Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

स्वयं प्रकाश की एक अनोखी कहानी: ''लाइलाज''

मैं खुद नहीं जानता, मेरे घर वाले भी नहीं जानते कि आखिर मेरी प्रॉब्लम क्या है।

स्वयं प्रकाश की एक अनोखी कहानी:
घर हो या बाहर, क्या आज के दौर में सब कुछ व्यवस्थित और सही तरीके से होने की कामना करना किसी मानसिक व्याधि के लक्षण हैं? लेकिन कई बार हम स्वयं अव्यवस्थाग्रस्त स्थितियों में रहते हुए इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि व्यवस्था, सलीका और काम को सही तरीके से करना बहुत विचलित करने लगता है। वास्तव में बीमार कौन है और इलाज की किसे जरूरत है, इसी सवाल को उभारती एक अनोखी कहानी।
यदि दरवाजे की घंटी ठीक काम कर रही होगी, तो भी कोई जरूरी नहीं है कि उसकी आवाज को भीतर कोई सुन ही लेगा। आप पांच-पांच मिनट के अंतराल से दो-तीन बार घंटी बजाएंगे और भीतर से कोई प्रत्युुत्तर न पाकर दरवाजे को धकेलकर देखेंगे कि कहीं ताला तो बंद नहीं है? इस पर आप पाएंगे कि दरवाजा तो खुला ही था। लेकिन भीतर घुसते ही आप किसी न किसी चीज से टकराएंगे। वह चाहे छोटे बच्चे की साइकिल हो, गेहूं का कनस्तर हो या जूते या और कुछ। भीतर घुसते ही आपको समझ में आ जाएगा कि क्यों घंटी की आवाज किसी को सुनाई नहीं दी। ड्रॉइंगरूम में टीवी चल रहा होगा। हालांकि उसे देखने वाला कोई न होगा। लड़के के कमरे में फुल वॉल्यूम पर म्यूजिक सिस्टम बज रहा होगा, जबकि वह पढ़ रहा होगा। दूसरे कमरे की बालकनी से लड़की सड़क पार सहेली से ऊंची आवाज में गपशप कर रही होगी और पूजाघर में मेरी माताजी घंटी बजाकर पूजा-आरती कर रही होंगी।
यदि आप चाहेंगे कि पहले हाथ-मुंह धो लिए जाएं तो आप ड्रॉइंगरूम से सटे डाइनिंग स्पेस के वॉशबेसिन पर जाएंगे। वॉशबेसिन में यदि आपके सौभाग्य से किसी का थूका-उगला बलगम इत्यादि न भी हुआ, तो भी दो-चार चिपकने वाली बिंदियां, एक-दो टूटे रबर बैंड और एकाध बालों का गुच्छा जरूर पड़ा होगा। नल ठीक से बंद नहीं होगा और टपक रहा होगा। सारे घर के नल ठीक से बंद नहीं होते और टपकते रहते हैं। यह उनका सामान्य चरित्र बन चुका है। वहां एक साबुनदानी भी रखी होगी, जिसमें पानी भरा होगा। उसमें साबुन की टिकिया भी होगी, किंतु वह जलकमलवत नहीं होगी, कढ़ी में पकौड़ीवत होगी। कोई चाहे तो साबुनदानी के रस से ही हाथ धोकर पंद्रह दिन काम चला ले, जैसे मैं चला लेता हूं। यदि आपने इस वाशबेसिन पर हाथ धो लिए तो वह चोक हो जाएगा, उसमें ऊपर तक पानी भर जाएगा और आप केवल प्रार्थना के शिल्प में सोचते रह जाएंगे कि पंद्रह-बीस मिनट-आधे घंटे में यह पानी किसी तरह निकल जाए।
वहां एक तौलिया भी टंगा होगा, लेकिन वह इस कदर ‘स्वच्छ’ होगा कि उससे जूते भी पोंछ लिए जाएं, तो जूतों पर फिर पॉलिश करानी पड़े। खैर, इतनी अपेक्षा तो आपसे की ही जाती है कि आपकी जेब में एक निजी रूमाल भी होगा। आईने में कुछ नजर नहीं आएगा सिवाय कोहरे के, जिसका ताल्लुक मौसम के साथ कतई नहीं है। यदि हाथ-मुंह धोने के बाद आप उसमें देखकर बाल जमाने का दुस्साहस करेंगे, तो संभव है दाहिनी तरफ निकाली गई मांग अंतत: बार्इं तरफ सिद्ध हो।
डाइनिंग स्पेस में एक डाइनिंग टेबल भी होगी। ध्यान से देखने पर नजर आ जाएगी। उस पर अचार-मुरब्बे के मर्तबान, ऊन के गोलों में घोंपी गई सलाइयां, ताजा तोड़ी गई मंगोड़ियां और इन चीजों से लेकर बच्चों की किताबों तक, कुछ भी हो सकता है। चाय के जूठे कप, सब्जियों के डंठल-छिलके और इधर-उधर बिखरे-लुढ़के पानी के गिलास तो होंगे ही। दरअसल, डाइनिंग टेबल का उपयोग हमारे घर में रामलीला मैदान या चौपाटी की तरह किया जाता है। वह खाना खाने के अलावा हर काम में आती है। उसकी सनमाइका टॉप का मूल रंग और डिजाइन कैसा था, यह शोध का विषय बन चुका है। जबकि अभी उसने अपने जीवन के पांच वसंत भी नहीं देखे हैं।
वहीं एक तरफ ड्रेसिंग टेबल पड़ी हुई है। उस पर धूल, सिंदूर और पावडर की ऐसी महीन मिली-जुली परत बिछी होगी, मानो उस पर डीडीटी का छिड़काव किया गया हो। पावडर का डिब्बा खड़ा नहीं, लेटा होगा। सिंदूर की डिब्बी खुली होगी, तेल की शीशी का ढक्कन गायब होगा, नेलपॉलिश की अधखुली शीशियां नींद में गाफिल बच्चों की तरह एक-दूसरे पर लुढ़क रही होंगी। टूटी चूड़ियों के टुकड़े यूं पड़े होंगे जैसे उन्हें बाहर फेंक देने से पाप लगेगा। टूटे दांत वाले कंघे में बालों का गुच्छा फैला होगा और आईना चुटीलों, रिबनों, हेयरबैंडों को कंधा दे रहा होगा। अलावा इसके आईने पर कुछ बच्चों की चित्रकारी जैसी भी दिखाई देगी। यह मसकारा, आईलाइनर और लिपस्टिक के शेड और चालूपने का टेस्ट ट्रैक है। यानी उन्हें चलाकर देखने का स्थान है।
आपका मन करेगा क्यों न पहले दो घूंट पानी ही पी लिया जाए। पानी लेने के लिए फ्रिज खोलेंगे, तो आप पर एक भयानक किस्म की मिली-जुली गंध हमला करेगी। यह गंध उन दवाइयों की है, जो माताजी फ्रिज में रखती हैं और उन मसालों की, जिनकी साप्ताहिक पिसाई के बाद उन्हें यहां रखा जाता है और सड़े खट्टे दही का भी, जिससे लड़की सिर धोती है और जिसे रखने का सर्वोत्तम स्थान यही है। कोई अजब नहीं है यदि प्लेन पानी में भी आपको मुफ्त में इन गंधों और इनके स्वादों का भी कुछ मजा मिल जाए।
विद्वानों का कहना है कि महाभारत का युद्ध सैकड़ों साल पहले हुआ था। उन्होंने मेरा रसोईघर नहीं देखा। अगर देख लेते तो... लेकिन जरा रुकिए। आप सोच रहे होंगे कि मैं अपने घर का इतना दारुण चित्र क्यों खींच रहा हूं? है न? मैं खुद नहीं जानता। मेरे घर वाले भी नहीं जानते कि आखिर मेरी प्रॉब्लम क्या है। सच पूछिए, तो शायद कोई मनोविश्लेषक ही इसका ठीक उत्तर दे सकता है। शायद मैं एक पुराने जमाने का-सा आदमी हूं। हर चीज में सलीका, नफासत, सफाई और सिस्टम पसंद करता हूं। भले ही उससे हासिल कुछ नहीं होता हो। इससे उलट मेरा पूरा परिवार घोर अव्यवस्थाप्रिय है। वहां कोई चीज सही जगह पर रखना, किसी भी चीज का जरूरत के वक्त इस्तेमाल करना, चीजों को किफायतशारी के साथ सही इस्तेमाल करना, चीजों की सार-सम्हाल करना और उन्हें समझदारी से बरतना, बस गुजरे जमाने की छोड़ दी जाने लायक बातें हैं। हो सकता है जैसा बाहर देखते हों, वैसा ही घर में करते हों। या हो सकता है बाहर ऐसा करने की गुंजाइशें जैसे-जैसे कम होती जा रही हैं, घर में उसकी गुंजाइशें बढ़ाते जा रहे हैं।
कभी मूड आता है तो घर की बहुत सारी चीजें झाड़-पोंछकर सही जगह रख देता हूं। इससे सारा घर परेशानी में पड़ जाता है। हमारे यहां मोजों की जगह सिलाई मशीन में या फिर मसालदान तक कुछ भी हो सकती है। जूतों का रैक नहीं। चश्मे का केस गमले से गैराज तक कहीं भी छोड़ा जा सकता है, बुकशेल्फ पर नहीं। अब यदि मैं मोजों को जूतों के रैक में और चश्मे के केस को बुकशेल्फ पर रख दूंगा तो परेशानी तो होगी ही।
सब चाहते हैं, उनकी अव्यवस्था और जंगलतंत्र को कतई डिस्टर्ब न किया जाए। लड़के ने तो अपने कमरे के दरवाजे पर बाकायदा एक पोस्टर लगा रखा है, जिस पर लिखा है ‘भीतर घुसो तो अपनी जोखिम पर’। ठीक है। यह भी ठीक है। शायद विक्टोरिया युग के अदब-लिहाज और औपचारिकता का इसी तरह सत्यानाश किया जा सकता है। पर मैं कहता हूं उसकी जगह भारतीय संयम और सादगी को बिठाने की बजाय अमेरिकी अय्याशी और उजड्डपन को बिठाने का क्या तुक है? लेकिन मेरी बात किसी को समझ में नहीं आती।
जब परिवार कहीं चला जाता है, तो पहले तो मैं सारे घर को अपने हिसाब से झाड़ता-पोंछता सजाता-जमाता हूं। फिर कम से कम एक दिन इसी बात पर खुश होता हूं कि इस सुव्यवस्था को किसी ने बर्बाद नहीं किया। फिर एक-दो दिन इस तरफ से निरपेक्ष और उदासीन जैसा रहता हूं। और फिर यह सुव्यवस्था मुझे काटने को दौड़ने लगती है। चाहता हूं कोई आए और सब कुछ को पहले की तरह बिखरा जाए। मेरा कोई इलाज है?
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलो करें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-
Next Story
Top