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करुणानिधि ने ऐसे तय किया फर्श से अर्श तक का सफर

जस्टिस पार्टी के एक नेता अलागिरिसामी के प्रभावी भाषणों से 17 साल की उम्र में राजनीति की तरफ आकर्षित होने वाले मुथुवेल करुणानिधि छह दशक से अधिक समय तक द्रविड़ सियासत में एक ध्रुव की तरह चमकते रहे।

करुणानिधि ने ऐसे तय किया फर्श से अर्श तक का सफर
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जस्टिस पार्टी के एक नेता अलागिरिसामी के प्रभावी भाषणों से 17 साल की उम्र में राजनीति की तरफ आकर्षित होने वाले मुथुवेल करुणानिधि छह दशक से अधिक समय तक द्रविड़ सियासत में एक ध्रुव की तरह चमकते रहे। सामाजिक चेतना व सुधार को अपनी राजनीति के केंद्र में रखने वाले करुणा देश के पहले ऐसे नेता हैं, जिन्होंने पहले पीएम नेहरू से लेकर वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी तक के कार्यकाल को करीब से देखा।

वे पांच बार तमिलनाडु के सीएम रहे। वे 1957 में पहली बार विधायक बनने से लेकर 60 साल तक विधायक रहे, कभी चुनाव नहीं हारे। जातिवाद और सामाजिक भेदभाव के ख़िलाफ संघर्ष करने वाले दक्षिण भारत के बड़े समाज सुधारक पेरियार को अपना आदर्श मानने वाले करुणानिधि ने एक सुधारवादी नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई।

1940 के दशक में करुणानिधि की मुलाकात सीएन अन्नादुरै से हुई। उस वक्त अन्नादुरै 'पेरियार' ईवी रामास्वामी की पार्टी द्रविडार कझगम (डीके) में थे। अन्नादुरै को उन्होंने अपना राजनीतिक गुरु बनाया। अन्नादुरै ने जब डीके से अलग होकर द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) बनाई तो करुणा उनके संस्थापक सहयोगी बने।

जब अन्नादुरै की 1969 में मौत हो गई, तो वे पहली बार मुख्यमंत्री बने। एमजी रामचंद्रन भी डीएमके से जुड़े थे जिन्होंने बाद में अन्नाद्रमुक बनाई थी। पेरियार के समाज सुधार आंदोलन का समर्थन, हिंदी विरोध का झंडा और श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे को लेकर उन्होंने अपनी राजनीति चमकाई। कलाईनार कहलाने वाले करुणा ऐसी ही प्रतिभा थे।

उन्होंने 1947 से लेकर 2011 तक क़रीब 64 साल तक फ़िल्मों के लिए लेखन किया। इस कलम के सिपाही ने समाज में व्याप्त भेदभाव, अंधविश्वास, कुरीतियां, विषमताएं, विद्रुपताएं, दबे-कुचलों के अधिकार को अपने लेखन का विषय बनाया। करुणा ने 19 साल तक अपने मुख्यमंत्री के शासनकाल में तमिलनाडु में अनेक सुधारात्मक व्यवस्था लागू की।

क़ानून बनाकर सभी जातियों के लोगों के मंदिर के पुजारी बनने का रास्ता साफ़ किया। जमीन रखने की अधिकतम सीमा 15 एकड़ किया। लड़कियों को भी पिता की संपत्ति में बराबर का हक़ दिया। शिक्षा और नौकरी में पिछड़ी जातियों को मिलने वाले आरक्षण की सीमा 25 से बढ़ाकर 31 फ़ीसदी की।

पिछड़ों में अति पिछड़ा वर्ग बनाकर उसे 20 फ़ीसदी आरक्षण दिया, राज्य की सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण दिया। स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसद आरक्षण लागू किया। पंपिंग सेट चलाने के लिए बिजली को मुफ़्त किया। चेन्नई में मेट्रो ट्रेन सेवा की शुरुआत की। सरकारी राशन की दुकानों से महज़ एक रुपए किलो की दर पर चावल किया।

मुफ़्त स्वास्थ्य बीमा योजना की शुरुआत की। दलितों को मुफ़्त में घर दिया, हाथ रिक्शा पर पाबंदी लगाई। जातिवाद के सख्त विरोधी करुणानिधि की सामाथुवापुरम के नाम से मॉडल हाउसिंग स्कीम सबसे चर्चित रही। इस योजना के तहत दलितों और ऊंची जाति के हिंदुओं को मुफ़्त में इस शर्त पर घर दिए गए कि वो जाति के बंधन से आज़ाद होकर साथ-साथ रहेंगे।

इस योजना के तहत बनी कॉलोनियों में सवर्ण हिंदुओं और दलितों के घर अगल-बगल बनाए गए थे। राज्यों की स्वायत्तता के समर्थक रहे। करुणानिधि की कोशिशों से ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपने राज्य में स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फ़हराने का अधिकार मिल सका। तमिलनाडु को सामाजिक और आर्थिक रूप से तरक्कीपसंद राज्य बनाने में अहम योगदान देने वाले करुणा की राष्ट्रीय राजनीति में भी अतुलनीय भूमिका है।

मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें लागू कराने में सहयोग किया, जिससे पिछड़े वर्ग को 27.5 फीसदी का आरक्षण मिला। एचडी देवगौड़ा व इंद्र कुमार गुजराल को पीएम बनवाने में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही। आज की तारीख़ में ऐसे बहुत ही कम नेता बचे हैं जिन्होंने अपना सियासी करियर आज़ादी के पहले शुरू किया था। उनके जाने से निश्चित रूप से एक युग का अंत हुआ है। करुणा हमेशा सुधारवादी नेताओं के लिए प्रेरणास्रोत रहेंगे।

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