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जजों की नियुक्तियों पर हालात जस का तस

सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ति के लिए बनाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को असंवैधानिक करार दिया है।

जजों की नियुक्तियों पर हालात जस का तस

सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ति के लिए बनाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को असंवैधानिक करार दिया है। केंद्र सरकार ने गत वर्ष अगस्त में कानून बनाकर इसकी स्थापना की थी। इसके लिए संविधान में बाकायदा संशोधन किया गया था। जाहिर है, इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट में सीनियर जजों द्वारा नए जजों को चुनने का 22 साल पुराना कॉलेजियम सिस्टम बरकरार रहेगा।

एनजेएसी कानून की वैधता को कई संस्थाओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश ने इसे पांच जजों की संवैधानिक बेंच के पास भेज दिया था। जहां लंबी बहस के बाद यह फैसला आया है। बेंच ने कहा कि एनजेएसी कानून संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। संविधान द्वारा न्यायपालिका को स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। एनजेएसी कानून से इस अधिकार में राजनीतिक हस्तक्षेप का डर होगा।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए गए फैसले के अनुसार संसद कोई भी ऐसा कानून नहीं बना सकती जो संवधिान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ करता हो। दरअसल, एनजेएसी में मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जज, केंद्रीय कानून मंत्री के अलावा दो जानकार लोगों को भी शामिल करने का प्रावधान था। जिन दो जानकार लोगों को नए आयोग में शामिल किए जाने की बात कही गई थी, उनका चयन मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता वाली कमेटी करती। इसी पर सुप्रीम कोर्ट को सबसे ज्यादा ऐतराज है। उसका कहना है कि इसके आने से जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका हो जाएगी।

हालांकि केंद्र सरकार का तर्क है कि नई व्यवस्था में कॉलेजियम सिस्टम की कमियों को दूर किया गया था। कॉलेजियम सिस्टम 1993 में लागू हुआ था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के अलावा चार वरिष्ठतम जजों का पैनल होता है। यह कॉलेजियम ही सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर की सिफारिशें केंद्र सरकार को करता है। इन सिफारिशों के आधार पर ही सरकार द्वारा उनकी नियुक्ति की जाती रही है।

हालांकि समय के साथ इसमें कई खामियां उभर आईं, जिसे दूर करने की मांग उठने लगी। कई लोगों ने नई व्यवस्था बनाने की मांग की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज भी शामिल रहे हैं। इसी के चलते केंद्र सरकार ने नया कानून बनाया जिसे संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित किया गया था। वहीं देश के बीस राज्यों की विधानसभाओं से भी इसे मंजूरी मिली है।

एनजेएसी के पक्षधर लोगों का मानना है कि दुनिया के दूसरे देशों में भी जज स्वयं जजों को नियुक्त नहीं करते हैं, बल्कि उसमें नागरिकों द्वारा चुनी हुई सरकार की भूमिका भी रहती है इससे नियुक्ति में ज्यादा पारदर्शिता आती है। इसके अलावा देश में कॉलेजियम सिस्टम के पहले सरकारें ही जजों को नियुक्त करती रही हैं तब भी तो न्यायपालिका की आजादी बरकरार रही थी। बहरहाल, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसमें कोई खामी नहीं हो। लिहाजा, केंद्र सरकार व सुप्रीम कोर्ट को संवाद कायम कर ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जो दोनों की भावनाओं के अनुरूप हो।

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