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डॉ़ चंद्र त्रिखा का लेख : राजनीतिज्ञों को कबीर का मशविरा

चुनावी दहलीज पर ढेरों सबक बिखरे रहते हैं, मगर राजनीति की बिसात पर इनका कोई महत्व (Importance) नहीं है। मतदाता का मिजाज पढ़ना शायद सर्वाधिक जोखिम भरा काम है। देश को संविधान देने वाले, अपने समय के सबसे प्रखर विचारक एवं चिंतक बाबा साहब अंबेडकर को भारतीय संविधान का सूत्रधार माना गया। तिहास बहुत कुछ सिखाता है, मगर कोई नहीं सीखता। इतिहास फिर अपने आपको दोहराता है, फिर भी कोई नहीं सीखता और यही क्रम बारी-बारी दोहराया जाता है। कबीर ने कहा है 'कबिरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर पीछे-पीछे हरि िफरै, कहत, कबीर कबीर' और अगर कुछ भी याद न करने का मन हो तो हालात से कुछ सबक अपने लिए ज़रूर सीखिएगा।

डॉ़ चंद्र त्रिखा का लेख : राजनीतिज्ञों को कबीर का मशविरा
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इतिहास बहुत कुछ सिखाता है, मगर कोई नहीं सीखता। इतिहास फिर अपने आपको दोहराता है, फिर भी कोई नहीं सीखता और यही क्रम बारी-बारी दोहराया जाता है। समझाने की कोशिशें संत कबीर की ने भी की थीं।

'कबिरा! गरब न कीजिए, ऊंचा देख अवास' लेकिन सिलसिला नहीं बदला। चुनावी दहलीज पर ढेरों सबक बिखरे रहते हैं, मगर राजनीति (Politics) की बिसात पर इनका कोई महत्व नहीं है। मतदाता का मिजाज पढ़ना शायद सर्वाधिक जोखिम भरा काम है। देश को संविधान देने वाले, अपने समय के सबसे प्रखर विचारक एवं चिंतक बाबा साहब अंबेडकर को भारतीय संविधान का सूत्रधार माना गया। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कहते थे, 'मैं इस शख्स के गुणों पर घंटों बोल सकता हूं।'

मगर 1950 में संविधान के इसी महान सूत्रधार को, उत्तरी बंबई लोकसभा-चुनाव क्षेत्र में वर्ष 1951-52 के प्रथम लोकसभा चुनाव में वहां के मतदाताओं ने हरा दिया। उनके मुकाबले में कांग्रेस ने एक मामूली कार्यकर्ता खड़ा किया था। स्वयं पंडित नेहरू ने बाबा साहब के विरुद्ध चुनाव सभाओं को संबोधित किया था। इसी देश में चुनावी दहलीज़ से खाली हाथ लौटने वालों यानी पराजित होने वालों की सूची काफी लंबी है। इनमें अपने समय की सर्वाधिक सशक्त प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी, देश के लोकप्रिय राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी, लौहपुरुष सरदार पटेल की बेटी मणिबेन पटेल और बेटा डाॅ.भाई पटेल, कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके समाजवादी नेता आचार्य कृपालानी, पंजाब के सर्वाधिक सशक्त मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों, देश के प्रतिरक्षा मंत्री कृष्णा मेनन, बिहार के समर्पित राजनेता कर्पूरी ठाकुर, हरियाणा के सशक्त मुख्यमंत्री एवं देश के उप-प्रधानमंत्री चौ. देवी लाल आदि अनेक नेता शामिल हैं।

मतदाता केंद्रों की आबोहवा ही कुछ ऐसी होती है जिसे भांपना आसान नहीं होता। कुछ-कुछ 'कोरोना वायरस' जैसी। देशभर के जनमत-सर्वेक्षक अपने-अपने सर्वेक्षणों के थर्मामीटर लेकर चुनावों में अपने सर्वेक्षण और पूर्वानुमान देते हैं, मगर अपनी भूलों को स्वस्थ रूप में स्वीकार करने की कला भी इन्हें नहीं आती। वे अक्सर गलत सिद्ध होते हैं। यह सिलसिला सिर्फ भारत में नहीं है। पड़ोसी देश पाकिस्तान में वहां के मतदाता ने कायदे आज़म जिन्नाह की सगी बहन फातिमा को चुनावों में हरा दिया था, हालांकि उन्हें पूरा देश 'मादरे-मिल्लत'कहा करता था। ब्रिटेन में विंस्टन चर्चिल जैसे महान राजनीतिज्ञ को वहां के मतदाताओं ने बुरी तरह पराजित कर दिया था। ऐसा नहीं है कि मतदाता हमेशा ऐसे ही हैरान करते हैं। उन्हें समझ पाना भी कोई मुश्किल नहीं होता, मगर राजनेताओं के गिर्द जमा जुंडलियां और चाटुकार मीडिया-मुगल उन्हें वक्त की दीवार पर लिखी इबारत भी पढ़ने नहीं देते। आज भी देश में ऐसा एक भी राजनेता ढूंढने से भी नहीं मिलेगा, जिसने सार्वजनिक रूप में अपनी कमजोरियां या अपनी भूलें स्वीकार की हों। आंखों पर बंधी हुई पट्टियां खोलने का वक्त आज भी है, मगर अपने चश्मे उतारकर वस्तुस्थिति को समझने को कोई तैयार नहीं होता।

अकबर के नवरत्नों में से एक अब्दुर्रहीम खानखाना ने भी ज़माना देखा था। उन्होंने अपनी जि़ंदगी के तल्ख तजुर्बों से बहुत कुछ सीखा था। तभी उन्होंने अपने सम्राट अकबर को भी यह नसीहत दे डाली थी। 'निंदक नियरे राखिए! आंगन कुटी छुआय'। अब सत्ता के गलियारे में निंदक अर्थात्ा आलोचक का प्रवेश भी वर्जित है। राजनेता प्राय: यही मानकर चलता है कि आज भी उसका है और कल भी। जेपी आंदोलन से उपजे थे लालू यादव। मनमानी का आलम यह था कि एक बार अपनी धर्मपत्नी को भी मुख्यमंत्री के पद की शपथ दिलवा दी थी। यही मनमानी कुछ और प्रदेशों के नेताओं ने भी दिखाई थी, मगर वक्त ने किसी को नहीं बख्शा। फिर भी उनकी नियति से किसी ने सबक तो नहीं सीखा। वक्त कई बार स्वयं हांफने लगता है। उसकी कोई नहीं सुनता, न चेतावनियां, न सीख न परामर्श। राजनीति में परिवारवाद बदस्तूर जारी है। यह अलग बात है कि उत्तर प्रदेश में योगी, हरियाणा में मनोहर लाल, राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी, इस वाद से बचे हुए हैं। जब परिवार ही नहीं है तो परिवारवाद कैसा? मगर ज़रूरी यह भी है कि जुंडलियों से भी बचा जाए। 'किचन-केबिनेट' का जो मुहावरा इन्दिरा-काल में चला था, वह कहीं-कहीं आज भी जारी है। बहरहाल, सियासी-प्रदूषण थोड़ा घटेगा तो शासन तंत्र को भी सांस आएगी।

जरूरत इस बात की भी शिद्दत से महसूस होने लगी है कि मीडिया भी अपने दामन में झांके। देश के आम आदमी के पास सूचना प्राप्ति का रास्ता मीडिया ही है, मगर अभी भी देश का मीडिया पूर्वाग्रहों से लबालब भरा है। विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लगते हैं। लोग चीखने चिल्लाने वाले एंकरों से तंग आने लगे हैं। पार्टियों के प्रवक्ता अपना 'होमवर्क' धीरे-धीरे कम करते जा रहे हैं। 'फेक न्यूज़' व 'न्यूज़ प्लांट' के सिलसिले भले ही कम हुए हैं, लेकिन अभी भी जारी हैं। बेहतर है कभी-कभी मीडिया-संगठन भी अपनी भूमिकाओं पर विचार करते रहें। किसी भी शर्त पर पाठक, श्रोता व दर्शकों का विश्वास बनाए रखना चाहिए। 'कोरोना-काल' में विज्ञापन-संकट ने मीडिया पर भी संकट पैदा किए हैं, लेकिन इस संकट से मुक्ति के लिए मीडिया को भी ज़्यादा समझौतों से परहेज़ रखना होगा। आखिर प्रामाणिकता व विश्वसनीयता मीडिया के प्राणवायु हैं।

बहरहाल, संकट, कला, संस्कृति व साहित्य पर भी गंभीर है। गुलज़ार की 'किताबें झांकती हैं, बंद अलमारी के शीशों से', आज फिर प्रासंगिक हो रही है। 'ई-बुक्स' का जमाना भले ही आ चुका है, मगर किताब हाथ में लेकर पढ़ने या अखबार को एक-एक पन्ना खोलकर पढ़ने का सुख बिल्कुल अलग है। वही सुख, जो 'रूम-हीटर' के बावजूद रजाई या नर्म कंबल में अभी भी बरकरार है। किताबें छप रही हैं, बिक भी रही हैं, मगर प्रचार यही हो रहा है कि अब कौन पढ़ता है किताबों को।

हम यह तथ्य नज़रअंदाज नहीं कर सकते कि कला, संस्कृति व साहित्य की उपेक्षा करेंगे तो पूरा समाज अराजक होने लगेगा। हिंसा, अराजकता, हताशा व डिप्रेशन के खिलाफ सबसे पहली जंग साहित्य-संस्कृति व कला लड़ते हैं न कि पुलिस-तंत्र। यह भी कम तकलीफदेह नहीं है कि सूचना-प्रौद्योगिकी की वर्तमान क्रांति में मानव-जीवन के इस पहलू को उतनी तवज्जो नहीं मिलती जितनी कि ज़रूरी है। कबीर की यह बात भी याद रखिए-

'कबिरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर पीछे-पीछे हरि िफरै, कहत, कबीर कबीर' और अगर कुछ भी याद न करने का मन हो तो हालात से कुछ सबक अपने लिए, अपने परिवार के लिए, अपनी पार्टी के लिए और अपने आसपास के दोस्तों के लिए ज़रूर सीखिएगा। जि़ंदगी इतनी पेचीदा भी नहीं है कि सहज एवं आसान तरीके से न काटी जा सके।

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