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डॉ. अश्विनी महाजन का लेख : आत्मनिर्भरता संग ड्रैगन को सबक

चीन के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार से दुनिया भर में न केवल लोग स्वास्थ्य संकट से जूझ रहे हैं बल्कि एक भयंकर आर्थिक संकट का भी उन्हें सामना करना पड़ रहा है। पिछले 3 माह से ज्यादा, आर्थिक गतिविधियां लगभग पूरी तरह से ठप पड़ी हैं।

डॉ. अश्विनी महाजन का  लेख : आत्मनिर्भरता संग ड्रैगन को सबक
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डॉ. अश्विनी महाजन

आज दुनिया भर के सभी देश चीन से आए वायरस से जूझ रहे हैं, 91 लाख लोगों को संक्रमण हो चुका है और 4.72 लाख की मृत्यु हो गई है। यदि इसे चीन का षड्यंत्र न भी माना जाए तो भी यह तो सर्वविदित ही है कि चीन ने इसकी भयावहता को छुपाया और अपनी वैश्विक विमान सेवाओं को जारी रखते हुए जानबूझकर संक्रमित लोगों को दुनिया भर में पहुंचा दिया, जिससे यह संक्रमण फैल गया। इस संक्रमण ने दुनियाभर को अपनी चपेट में ले लिया। चीन के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार से दुनिया भर में न केवल लोग स्वास्थ्य संकट से जूझ रहे हैं बल्कि एक भयंकर आर्थिक संकट का भी उन्हें सामना करना पड़ रहा है। पिछले 3 माह से ज्यादा, आर्थिक गतिविधियां लगभग पूरी तरह से ठप पड़ी हैं।

पिछले 20 वर्षों में जब से चीन डब्ल्यूटीओ का सदस्य बना है, उसने अपने सस्ते सामानों द्वारा दुनिया भर के बाजारों पर कब्जा कर लिया है। अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिकी देश सभी चीन के माल पर आश्रित हैं। उनके उद्योग चीन के सस्ते माल से प्रतिस्पर्धा न कर पाने के कारण नष्ट हो चुके हैं। ऐसे में चीन अमेरिका के मुकाबले महाशक्ति के रूप में उभरा है। खरबों डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के बलबूते उसने 67 देशों को मिलाकर एक बेल्ट रोड परियोजना की भी शुरुआत कर दी है, ताकि वो दुनिया के बड़े हिस्से के इंफ्रास्ट्रक्चर पर कब्जा कर सके और साथ ही साथ अधिकांश देशों को अपने जाल में फंसा पाए। श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर कब्जा चीन की उसी कुटिल नीति का एक उदाहरण है।

चीन ने इस बीच अपनी आर्थिक शक्ति के साथ अपनी सामरिक शक्ति को भी विस्तार दिया है। चीन का अभी तक का इतिहास विस्तार वाद का ही रहा है। 1962 में हमारी हजारों किलोमीटर भूमि पर अधिकार जमा लेना इसी नीति का हिस्सा था। वर्ष 2001 के बाद से उसने अपनी विस्तार वादी नीति को और तेजी से बढ़ाना शुरू किया है। हालांकि अमेरिका ने पहले से ही चीन की धोखेबाजीपूर्ण व्यापार नीति के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है और उसकी हुआवे जैसी कंपनियों को टेलीकॉम क्षेत्र से बाहर कर रहा है। कोरोना संकट के बाद तो लगभग हर देश चीन से किनारा कर रहा है। भारत समेत कई अन्य यूरोपीय देशों ने भी चीन की घटिया और नकली टेस्टकिट्स की खेपों को वापस भेज कर अपनी नाराजगी जताई है। जहां अमेरिका का चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध बदस्तूर जारी है, उधर यूरोपीय समुदाय के देशों ने भी चीन पर विशेष आयात शुल्क लगाने का फैसला किया है। यह इसलिए किया गया है कि यूरोपीय समुदाय के देश यह मानते हैं कि चीन की सरकार अपने निर्यातों पर प्रोत्साहन राशि देकर उनको सस्ता कर यूरोप में भेजती है, जिसके कारण उनके उद्योगों को नुकसान हो रहा है। ऐसा लगता है कि चीन की बेल्ट रोड परियोजना भी खटाई में पड़ने जा रही है।

पहले 67 देश उस में भागीदार बन गए थे, लेकिन उनमें से कई देश तो पहले ही चीन के विस्तारवादी मंसूबों को समझकर कन्नी काटने लगे थे। गौरतलब है कि मलेशिया ने पहले से ही अपनी परियोजना को काफी छोटा कर दिया है। श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह को हथिया लेने के बाद श्रीलंका की जनता और सरकार चीन से नाराज है। कई मुल्कों पर कर्ज के बोझ को बढ़ा देने के कारण भी वहां के लोग और सरकारें चीन से नाराज हैं और उस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए उत्साहित नहीं हैं। मालदीव, मंगोलिया, मोंटेगरो, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, लाओस समेत कई देश चीन के कर्ज जाल में फंस चुके हैं। इटली सरीखे यूरोपीय देश भी जो अमरीका के विरोध के बावजूद, पहले बेल्ट रोड योजना में शरीक हो गए थे, चीन से आने वाले कामगारों से संपर्क के कारण जो कोरोना महामारी की चपेट में आ गए, अब चीन द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए जाने पर पुनर्विचार करने लगे हैं। अफ्रीकी देश, लेटिन अमेरिकी और ऑस्ट्रेलिया सभी अब चीन से खफा हैं। ऑस्ट्रेलिया के भारत के साथ बढ़ते रिश्तों को लेकर भी चीन आशंकित है। कहा जा सकता है कि भारत समेत पूरी दुनिया के देश चीन के माल का बहिष्कार कर रहे हैं। वहां की सरकारें चीन की कंपनियों से रिश्ते तोड़ रही हैं और चीन के माल को रोकने हेतु टैरिफ और गैर टैरिफ बाधाएं खड़ी कर रही हैं और चीन के विस्तारवादी रवैये को देखते हुए चीन को सामरिक खतरे के रूप में देख रही हैं। ऐसी परिस्थिति को हम चीन का वैश्विक बहिष्कार भी कह सकते हैं।

चीन दुनिया भर में जनता के गुस्से, बहिष्कार और वहां की सरकारों के चीन के प्रति बढ़ते विरोध के चलते भारी चिंता में है। चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के लेख इस और स्पष्ट इंगित कर रहे हैं। भारत में अभी भी कई लोग हैं जो यह मानते हैं कि चीन का बहिष्कार फलीभूत नहीं हो पाएगा, क्योंकि हमारी चीन पर अत्यधिक निर्भरता है। मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा उद्योग के कच्चे माल, स्वास्थ्य उपकरण, केमिकल्स, धातुओं, खिलौनों, उद्योगों के लिए कलपुर्जों और कच्चे माल समेत हमारे देश की निर्भरता चीन पर इतनी अधिक है, चीन का बहिष्कार संभव नहीं और चीन के आयात पर रोक भारत की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकती है। उनका यह भी कहना है कि चीन के माल का पूर्ण बहिष्कार कर भी दिया जाए तो भी उस से चीन को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा, क्योंकि उसके कुल निर्यात 2498 अरब डॉलर के मुकाबले भारत को उसके निर्यात मात्र 68.2 अरब डॉलर के ही हैं यानी मात्र 2.7 प्रतिशत।

हमें समझना होगा कि हमारे देश से चीन को कुल 50 अरब डॉलर का व्यापार अतिरेक प्राप्त होता है जो उसके कुल व्यापार का 11.6 प्रतिशत है। साथ ही नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका का चीन से व्यापार घाटा 360 अरब डॉलर का है जो चीन के व्यापार अतिरेक का 83 फिसदी से ज्यादा है। यदि भारत और अमेरिका दोनों मिलकर चीन के माल को अपने देशों से बाहर कर दें तो चीन का सारा व्यापार अतिरेक समाप्त हो जाएगा। जहां तक भारत की चीन के आयात पर निर्भरता का प्रश्न है भारत की क्षमता को कम आंकना सही नहीं है। आज से 15 साल पहले तक दवाओं का कच्चा माल 90 भारत में ही बनाया जाता था, लेकिन चीन द्वारा डंपिंग के कारण हमारी एपीआई इंडस्ट्री प्रभावित हुई। उसे पुनः स्थापित करने हेतु सरकार ने 3000 करोड रुपये के पैकेज की घोषणा पहले से ही कर दी है। चीन से आने वाले कई उत्पाद जीरो टेक्नोलॉजी के हैं, जिनका उत्पादन भारत में तुरंत शुरू किया जा सकता है। मात्र 2 महीनों में भारत पीपीई किट्स, टेस्टिंग किट्स समेत कई मामलों में आत्मनिर्भर हो चुका है और 50,000 से ज्यादा वेंटिलेटर भी भारत में तैयार हो चुके हैं। भारत की प्रतिभा और क्षमता पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। चीन के उत्पादों की कीमत के आधार पर हम उसके आयात को अनुमति दें। हमें देश में उद्योगों के पतन, बढ़ती बेरोजगारी और गरीबी पर भी विचार करना होगा। करोना के बाद आज एक चुनौती आई है उसे अवसर में बदलने का नाम ही भारत का आत्मनिर्भरता अभियान है।

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