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कश्मीर पर दोषारोपण की राजनीति अनुचित

चौथी बार कांग्रेस ने घाटी में जारी पत्थरबाजी का मसला उठाते हुए केन्द्र सरकार से कैफियत तलब करने की कोशिश की है।

कश्मीर पर दोषारोपण की राजनीति अनुचित
गरीबी बेकारी, भुखमरी, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार और कुशासन जैसी मूलभूत समस्याओं से लोगों का ध्यान हटाने के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ कश्मीर का राग अलापते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ को पत्र लिखने का नाटक कर रहे हैं, यह तो समझ में आ रहा है,परन्तु जब पूरे देश को इस मसले पर एकजुट खड़े दिखना चाहिए, तब यदि प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस पर निचले स्तर की राजनीति करने पर उतर आए तो ताज्जुब होता है। संसद के मानसून सत्र में यह संभवत: चौथी बार था, जब कांग्रेस ने घाटी में जारी पत्थरबाजी का मसला उठाते हुए केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार से कैफियत तलब करने की कोशिश की है।
समाजवादी पार्टी के राम गोपाल यादव ने कांग्रेस को सही जवाब दिया है यह कहते हुए कि वहां जो आग लगी है, वह नेहरू की गलती का परिणाम है, जिन्होंने आजादी के बाद 562 रियासतों को तो गृह मंत्रालय के अधीन रखा,परन्तु कश्मीर को विदेश मंत्रालय के अंतर्गत रख दिया और इसे संयुक्त राष्ट्र संघ ले जाने की भूल की, जिसका खामियाजा पूरा देश आज तक भुगत रहा है। गुलाम नबी आजाद जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। ऐसे में उम्मीद की जाती है कि वह वहां हो रही पत्थरबाजी की मूल वजह को भली भांति जानते समझते होंगे,परन्तु सदन में इस मसले को उठाते हुए वह जलेबी की तरह मुद्दे को गोल-गोल घुमाने में ही लगे रहे ताकि प्रधानमंत्री पर निशाना साध सकें।
कुछ और नहीं मिला तो उनके ट्वीट्स और मध्य प्रदेश की सभा में कश्मीर मसले पर बोलने को लेकर ही निशाना साधना शुरू कर दिया। प्रधानमंत्री किसी मुद्दे पर बोलें तो कांग्रेस को पाखंड और धोखा लगता है और नहीं बोलें तो वे इसे भी राष्ट्रीय समस्या बनाकर पेश करते दिखने लगते हैं। गुलाम नबी ने कहा कि मुंह से बोलने से कुछ नहीं होगा। दिल से बात निकलनी चाहिए तब कश्मीर में कुछ असर होगा। दो साल पुरानी मोदी सरकार को इस तरह की नसीहत देने वाले आजाद यह क्यों भूल जाते हैं कि पत्थरबाजी और सुरक्षाबलों पर अटैक पिछले दो साल की समस्या नहीं है। बरसों से यही सब होता आ रहा है।
कांग्रेस का अपने सहयोगियों के साथ वहां करीब चौबीस साल तक शासन रहा है। करीब छब्बीस साल नेशनल कान्फ्रेंस का भी राज रहा है। उमर अब्दुल्ला ने भी ट्वीट कर प्रधानमंत्री पर निशाना साधा है कि विकास से वहां का मसला हल नहीं होगा। यह राजनीतिक समस्या है। ये दोनों दलों के नेता अलग-अलग मौकों पर राज्य की सत्ता में रहे हैं। केन्द्र में साझीदार रहे हैं। अगर इतना ही आसान है तो उन्होंने तब यह मसला क्यों नहीं सुलझा लिया? वास्तविकता यह है कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव में वहां की जनता ने इन्हें पूरी तरह नकार दिया है। ये वहां जमीन खो चुके हैं। चूकि सत्ता में अब भाजपा-पीडीपी है, इसलिए गाहे-बगाहे पत्थरबाज इन्हें प्रधानमंत्री पर हमलों का मौका मय्यसर करा देते हैं।
अच्छा होता, यदि उमर अब्दुल्ला और गुलाम नबी आजाद यह बताते कि इस समस्या का उनकी नजर में समाधान क्या है? ये पत्थरबाज कहां से संचालित हैं, क्या नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस के नेताओं को नहीं पता? कई बार यह देखकर ताज्जुब होता है कि जो जुबान सीमा पार बैठे लोग बोल रहे होते हैं, लगभग वैसी ही बातें हमारे यहां के नेता अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए बोलते हुए नजर आते हैं। कश्मीर की मौजूदा समस्या पर राज्यसभा में सबसे संतुलित और नपी तुली राय राम गोपाल यादव ने ही रखी है। उनका दो टूक कहना था कि जब तक पाकिस्तान को सबक नहीं सिखाया जाएगा, तब तक वह घाटी के गुमराह नौजवानों के हाथों में पत्थर सौंपकर ऐसी नापाक हरकतों को अंजाम देता रहेगा। समय की मांग है कि विरोधी दल राजनीति करने की बजाय कश्मीर पर एकजुटता का प्रदर्शन करें।
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