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2019 से पहले देश का मूड बताएगा कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बिगुल बजने के साथ ही राजनीतिक दलों की सरगर्मियां तेज होना स्वाभाविक है। कनार्टक भाजपा, कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) तीनों के लिए अहम है।

2019 से पहले देश का मूड बताएगा कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बिगुल बजने के साथ ही राजनीतिक दलों की सरगर्मियां तेज होना स्वाभाविक है। कनार्टक भाजपा, कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) तीनों के लिए अहम है। इस वक्त वहां कांग्रेस की सरकार है। देश में कांग्रेस के पास कर्नाटक ही बड़ा राज्य बचा है। बाकी पंजाब, मिजोरम और पुडुचेरी में ही कांग्रेस की सरकार है। 21 राज्यों में देश के 68 फीसदी भूभाग पर भाजपा या राजग की सरकार है।

कनार्टक में वापसी कर भाजपा फिर से दक्षिण में एंट्री करना चाहती है। दक्षिणी राज्यों में से अभी तक केवल आंध्र प्रदेश में ही भाजपा चंद्रबाबू की पार्टी टीडीपी के साथ गठबंधन में थी, लेकिन हाल में यह गठबंधन भी टूट गया है। इससे पहले भी 2008 में भाजपा ने कर्नाटक में ही पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर दक्षिण में पहली एंट्री की थी। इस वक्त जिस तरह से कांग्रेस सिकुड़ रही है और कनार्टक में उसकी सरकार के प्रति एंटी-इनकंबेंसी फेक्टर है,

उसमें भाजपा को कर्नाटक में वापसी करने की पूरी उम्मीद है। 2008 से 2013 तक भाजपा की ही सरकार थी। बीएस येद्दियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा की पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार वहां बनी थी। येद्दियुरप्पा पर घोटाले के आरोप लगने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था, उनके बाद डीवी सदानंद गौड़ा व जगदीश शेट्टार भाजपा सरकार में सीएम बने। उस वक्त नाराज येद्दियुरप्पा ने भाजपा छोड़ दी थी और कर्नाटक जनता पार्टी बनाई थी।

येद्दियुरप्पा के भाजपा से अलग होने के चलते 2013 में भाजपा की हार हो गई थी और कांग्रेस सत्ता में आई थी। इस बार येद्दियुरप्पा फिर से भाजपा के साथ हैं। 80-90 के दशक में एक समय रामकृष्ण हेगड़े जैसे गैर कांग्रेसी नेता कर्नाटक के प्रमुख चेहरा रहे हैं। आज भाजपा के पास येद्दियुरप्पा और कांग्रेस के पास वर्तमान सीएम सिद्धारमैया ही प्रमुख चेहरे हैं। 224 सीटों वाली कर्नाटक विधानसभा में 2013 में कांग्रेस को 36.6 फीसदी, जेडीएस को 20.2 फीसदी व भाजपा को 19.9 फीसदी वोट मिले थे।

लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सबसे अधिक 43.3 फीसदी मत के साथ कुल 28 लोकसभा सीट में से 17 सीटें मिली थीं। 9 सीटों व 41.2 फीसदी वोट के साथ कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही थी। जदएस को केवल 11.1 फीसदी वोट व दो सीटें मिली थीं। इसलिए भाजपा का पलड़ा इस वक्त भारी लग रहा है। हालांकि कांग्रेस ने सत्ता में वापसी के लिए लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने का दांव खेला है।

दूसरी ओर सबसे अधिक दलित वोट वाले इस प्रदेश में जदएस ने मयावती की पार्टी बसपा के साथ गठबंधन किया है। कर्नाटक में दलित 19 फीसदी, लिंगायत 17 फीसदी, मुसलमान 16, वोक्कालिगा 11, ओबीसी 16 प्रतिशत, कुरुबा 7 फीसदी, अनुसूचित जनजाति 5 फीसदी व ब्राह्मण 3 फीसदी हैं। वोक्कालिगा समुदाय जदएस के वोट बैंक माने जाते हैं। ऐसे में दलित व वोक्कालिगा अगर एक हो गए तो जदएस-बसपा का पलड़ा मजबूत माना जाएगा।

कर्नाटक में इस बार भाजपा, कांग्रेस व जदएस-बसपा गठबंधन के बीच त्रिकोणीय मुकाबला की उम्मीद भी है। पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा व उनके बेटे कुमारस्वामी की पार्टी जदएस के लिए राजनीतिक अस्तित्व का प्रश्न है। इस राज्य में अभी तक अधिकांश मुख्यमंत्री लिंगायत या वोक्कालिगा समुदाय से रहे हैं, हालांकि सिद्धारमैया कुरुबा समुदाय से हैं। कर्नाटक की सौ सीटों पर लिंगायत का प्रभाव है।

लिंगायत अगड़ी जाति मानी जाती है और भाजपा का बड़ा वोट बैंक भी यही समुदाय है। भाजपा नेता व सीएम के दावेदार येद्दियुरप्पा भी लिंगायत समुदाय से ही हैं। कांग्रेस सरकार की ओर से लिंगायत को अलग धर्म के रूप में मान्यता देने से चुनाव पर कितना असर पड़ेगा यह वक्त ही बताएगा। कर्नाटक चुनाव नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राहुल गांधी के लिए भी महत्वपूर्ण है। चूंकि इस चुनाव के नतीजे देश के मूड को बयां करेंगे, इसलिए ये 2019 में लोकसभा चुनाव के लिए भी अहम हैं। भाजपा व कांग्रेस दोनों को अपनी स्थिति का पता लग जाएगा।

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