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आलोक पुराणिक का लेख: जन-धन बैंक खाते बने सहारा

कोरोना-आपदा से ग्रस्त महिलाओं के परिवारों को तय राशि का हस्तांतरण जन-धन खातों के माध्यम से हो पा रहा है, इससे खातों की सार्थकता का पता लगता है। 22 जुलाई 2020 के आंकड़े के अनुसार कुल जन-धन खातों में करीब 22.08 करोड़ लाभार्थी महिलाएं हैं। लाभार्थियों के खाते में केंद्र सरकार ने कोरोना-आपदा से जुड़े अभियान के तहत राशि का हस्तांतरण किया।

आलोक पुराणिक का लेख:  जन-धन बैंक खाते बने सहारा
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आलोक पुराणिक

प्रधानमंत्री जन-धन ऐसी महत्वपूर्ण योजना के तौर पर चिन्हित की जा सकती है, जिसका रिश्ता वित्तीय समावेशन से है। वित्तीय समावेशन का मतलब यह है कि देश की वित्तीय व्यवस्था में देश की अधिकाधिक जनता को शामिल किया जाए। वित्तीय समावेशन से आशय सिर्फ बैंक खाते के खुलने से नहीं हैं, बीमा आदि की सुविधा भी वित्तीय समावेशन में शामिल है। बीमा सुविधा समेत अन्य कई वित्तीय लाभ भी इस जन-धन योजना में शामिल हैं। 28 अगस्त 2014 को शुरू हुई प्रधानमंत्री जनधन योजना की सबसे खास बात यह है कि यह जीरो बैलेंस अकाउंट के साथ कई सुविधाएं प्रदान करती है। इसके खाते से जुड़ी दुर्घटना बीमा की राशि पहले एक लाख रुपये थी, 28 अगस्त 2018 के बाद खोले गए खातों पर बीमा राशि बढ़ाकर 2 लाख रुपये कर दी गई है। पूरे देश में कहीं भी रकम का आसान हस्तांतरण संभव है, तमाम सरकारी योजनाओं की धनराशि का सीधा लाभ जन-धन खातों में संभव है, जैसा कि हाल में कोरोना आपदा से जुड़ी मदद के संदर्भ में देखा गया।

जन-धन योजना का विश्लेषण कई आयामों से किया जा सकता है। ताजा संदर्भ यह है कि कोरोना-जनित संकट से उपजी स्थितियों का मुकाबला करने के लिए केंद्र सरकार ने जन-धन योजना के तहत खोले गए खातों का सहारा लिया है। 26 मार्च 2020 को केंद्रीय वित्त मंत्री ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के अंतर्गत घोषित किया था कि 20.39 करोड़ से ज्यादा महिला जन-धन खाताधारियों को तीन महीने तक पांच सौ रुपये महीने दिए जाएंगे।

कोरोना-आपदा से ग्रस्त भारतीय महिलाओं के परिवारों को एक तय राशि का हस्तांतरण जन-धन खातों के माध्यम से हो पा रहा है, इससे जन-धन खातों की सार्थकता का पता लगता है। देश की कुल जनसंख्या का करीब एक तिहाई हिस्सा जन-धन खातों के दायरे में आ रहा है। 22 जुलाई 2020 के आधिकारिक आंकड़े के अनुसार कुल जन-धन खातों में करीब 22.08 करोड़ लाभार्थी महिलाएं हैं। जन-धन खातों की महिला-लाभार्थियों के खाते में केंद्र सरकार ने कोरोना-आपदा से जुड़े अभियान के तहत राशि का हस्तांतरण किया। 22 जुलाई 2020 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 40.05 करोड़ लाभार्थियों में से करीब 63.59 प्रतिशत के खाते ग्रामीण-अर्ध-शहरी इलाकों में थे। कुल जन-धन खातों के करीब 36.40 प्रतिशत खाते शहरी केंद्रों में थे। कुल 40.05 करोड़ जन-धन खाताधारकों में 29.64 करोड़ लाभार्थियों के पास रुपे डेबिट कार्ड भी थे। डेबिट कार्ड से एक अतिरिक्त सुविधा खाताधारकों को मिल जाती है। जन-धन खातों से कुछ और तथ्यों का विश्लेषण महत्वपूर्ण है। कुल 40.05 करोड़ जन-धन खातों में से करीब 79.32 प्रतिशत सार्वजनिक बैंकों के पास थे। इससे यह भी इंगित होता है कि वित्तीय समावेशन की योजनाओं में सार्वजनिक बैंक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस भूमिका को हमेशा मुनाफे के तराजू पर नहीं तोला जा सकता। कुल जन-धन खातों में से 17.52 प्रतिशत जन-धन खाते क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के पास थे। कुल जन-धन खातों के करीब 3.14 प्रतिशत खाते निजी बैंकों के पास थे।

22 जुलाई 2020 को जन-धन खातों में करीब 130547.55 करोड़ रुपये की धनराशि जमा थी। गौरतलब है कि ये जन-धन खाते शून्य जमा आधारित खाते हैं, इनमें कोई रकम रखना आवश्यक नहीं है। फिर भी 130547.55 करोड़ रुपये की जमा का आशय है कि जन-धन खाता धारक भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में राशि जमा कराकर आश्वित महसूस करते हैं। यह महत्वपूर्ण बात है। वित्त-बैंकिंग के मामलों में विश्वास पैदा करना महत्वपूर्ण होता है। यह विश्वास आसानी से नहीं जमता। 2017 में जारी रिपोर्ट-ग्लोबल फिंडेक्स रिपोर्ट में विश्व बैंक ने जन-धन योजना की तारीफ इसलिए की थी कि इस योजना ने खाताधारकों की संख्या में भारत में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी की। जन-धन योजना आलोचना से मुक्त नहीं रही है। 2016 में विमुद्रीकरण के फैसले के बाद जन-धन खातों में भारी मात्रा में रकम जमा हुई। कुछ आलोचकों का मानना था कि इस तरह से जन-धन खातों में जो रकम जमा हुई वह काले धन को सफेद में बदलने की प्रक्रिया का हिस्सा था। यानी काले धन वाले कुछ लोगों ने रकम को कुछ जन-धन खातों में जमा करवाया।

जन-धन खातों में रकम जमा रकम काली थी, सफेद थी, इस पर बहस चली। पर पूरी बहस का एक आयाम यह है कि जन-धन खाते में ही क्यों, किसी भी खाते में कोई रकम जमा करवाई जा सकती है और रिजर्व बैंक समेत तमाम संस्थाओं के पास शक्ति है कि वे उस गहराई से पड़ताल कर सकते हैं।

कुल मिलाकर यह तो साफ हुआ है कि जन-धन खातों ने समाज के महत्वपूर्ण वर्ग और अर्थव्यवस्था के निचले पायदान पर खड़े वर्ग के साथ सरकार को वित्तीय लेन-देन का मंच दे दिया है। सरकार के पास यह जानकारी है कि किसका खाता है और उस खाते के माध्यम से लेन-देन संभव है। गौरतलब यह है कि किसी आपदा के समय किसी को कोई मदद दी जाए तो उसके परिमाण के साथ उस गति का महत्व भी होता है कि जिस गति से वह मदद पहुंचाई जाती है। कोरोना स्थितियों में मदद पहुंचाने की गति बहुत तेज रही जन-धन खातों से।

इसके अतिरिक्त डेबिट कार्ड और बीमा की सुविधा महत्वपूर्ण है। आवश्यकता इस बात की है कि जन-धन खातों से जुड़े तमाम मसलों पर व्यापक जन-शिक्षण किया जाए। लोगों को समझाया जाए कि इन खातों से जुड़ी विशेषताएं क्या-क्या हैं। वित्तीय समावेशन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तत्व है, वित्तीय साक्षरता। इसका व्यापक प्रचार-प्रसार जन-धन बैंक खातों के जरिए संभव है। जन-धन खाता धारकों को यह जानने में रुचि होगी कि क्या-क्या विशेषताएं उनके खाते में है। इन्हें विस्तार से बताया जाए, उनकी अपनी भाषा यानी हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में। तब ही वित्तीय साक्षरता के उन्नत स्तर हासिल किये जा सकते हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं की नींव उच्च स्तर के वित्तीय समावेशन और वित्तीय साक्षरता पर भी टिकी होती है।

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