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करतारपुर कॉरिडोर ने जोड़ी भारत-पाक की प्रेम डोर

करतारपुर कॉरिडोर पर भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सार्थक बैठक में भारत पाक की प्रेम की डोर जोड़ दी है। गुरु पूर्णिमा से पहले यह बड़ा फैसला दोनों देशों के नागरिकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योकिं अगले साल गुरु नानक का 550वां प्रकाश पर्व है।

करतारपुर कॉरिडोर ने जोड़ी भारत-पाक की प्रेम डोरKartarpur Corridor India Pakistan Relation Strong

करतारपुर गलियारे पर भारत और पाक में सहमति दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक कदम है। भारत और पाकिस्तान आपस में कितनी भी शत्रुता रखें, लेकिन सच्चाई यही है कि धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से दोनों देश अलग नहीं हो सकते। पाकिस्तान का मूल भारत से सदैव जुड़ा रहेगा। आजादी के बाद पाकिस्तान के अलग होने के समय से ही पाक हुकूमत ने भारत के साथ अपनी राजनीतिक व सामरिक शत्रुता इतनी बढ़ा ली है कि दोनों मुल्कों की अवाम के बीच धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक संबंध भी इसके शिकार हो गए हैं, लेकिन करतारपुर गलियारे के बहाने दोनों देश धार्मिक रूप से करीब आ रहे हैं।

हिंदुओं और सिखों के कई तीर्थस्थल पाकिस्तान में हैं। इन्हीं में से एक है करतारपुर स्थित दरबार साहिब गुरुद्वारा। भारतीय सीमा से महज चार किलोमीटर अंदर पाकिस्तान की सीमा में यह गुरुद्वारा है, जिसे सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव ने 1522 में स्थापित किया था। कहा जाता है कि गुरु नानक देव उसी साल करतारपुर आए थे और अपना आखिरी वक्त उन्होंने यहीं गुजारा था, गुरुद्वारा वाली जगह पर ही उन्होंने 1539 में चोला त्यागा था।

यह पहला गुरुद्वारा माना जाता है जिसकी नींव गुरु साहिब ने खुद रखी थी। एक बार यह गुरद्वारा रावी नदी की बाढ़ में बह गया था, उसके बाद महाराजा रणजीत सिंह ने इसका पुनः निर्माण करवाया। यहां गुरु नानक देव जी की समाधि और कब्र दोनों मौजूद हैं। सिख धर्म में इस गुरुद्वारे का बहुत महत्व है। अगले साल गुरु नानक का 550वां प्रकाश पर्व है। तब तक भारत व पाक करतारपुर गलियारे का निर्माण पूर्ण कर लेना चाहते हैं।

दोनों मुल्कों के बीच सहमति बनने से यह गलियारा सिख श्रद्धालुओं के लिए गुरदासपुर जिला स्थित डेरा बाबा नानक साहिब से पाकिस्तान के करतारपुर स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब तक जाना सुगम बनाएगा। अभी तक सिख श्रद्धालु सीमा पर दूरबीन से इस गुरुद्वारे का दर्शन किया करते थे। या फिर वीजा लेकर पहले 125 किमी लाहौर जाना पड़ता था, फिर वहां से करतारपुर आना पड़ता था। पहली बार करतारपुर कॉरिडोर की बात फरवरी 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर यात्रा के समय की गई।

मनमोहन सरकार के समय इस पर धूल जमी रही। पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार बनने के बाद 2018 में मोदी सरकार के साथ करतारपुर कोरिडोर पर प्रगति हुई। पिछले साल 22 नवंबर को भारतीय कैबिनेट ने करतारपुर गलियारे को मंजूरी दी। 26 नवंबर को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने डेरा बाबा नानक में करतारपुर कोरिडोर का शिलान्यास किया तो 28 नवंबर को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने।

14 फरवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ काफिले पर जैश आतंकी के हमले व उसके बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद दोनों देशों में फिर तनाव बढ़ गया तो करतारपुर गलियारा ठंडे बस्ते में जाता दिखा। पाकिस्तान के नीतिगत अड़ंगे ने भी देरी कराई। पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (पीएसजीपीसी) में खालिस्तान समर्थक गोपाल सिंह चावला के होने से भी देरी हुई। चावला पर भारत की आपत्ति के बाद पाक ने उन्हें हटाया, तभी दोनों देशों में करतारपुर कॉरिडोर पर वार्ता सफल हुई।

पाक ने भारत की अधिकांश मांगें मानकर अपने में बदलाव का संकेत दिया है। पांच हजार तीर्थयात्री रोज करतारपुर जा सकेंगे, पहले पाक 700 तीर्थ यात्रियों की बात कर रहा था। भारतीय पासपोर्ट धारकों को वीजा फ्री एंट्री मिलेगी। किसी विशेष त्योहार पर 10 हजार अतिरिक्त श्रद्धालुओं को अनुमति मिलेगी। ओसीआई कार्ड धारक भारतीय मूल के लोगों को भी कॉरिडोर से वीजा फ्री प्रवेश मिलेगा। पाक ने यहां भारत विरोधी गतिविधि नहीं होने देने का वादा भी किया है।

हालांकि भारत को चौकन्ना भी रहना होगा, कहीं पाक कॉरिडोर की आड़ में तस्करी, नशे और आंतकवाद को बढ़ावा ना देने लगे। चूंकि इससे पाक के पर्यटन को अधिक लाभ मिलेगा, इसलिए यह भी उम्मीद की जा सकती है कि करतारपुर गलियारा दोनों देशों के बीच नफरत की दीवार को गिराने का एक मौका साबित हो।

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