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2जी पर जेपीसी से इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं थी

वर्ष1998 से 2009 तक टेलीकॉम लाइसेंस और 2जी स्पेक्ट्रम के वितरण तथा उनकी कीमत निर्धारण के मामलों की जांच के लिए गठित तीस सदस्यों वाली संयुक्त संसदीय समिति

2जी पर जेपीसी से इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं थी
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वर्ष1998 से 2009 तक टेलीकॉम लाइसेंस और 2जी स्पेक्ट्रम के वितरण तथा उनकी कीमत निर्धारण के मामलों की जांच के लिए गठित तीस सदस्यों वाली संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को सौंप अपनी जिम्मेवारी से तो इतिर्शी कर ली, लेकिन देश को 2जी स्पेक्ट्रम घाटाले की वास्तविक सच्चाई का अभी तक इंतजार है। जेपीसी ने ढाई साल चली जांच के दौरान 57 बैठकों और 155 घंटों के मंथन के दौरान जो रिपोर्ट दी हैवह भ्रामक है। ऐसा प्रतीत होता हैकि समिति ने सारा जोर और संसाधन 2जी घोटाले की सच्चाई देश के सामने लाने की बजाय प्रधानमंत्री और अपनी सरकार का चेहरा बचाने में लगा दिया है। जेपीसी की कार्यप्रणाली पर काफी पहले ही विवाद उठ गए थे। इसमें शामिल कांग्रेस के नेताओं का जिस तरह का रवैया था, उसे देखते हुए कईदल पहले ही बैठकों से हाथ खींच लिए थे। उसके बाद तो जेपीसी कांग्रेस और सरकार के कुछ घटक दलों की सभा में तब्दील होकर रह गईथी, तो फिर ऐसी समिति से इससे ज्यादा की आस भी नहीं की जा सकती थी। ऐसे में यदि विपक्ष यह आरोप लगा रहा हैकि यह रिपोर्ट कांग्रेस की जांच रिपोर्ट बन कर रह गई है, तो उसमें कुछ गलत नहीं है। इस रिपोर्ट के साथ सात दलों भाजपा, बीजद, तृणमूल कांग्रेस, भाकपा, माकपा, अन्नाद्रमुक और द्रमुक की ओर से असहमति पत्र भी लगे हैं। इसका अर्थ है कि समिति में शामिल ज्यादातर दल इस रिपोर्ट पर सहमत नहीं हैं। ऐसे में यह कहना क्या सही नहीं होगा कि एक आरोपी व्यक्ति ही खुद अपने आरोपों की जांच कर कह रहा है कि वह निदरेष है। दरअसल, टेलीकॉम लाइसेंस और 2जी स्पेक्ट्रम के वितरण के दौरान सरकारी खजाने को 1.76 करोड़ रुपये का नुकसान होने का आकलन कैग (भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट में किया। बाद में यह एक बड़ा घोटाला साबित हुआ। जेपीसी ने न केवल प्रधानमंत्री को पाक साफ बताया है, बल्कि कैग को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को गलत जानकारी दी। परंतु जेपीसी इस महाघोटाले के लिए ए राजा को जिम्मेवार ठहरा कर मुक्त नहीं हो सकती है। जेपीसी के अध्यक्ष पीसी चाको को यह ध्यान रखना होगा कि ए राजा भी उसी कैबिनेट के सदस्य थे जिस कांग्रेस की अगुआईवाली यूपीए सरकार के डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं। यह समझ से परे है कि केवल एक मंत्री अकेले इतना बड़ा फैसला ले सकता है और वह भी जहां बड़े पैमाने पर संसाधनों का वितरण हो रहा है उसके तथ्यों से प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को अनजान रख सकता है। यदि ए राजा आरोपी हैं तो पीएम और पीएमओ भी कुछ कम जिम्मेवार नहीं है। एक मंत्री के बहकावे में प्रधानमंत्री का आना तो और भी खतरनाक है। इससे तो नेतृत्व का लचर रवैया सामने आता है। सवाल यह भी है ए राजा को अपना पक्ष रखने के लिए जेपीसी के समक्ष क्यों नहीं आने दिया गया, जबकि वे इसकी पेशकश कर चुके थे। क्या इसीलिए कि उसके बाद मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम को बुलाने की मांग तेज हो जाती। कांग्रेस ने जेपीसी को एक मजाक बनाकर रख दिया है, जिसका काम अपराध पर पर्दा डालने का रह गया है।

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