थित रेडिसन होटल में हुए इंफ्रा कन्क्लेव को संबोधित करते हुए गौतमबुद्घ नगर के कलेक्टर एनपी सिंह ने इस बात को बारीकी से पकड़ा। उन्होंने कृषि क्षेत्र व ग्रामीण क्षेत्रों के परंपरागत उद्योगों में भी कौशल विकास विकसित करने की बात कही। अगर वाकई कभी सरकार ने इस पर विचार करे कि ऐसा कौशल विकसित किया जाए जो कृषि उद्योग में कुशलता को तरजीह दे तो यकीनन एक दिन किसान इस बेमौसमी बारिश की मार से बच सकें।

यह कितना वीभत्स है कि फागुन-चैत-बैशाख मार्च-अप्रैल की इस बेमौसमी बारिश ने कैसे किसानों के चेहरे सुखा दिए हैं। मौसम विज्ञान विभाग हर वर्ष मई में एक विज्ञप्ति जारी करता है और बताता है कि इस वर्ष मानसून समय पर आएगा और किसानों के मुरझाए चेहरे खुशी से भर जाते हैं। पर जैसे-जैसे जुलाई अगस्त निकलने लगता है और मानसून की पश्चिमी घाट की पहाडिय़ों पर या सहयाद्रि पर अटका होता है तो तत्काल मौसम विज्ञान कहता है कि दरअसल पश्चिम विक्षोभ के कारण वर्षा थम गई। यानी सारा कौशल एक तरह से अफवाह तक ही सीमित है। आखिर यह पश्चिमी डिस्टर्बेंस से निजात कैसे पाई जाए? इस पर कभी भी न तो राजनीतिक दलों ने विर्मश किया न मौसम विभाग ने न ही कृषि वैज्ञानिकों ने भारतीय कृषि को मानसून पर निर्भर न रहने का कोई विकल्प तलाशा। आखिर ऐसी फसलें भी हो उगाई जा सकती हैं जो मानसून के ज्यादा आने अथवा कम आने पर निस्पृह रहें। लेकिन राजनेताओं के केंद्र में वे बड़े किसान होते हैं जो अपना पैसा बढ़ाने के लिए कृषि को उद्योग बनाने के लिए प्रय}शील हैं। पर अगर वे कभी यह सोचें कि वह छोटा किसान जो अपने भरण-पोषण के लिए कृषि को आजीविका बनाए है, के हितों की अनदेखी न की जाए तो शायद कौशल विकास का ज्यादा गहन परीक्षण संभव है। किसान की कृषि अपनी आजीविका है इसलिए उसकी आजीविका को सुरक्षा प्रदान करने के उपायों पर भी गौर किया जाए।

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