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केरल को बाढ़ से उबारने के लिए उठाने होंगे ये कदम

पहले से ही आर्थिक रूप से खस्ता केरल में आई प्रलयंकारी बाढ़ से मची तबाही के बाद लाखों पीड़ितों के जीवन को पटरी पर लाना राज्य सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगा। आठ अगस्त से जारी वर्षा के चलते आई यह विनाशकारी बाढ़ राज्य में 1924 के बाद से 94 साल की सबसे भीषण आपदा है।

केरल को बाढ़ से उबारने के लिए उठाने होंगे ये कदम

पहले से ही आर्थिक रूप से खस्ता केरल में आई प्रलयंकारी बाढ़ से मची तबाही के बाद लाखों पीड़ितों के जीवन को पटरी पर लाना राज्य सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगा। आठ अगस्त से जारी वर्षा के चलते आई यह विनाशकारी बाढ़ राज्य में 1924 के बाद से 94 साल की सबसे भीषण आपदा है। बाढ़ की विभीषिका का आलम यह है कि अब तक 3.55 लाख लोग बेघर हो गए।

ये लोग 3024 राहत शिविरों में हैं। तकरीबन 40,000 एकड़ में फसलें नष्ट हो चुकी हैं। राज्य के 134 ब्रिज और 96 हजार किमी लंबी सड़क पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं। करीब 1000 मकान पूरी तरह और 26,000 मकान आंशिक रूप से टूट गए हैं। 375 लोगों की जान जा चुकी है। अनेक लोग लापता हैं। शव तेरते मिल रहे हैं। समूचे राज्य में तबाही का मंजर पसरा हुआ है।

हजारों लोग भूखे मरने को मजबूर हैं। खाद्यान्न का संकट शुरू हो गया है। राहत शिविरों में बीमारी का खतरा बढ़ गया है। शुरुआती अनुमान के मुताबिक केरल की अर्थव्यवस्था को 21 हजार करोड़ रुपये की चोट पहुंची है। वृहत आकलन हालात सामान्य होने के बाद होगा। निश्चित रूप से इस बाढ़ से केरल की अर्थव्यवस्था की कमर टूट चुकी होगी।

कृषि प्रधान केरल मसालों व नारियल की फसल के लिए मशहूर है। इसके अलावा पर्यटन राज्य के मुख्य आय के स्रोत हैं। बाढ़ से कृषि क्षेत्र, पर्यटन क्षेत्र व छोटे कारोबारियों को तगड़ा झटका लगा है। केरल मनी ऑर्डर अर्थव्यवस्था भी है, लेकिन इस सेगमेंट में भी हाल के वर्षों में मलयशिया व खाड़ी देशों में प्रवासी के रूप में रह रहे केरल के लोगों को चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

करीब साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाले राज्य केरल में अधिकांश समय कांग्रेस या वाममोर्चा की सरकार रही है। अभी माकपा नीत एलडीएफ (लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट) की सरकार है। दुखद यह है कि किसी भी सरकार ने तटीय राज्य होने के नाते बाढ़ आपदा या अन्य जल आपदा से निपटने के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं किया है। व्यापक राहत कोष तक नहीं है।

हालांकि केरल की इस दुख की घड़ी में हर ओर से मदद के हाथ बढ़े हैं। एनडीआरएफ की टीम, सेना व अन्य सुरक्षा बल लोगों को बचाने में जुटे हुए हैं। केंद्र सरकार ने दो बार राहत पैकेज का ऐलान किया है। पहली बार केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपने केरल दौरे के दौरान 100 करोड़ रुपये का ऐलान किया और दूसरी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाढ़ पीड़ित क्षेत्र के हवाई जायजा लेने के बाद 500 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की।

करीब दस राज्यों ने 115 करोड़ की मदद केरल को दी है। यूएई ने भी चार करोड़ रुपये देने की बात कही है। सऊदी अरब ने भी राहत कोष के लिए कमेटी बनाई है। खाड़ी देशों में सक्रिय मलयाली संगठनों से एक सौ करोड़ जुटाने की बात कही है। अनेक एनजीओ व संगठनों के अलावा फिल्म उद्योग से भी मदद दी जा रही है।

केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने कहा है कि उन्हें करीब दो हजार करोड़ की दरकार होगी। केरल को फिर से उठ खड़ा होने के लिए हर ओर से इसी तरह सहायता की आवश्यकता है, लेकिन इसे बाढ़ पीड़ित तक पहुंचाने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। लेकिन अन्य राज्यों के अनुभव यही कहते हैं कि सरकारी भ्रष्टाचार के चलते बाढ़ या अन्य आपदा पीड़ितों तक मदद पहुंच नहीं पाती है।

पीड़ित ठगे रह जाते हैं। केरल सरकार की असली परीक्षा सही आकलन कर सभी पीड़ितों को मदद पहुंचाने की है। फौरी तौर पर तो खाद्यान्न व महामारी से निपटने को पर्याप्त दवा की जरूरत है। केरल की विनाशकारी बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने पर विचार किया जाना चाहिए। इससे राज्य को आपदा से उबरने में मदद मिलेगी।

पिछले कुछ वर्षों से वर्षा से आई बाढ़ विनाशकारी साबित हो रही है, इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर बाढ़ से निपटने की व्यापक नीति नहीं बन रही है। बाढ़ नियंत्रण के अन्य उपायों के साथ नदी जोड़ने की योजना पर काम किया जाना चाहिए।

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