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जयललिता के लिए कोर्ट के फैसले की अहमियत

जयललिता को कर्नाटक हाईकोर्ट ने किया रिहा

जयललिता के लिए कोर्ट के फैसले की अहमियत
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इधर, जब से भ्रष्टाचार पर सात साल की सजा होने का कानून बनने की खबर आई है, तब से मेरा दिल बैठे चला जा रहा है। दिल में यकायक भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के प्रति सहानुभूति दोगुनी हो गई है! जी तो कर रहा है कि अभी इस जालिम कानून को निशाने पर लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ आरटीआई डाल दूं, लेकिन प्रधानमंत्रीजी की स्वच्छ इमेज का ख्याल करते हुए कदम पीछे खींच लेता हूं। मगर फिर भी इस कानून के विरूद्ध अपने मन की बात कहूंगा तो जरूर। कहने में जाता ही क्या है। मैं केंद्र सरकार के इस भ्रष्टाचार निरोधक कानून का खुले दिल से विरोध करता हूं! और पूछना चाहता हूं कि आखिर देश के भ्रष्टाचारियों ने ऐसा कौन-सा महा-पाप कर दिया है, जो उन्हें भ्रष्टाचार की खातिर सात साल जेल में रहना पड़ेगा? क्या खाने-पीने-कमाने का हक केवल नेताओं-अफसरों-उद्योगपतियों को ही है, भ्रष्टाचारियों को नहीं? नेता चाहे कित्ते ही करोड़ का घपला-घोटाला कर दे फिर भी रहता वो नेता ही है, लेकिन अगर भ्रष्टाचारी दो पैसे की ऊपरी कमाई कर ले तो लोग बाग तुरंत उस पर तरह-तरह के आरोप लगाने बैठ जाते हैं! उसे व्यवस्था और देश पर कलंक बताते हैं। जबकि यह आज तक का रिकॉर्ड है कि कभी किसी भ्रष्टाचारी ने किसी नेता-अफसर-उद्योगपति पर घूसखोरी का इल्जाम नहीं लगाया है। न ही उन्हें खुलेआम गरियाया है! भ्रष्टाचारी हर किसी की भावनाओं की कद्र करना बहुत अच्छे से जानता है। जित्ता नेता देश में विकास के प्रति तत्पर रहता है, उत्ता ही भ्रष्टाचारी भी। अपने पेट या अपने परिवार की खातिर दो पैसों की ऊपरी कमाई कोई अपराध तो नहीं?
न, न, मैं इस युक्ति से कतई सहमत नहीं कि भ्रष्टाचार व्यवस्था की दीमक है! अरे, भ्रष्टाचार तो व्यवस्था को हर प्रकार के अतिरिक्त बोझ से बचाकर रखता है! जहां काम सीधे-सीधे नहीं हो पाता भ्रष्टाचारी उसे दो मिनट में सुविधा शुल्क के साथ कर डालता है। इससे अतिरिक्त समय और श्रम दोनों का बचाव होता है! मैं तो सात साल की सजा सोच-सोचकर ही हैरान व परेशान हूं। ये तो ऐसे हो गया, जैसे भ्रष्टाचारी ने किसी को अगवा कर डाला हो। किसी का माल-पानी लूट लिया हो। भले ही आप मुझसे सहमत न हों, लेकिन मुझे यह कहने में रत्तीभर हर्ज नहीं कि भ्रष्टाचारी धरती का सबसे शांत प्राणी है। उसे केवल अपने काम (भ्रष्टाचार) से मतलब रहता है। दुनिया कहां जा रही है, कौन किसके बारे में क्या कह रहा है, उसे नहीं मतलब। न वो किसी को छेड़ता है न गलियाता। फिर भी, सरकार, बुद्धिजीवी, आम आदमी उसके पीछे हाथ-पैर धोकर पड़े रहते हैं। दरअसल, कानून बनाने वालों को इस बात का एहसास ही नहीं कि भ्रष्टाचार करने में कित्ती मेहनत और अकल की जरूरत होती है! साथ-साथ, जान और इज्जत का भी कित्ता जोखिम रहता है। लोग ऐसा समझते हैं कि ऊपरी या अंडर द टेबल कमाई बहुत आसान होती है, अमां करके देखिए कभी, नानी तो क्या पुरखे तक याद आ जाएंगे, मेरा दावा है! मुद्दे की बात यह है कि भ्रष्टाचार के नाम पर भ्रष्टाचारियों का उत्पीड़न निरंतर जारी है! बहरहाल, अब समय आ गया है कि देश भर के भ्रष्टाचारी एक हों! सरकार के खिलाफ आंदोलनरत हों! ऐसे कानून अगर यों ही बनते रहे तो एक दिन भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा! भ्रष्टाचार की हिफाजत के लिए भ्रष्टाचारी संघर्ष करें, मैं उनके हमेशा साथ हूं!
अंशुमाली रस्तोगीक र्नाटक हाईकोर्ट द्वारा आय से अधिक की संपत्ति के मामले में एआईएडीएमके यानी आॅल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (अन्नाद्रमुक) प्रमुख और तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता को बरी करने का फैसला उनके और उनकी पार्टी के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों के ठीक एक साल पहले यह फैसला जयललिता के लिए एक बड़ी राहत के तौर पर आया है। अदालत के इस फैसले के बाद उनके सार्वजनिक जीवन का रास्ता भी खुल गया है। माना जा रहा हैकि अगले हफ्ते वे फिर से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगी। अगर विशेष कोर्ट का फैसला बरकरार रहता या कम सजा होती, तब भी जयललिता के राजनीतिक करियर का अंत लगभग तय था। एआईएडीएमके का भविष्य भी अधर में होता। दरअसल, 19 साल पहले यह मामला सामने आया था जब तमिलनाडु में जयललिता की विरोधी पार्टी डीएमके की सरकार थी।
पिछले वर्ष विशेष अदालत ने इस मामले में जयललिता सहित उनके तत्कालीन दत्तक पुत्र वी एन सुधाकरन, शशिकला तथा शशिकला के एक रिश्तेदार जे इलवराशी को चार साल की सजा सुनाई थी। जाहिर है, चार साल की सजा मिलने के बाद जयललिता विधायक के तौर पर स्वत: ही अयोग्य हो गयीं थीं और उन्हें मुख्यमंत्री पद भी छोड़ना पड़ा था। उन्होंने इस्तीफा देने के बाद अपने सबसे निकटतम सहयोगी पन्नीरसेल्वम को अपनी जगह मुख्यमंत्री बना दिया था। साथ ही विशेष अदालत के इस फैसले को उन्होंने ऊपरी अदालत में चुनौती दी थी क्योंकि वे इस मामले को राजनीति से प्रेरित बताती रही हैं। हालांकि जयललिता को बरी करने के फैसले को आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, क्योंकि इस केस से जुड़े कई लोगों का कहना है कि वे फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद पैदा होने वाली स्थितियों को अभी छोड़ दें तो मौजूदा समय में देश और तमिलनाडु की राजनीति में इस फैसले का व्यापक प्रभाव पड़ेगा। वैसे तो राज्य में एआईएडीएमके व डीएमके के पास ही कमोबेश सत्ता रही है, लेकिन गत लोकसभा चुनावों के बाद तमिलनाडु की राजनीति दो ध्रुवीय नहीं रही।
एक तीसरा ध्रुव भाजपा के नेतृत्व में भी पैदा हुआ, लेकिन उसे अभी बड़ी शक्ति बनने में समय लगेगा। वहीं पिछले कुछ सालों से डीएमके में फूट पड़ी हुई है। एम करुणानिधि के विरासत को लेकर उनके वारिसों के बीच झगड़े घर की चौखट से बाहर आ चुके हैं। उसके कई शीर्ष नेता इन दिनों भ्रष्टाचार के मामलों में घिरे हुए हैं। उनका भविष्य अधर में है। स्वयं उनकी बेटी कनिमोझी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आरोपी हैं। इसके अलावा करुणानिधि के बाद डीएमके के पास एक सर्वमान्य नेतृत्व की भी कमी है। ऐसी स्थिति में जयललिता राजनीतिक लाभ उठा सकती हैं। जयललिता का व्यक्तित्व प्रदेश में कद्दावर नेता का है। भारतीय राजनीति में उनका अपना एक वजूद है, जो समय-समय पर केंद्रीय राजनीति को प्रभावित करती हैं और माना जाता है कि वे अपनी सोच से कभी समझौता नहीं करती हैं। इस फैसले का यकीनन उनकी पार्टी पर मनोवैज्ञानिक असर होगा।

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