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कर्नाटक चुनाव परिणाम 2018: ओछी राजनीति पर कांग्रेस और जनता दल (धर्मनिरपेक्ष) ने जनादेश के साथ किया मजाक

भारतीय राजनीति का यह विद्रूप चेहरा फिर कर्नाटक में सबके सामने है। जिन दो राजनीतिक दलों को जनता ने नकार दिया है, वह सत्ता पर अनैतिक तरीके से काबिज होने के लिये हाथ मिला रहे हैं और जो पार्टी बहुमत से कुछ कदम दूर खड़ी है, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उसका रास्ता रोकने की कोशिशें की जा रही हैं।

कर्नाटक चुनाव परिणाम 2018: ओछी राजनीति पर कांग्रेस और जनता दल (धर्मनिरपेक्ष) ने जनादेश के साथ किया मजाक

भारतीय राजनीति का यह विद्रूप चेहरा फिर कर्नाटक में सबके सामने है। जिन दो राजनीतिक दलों को जनता ने नकार दिया है, वह सत्ता पर अनैतिक तरीके से काबिज होने के लिये हाथ मिला रहे हैं और जो पार्टी बहुमत से कुछ कदम दूर खड़ी है, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उसका रास्ता रोकने की कोशिशें की जा रही हैं। कुछ समय पहले ऐसे ही नजारे गोवा, मणिपुर और मेघालय में भी देखने को मिले थे।

गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी परंतु सरकार नहीं बना सकी। दूसरे नंबर की भाजपा दूसरे दलों और निर्दलीयों के सहयोग से दोनों स्थानों पर सरकारें बनाने में कामयाब हो गयी। अब ठीक वैसे ही हालातों से उसका कर्नाटक में सामना हो रहा है। कांग्रेस सत्ता में थी। उसने बहुमत खो दिया। पिछले चुनाव में उसे 224 सदस्यीय विधानसभा में 122 सीटें मिली थी।

भाजपा और जनता दल एस को चालीस-चालीस सीटें ही नसीब हो सकी थी परंतु इस चुनाव में भाजपा 104 सीटें हासिल कर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है जबकि जनता दल एस दो सीटें नीचे 38 पर खिसक गयी है। कांग्रेस 122 से खिसककर 78 पर आ गयी है परंतु मजाक देखिये कि जिन दो दलों कांग्रेस और जद एस को राज्य की जनता ने नकार दिया है, वह मिलकर सरकार बनाने की कोशिशों में जुट गये हैं।

दिलचस्प तथ्य यह है कि इन दोनों के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं हुआ है। ये दोनों एक-दूसरे कि खिलाफ चुनाव लड़े हैं। उत्तर प्रदेश में जनादार रखने वाली पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी के साथ जद एस का गठबंधन हुआ था, जो कर्नाटक में मात्र एक सीट ही जीत पाई है। चूकि पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की जद (एस) पिछले चुनाव के मुकाबले दो सीटें और नीचे आ गयी है,

इसलिये कहा जा सकता है कि उसे बसपा से गठबंधन का कोई खास लाभ नहीं हुआ है। हां, कई क्षेत्रों में इनके गठबंधन ने कांग्रेस को जरूर बड़ा नुकसान पहुंचाया है। राजनीतिक विश्लेषकों का तो यहां तक कहना है कि यदि कांग्रेस, जनता दल एस और बहुजन समाज पार्टी मिलकर चुनाव लड़ी होती तो भाजपा के लिये वापसी करना बेहद मुश्किल हो जाता।

दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार माने जाने वाले इस प्रदेश में पहले भी भाजपा की सरकार रह चुकी है। बीएस येदियुरप्पा तब मुख्यमंत्री बने थे। जब उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो उनके स्थान पर पहले सदानंद गौड़ा मुख्यमंत्री बनाए गये और उनके बाद जगदीश शेट्टार। हालांकि पिछले चुनाव से भाजपा तीन खेमों में बिखर गयी, जिसके चलते उसके प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ा।

येदियुरप्पा ने अलग पार्टी बना ली थी, जिसका बाद में भाजपा में विलय करा लिया गया। कर्नाटक के महासंग्राम और नतीजों पर इस कारण सबकी निगाहें टिकी हुई थी क्योंकि उत्तर भारत और पूर्वोत्तर के अधिकांश राज्यों में पिछले चार साल में हुए चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलता रहा है।

जम्मू-कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र और असम सहित गोवा, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा जैसे राज्यों में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकारों का गठन होता चला गया और पंजाब को छोड़ दें तो अधिकांश राज्यों के चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया।

2013 में जब नरेन्द्र मोदी को भाजपा-राजग की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया, तब उन्होंने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा बुलंद किया था। तब किसने कल्पना की थी कि उसे मोदी और अमित शाह की जोड़ी चरितार्थ कर दिखायेगी।

लोकसभा चुनाव हुए तो 1984 के बाद पहली बार किसी राजनीतिक दल (भाजपा) को अपने दम पर 282 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल हुआ। आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस को सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा। वह मात्र 44 सीटों पर सिमट गयी। इतना ही नहीं, वह जिन भी राज्यों की सत्ता में थी वहां भी हारती चली गयी।

अधिकांश राज्यों में भाजपा ने उसे परास्त किया। कांग्रेस ने देश की जनता का विश्वास क्यों खो दिया, यह किसी से दबी-छिपी बात नहीं है। डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान एक के बाद एक घोटालों और भ्रष्टाचार की श्रृंखला का खुलासा होता गया और उसके बारे में यह धारणा बनती चली गयी कि वह भ्रष्टाचारियों को शरण और संरक्षण देती है।

उस दौर में महंगाई आसमान छू रही थी अर्थव्यवस्था हिचकोले खाती रही और रोजगारों के उतने अवसर नहीं बन सके, जितनी जरूरत थी। भाजपा ने मोदी की अगुआई में देश को भरोसा दिया कि यह सूरत-ए-हाल बदले जा सकते हैं। ईमानदार, साफ सुथरी सरकार दी जा सकती है। गुजरात में जिन्होंने नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री के रूप में काम करते देखा था,

उन्होंने उन पर भरोसा किया और 2014 के आम चुनाव में उनके हाथों में देश की कमान सौंप दी। यह कांग्रेस, खासतौर से गांधी-नेहरू परिवार के लिये बड़ा झटका था क्योंकि मोदी और उनके दायें हाथ समझे जाने वाले अमित शाह को केन्द्रीय एजेंसियों के जरिये घेरने और बदनाम कर कानूनी शिकंजे में फंसाने की हर संभव कोशिशें तब की सरकार ने की थी।

संभवतः यही वजह भी थी कि मोदी-शाह की जोड़ी ने देश से कांग्रेस को उखाड़ फेंकने का संकल्प ले लिया और चार साल के भीतर यह कर भी दिखाया। कर्नाटक कांग्रेस का अंतिम गढ़ था, जहां से इन्होंने कांग्रेस की सरकार का बिस्तर गोल करके उसे 122 सीटों से 78 पर ला खड़ा किया। 224 सदस्यीय कर्नाटक विस में बहुमत के लिये 113 सीटों की दरकार होती है।

कांग्रेस ने बहुमत खो दिया और वह 78 सीटों पर सिमट गयी। इसी तरह जनता दल एस भी 40 से 38 सीटों पर आ गया। ऐसे में 104 सीटें लेकर सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर भाजपा उभरी, लेकिन वह बहुमत से नौ सीट दूर है। जो सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी है, उसे रोकने के लिये वह दो दल मिल गये हैं, जिन्होंने सरकार बनाने का जनादेश ही नहीं मिला है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि भाजपा को कर्नाटक की सत्ता में आने से रोकने की योजना किसी और की नहीं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की है, जो 47 जनसभायें करने के बावजूद वहां अपनी सरकार बचाने में नाकाम रहे। ऐसा लगता है कि एक-एक कर पूरे देश से बाहर हो चुकी कांग्रेस का नेतृत्व येन केन प्रकारेण कर्नाटक की सत्ता में बने रहना चाहता है। इसके पीछे उसकी सोची विचारी रणनीति है।

कांग्रेस को लगता है कि यदि कर्नाटक भी हाथ से निकल गया और वहां भाजपा काबिज हो गयी तो पार्टी की आय का एक प्रमुख स्रोत खत्म हो जायेगा। यही नहीं, अगले साल होने वाले आम चुनाव के लिये राहुल गांधी की दावेदारी को भी विपक्षी दल गंभीरता से नहीं लेंगे। कर्नाटक नये जनादेश के बावजूद ऐसे मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है, जहां से आगे का रास्ता आसान नहीं दिख रहा। भाजपा भी अपना दावा आसानी से छोड़ने के मूड में नहीं है।

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