Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

नीलम महाजन सिंह का लेख : खुले मन से वार्ता करें कश्‍मीरी नेता

अतीत से बाहर निकलकर आगे की तरफ देखना चाहिए। केंद्र सरकार को भी चाहिए कि इस बहुप्रतीक्षित वार्ता में 'कश्मीरियत, इंसानियत व जम्हूरियत' की सोच को आगे रखते हुए कश्मीरी नेताओं के साथ बात करनी चाहिए। जब कश्मीर भारत का मुकुट माना जाता है तो कश्मीर के लोगों को भी खुद को भारत का अभिन्न अंग मानना चाहिए। कश्मीरियों को हमें भी अपनाना होगा। इस वार्ता से पहले पीडीपी प्रमुख व अविभाजित जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्य मंत्री महबूबा मुफ़्ती का पाक राग अलापना पीएम के साथ बातचीत की राह में रोड़ा अटकाने जैसा है। कश्मीर के नेताओं को प्रधानमंत्री मोदी से खुले मन से मिलना चाहिए।

नीलम महाजन सिंह का लेख : खुले मन से वार्ता करें कश्‍मीरी नेता
X

नीलम महाजन

नीलम महाजन सिंह

आज जब कश्मीर के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलेंगे तो उन्हें खुले मन से मिलना चाहिए। हमें अतीत से बाहर निकलकर आगे की तरफ देखना चाहिए। केंद्र सरकार को भी चाहिए कि इस बहुप्रतीक्षित वार्ता में 'कश्मीेरियत, इंसानियत व जम्हूरियत' की सोच को आगे रखते हुए कश्मीरी नेताओं के साथ बात करनी चाहिए। जब कश्मीर भारत का मुकुट माना जाता है, तो कश्मीर के लोगों को भी खुद को भारत का अभिन्न अंग मानना चाहिए। कश्मीरियों को हमें भी अपनाना होगा। इस वार्ता से पहले पीडीपी प्रमुख व अविभाजित जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्य मंत्री महबूबा मुफ़्ती का पाक राग अलापना पीएम के साथ बातचीत की राह में रोड़ा अटकाने जैसा है। गुपकार अलायंस में शामिल पीडीपी नेता महबूबा को एक बात समझनी चाहिए कि‍ प्रधानमंत्री की यह वार्ता कश्मीरी नेताओं के साथ कश्मीर पर हो रही है, इसलिए इसमें पाक की कोई अहमियत नहीं है। भारत सरकार का स्टैंड साफ है कि पाक के साथ आतंकवाद व पीओके पर बात होगी। कश्मीर चूंकि भारत का अभिन्न अंग है, इसलिए इस पर किसी तीसरे पक्ष से वार्ता अर्थहीन है।

महबूबा ने सरकार में काम किया है, इसलिए केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए उन्हें पाक को शामिल करने की बात नहीं करनी चाहिए थी। इस मामले में गुपकार अलायंस के प्रमुख एनसी नेता व पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला ने दूरदर्शिता दिखाई है। उन्होंने वार्ता में शामिल होने की बात कह कर कश्मीर के लिए नए सामाधान का रास्ता खोला है। जब तक बात नहीं होगी, कश्मीर के मसले हल नहीं होंगे। ग्लोेबल विलेज के दौर में संविधान का अनुच्छे द 370 प्रासंगिक नहीं रह गया था। जम्मू-कश्मीर व लद्दाख भारत का अंग है तो वह व्यवहार में भी पूर्ण रहना चाहिए। भारत के संघीय व्यवस्था में जम्मू-कश्मीर के लिए भी अच्छा है कि वह संवैधानिक संघ को पूर्णतया स्वीकार करे। धारा 370 जैसे विशेष प्रावधान का कश्मी‍री दलों द्वारा दुरुपयोग हुआ है। पीएम के साथ इस वार्ता में दो बातें अहम रहने वाली हैं। पहली यह कि जम्मू-कश्मीर को पुन: पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए व दूसरी यह कि राज्यं में लोकतंत्र बहाली अति शीघ्र हो। यह दोनों चीजें होनी जरूरी हैं। भारत सरकार पर नैतिक व विदेशी दोनों दबाव हैं जिसके चलते वह कश्मीरी नेताओं के साथ वार्ता के लिए आगे आई है, लेकिन इसका नतीजा तभी निकलेगा, जब सरकार व कश्मीरी नेता बिना अगर-मगर किसी सहमति पर पहुंचेंगे। इसके लिए हमें कश्मीर के अतीत में जाना होगा।

'गर फिरदोस बर रूहे ज़मी अस्त, हमी अस्त हमी अस्त हमी अस्त'।

फिरदोस के इस शेर ने राजनीति में भी वर्चस्व स्थापित किया। कश्मीर ने अभी तक आतंक का भयानक रक्तपात देखा है। 75 वर्षों के बाद भी कश्मीर का मुद्दा सुलग ही रहा है। 'इंस्ट्रूमेंट आफ एक्सेशन' 26 अक्तूबर 1947 को तत्कालीन महाराजा हरि सिंह द्वारा जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय किया गया। उसके बाद पाकिस्तान का भारत से तीन बार युद्ध करना व हराना, बांग्लादेश बनना, कश्मीर के एक हिस्से पर पाक का अवैध कब्जा रह जाना और कश्मीर के खुंदक में वहां प्रायोजित आतंकवाद को प्रश्रय देना आदि सबके सामने हैं। इस स्थिति के बाद भी पीडीपी नेता का पाकिस्तान को वार्ता में शामिल करने की बात कहना भारतीयता के साथ धोखा है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा, जम्मू-कश्मीर की तात्कालिक राजनीतिक स्थिति पर विचार विमर्श के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाना, एक महत्वपूर्ण कदम है। कश्मीर से धारा 370 के अधिकांश प्रावधानों को हटाने और राज्य के विभाजन के बाद वहां उप-राज्यपाल शासन है। केवल पंचायत चुनाव हुए हैं, इसलिए वहां जल्द लोकतंत्र की बहाली जरूरी है।

सभी आठ राजनीतिक दलों ने, जिसे 'गुपकार आलियांज़' कहा जाता है, प्रधानमंत्री की बैठक में हिस्सा लेने का ऐलान किया है। मुहम्मद युसुफ तारागामी, कम्युनिस्ट नेता ने स्पष्ट किया है, कि केंद्र उन्हें सभी मुद्दों पर आश्वस्त करे, जो कश्मीरियत के लिए अनिवार्य हैं। यह पहली वार्ता है जो घाटी में कश्मीर के विभाजन व 370 हटने के बाद बुलाई गई है। इसे केंद्र का कश्मीर की ओर 'ओलिव ब्रांच' कहना उचित होगा। यह अनायास नहीं है कि केंद्र सरकार कश्मीर पर वार्ता कर रही है। कुछ दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने विश्वभर में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों को रोकने के लिए सभी देशों पर दबाव डाला है। कुछ सप्ताह पूर्व यूएस उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस ने प्रधानमंत्री मोदी से फोन कर बातचीत की थी। सूत्रों के अनुसार उस बातचीत में कमला हैरिस ने कश्मीर में मानवाधिकार संरक्षण व प्रजातांत्रिक, संवैधानिक प्रणाली को पुनर्स्थापित करने का आग्रह किया था। अभी विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अपने अमेरिकी समकक्ष एंटोनी ब्लिंकन से लंदन में भेंट की, जिसमें कश्मीवर के हालात पर चर्चा हुई। (यूएनएचआरसी) ने भी निरंतर कश्मीर संबंधित गतिरोध पर कड़ा संदेश दिया है। 1947 में कश्‍मीर के भारत में विलय के समय में अनुच्‍छेद 370 के जरिये विशेष राज्य का स्टेटस देना, वहां के राजनीतिक एवं भौगोलिक कारणों के मद्देनजर आवश्यक था। केंद्र की कांग्रेस सरकार ने कभी भी गंभीरता से कश्‍मीर समस्‍या के हल की दिशा में ठोस प्रयास किया ही नहीं। 1990 से विघटनकारी गुटों तथा आतंकवाद ने कश्मीर और केंद्र के संबंधों के आपसी विश्वास पर प्रश्न चिह्न लगाए। 'मेक नामरा लाइन' (एलओसी) का उल्लंघन होता रहा।

संघ और भाजपा के घोषणा पत्र में कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करना अहम मुद्दा था, साथ ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपने 'एक देश एक प्रदेश, एक विधान एक निशान' के सपने को मोदी सरकार ने पूरा किया है, इसलिए पीछे की राजनीतिक गलतियों को दोहराने का समय नहीं है। गृहमंत्री अमित शाह ने कश्मीर में विकास और सुरक्षा को लेकर बैठक की तथा कश्मीर के विकास पर जोर दिया। यह सौहार्दपूर्ण वातावरण निर्मित करने में सहायक है। कश्मीर पर नरेंद्र मोदी को अटल बिहारी वाजपेयी के सिद्धांत, 'कश्‍मीरियत, इंसानियत व जम्‍हूरियत' को पुन: स्थापित कर, कश्मीरियों के ज़ख्मों पर मरहम लगाने का कार्य करना चाहिए। मैं, 'कश्मीर की बेटी' के नाते समझती हूं कि कश्मीर में आतंकवाद, अलगाववाद और पाकिस्तान का हस्तक्षेप नियंत्रित खत्‍म नहीं हुआ है। इसलिए मेरा मनना है कि कश्मीर में लोकतंत्र की बहाली, पूर्ण राज्य का दर्जा देना, राजनीतिक नेताओं को नियमानुसार रिहा करना, कश्मीर में रोजगार पैकेज की घोषणा, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट के प्रयोग को नियंत्रित करना, आम जन मानस की आवाज़ सुनना, बार्डर एरिया में रहने वाले लोगों को विशेष संरक्षण देना आदि प्रयास तत्‍काल किए जाने चाहिए। कश्मीर में शान्तिपूर्ण राजनीतिक स्थिति को पुनर्स्थापित करना मोदी सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाएगी।

(लेखक कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ हैं, ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Next Story