Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

वार्ता के इनकार से खुली अलगाववादियों की पोल

जिस तरह से उन्होंने शांतिवार्ता दूतों को अपनी चौखट से लौटाया उससे अलगाववादी हिंसा व उपद्रव के हिमायती ही साबित हुए।

वार्ता के इनकार से खुली अलगाववादियों की पोल
X
कश्मीर में अलगाववादियों का नकाब उतर गया है। दुनिया जान गई कि घाटी में कौन अमन चाहता है और कौन हिंसा व उपद्रव। जिस तरह से उन्होंने शांतिवार्ता दूतों को अपनी चौखट से लौटाया, उससे अलगाववादी हिंसा व उपद्रव के हिमायती ही साबित हुए। कश्मीर घाटी में शांति बहाली की कोशिशों में जुटी केंद्र और राज्य सरकार के वार्ता के पैगाम को ठुकराकर अलगाववादियों ने साफ कर दिया है कि अमन में उनका भरोसा नहीं है। यह भी उजागर हो गया कि वे किसी के इशारे पर चल रहे हैं और उन्हें जम्मू-कश्मीर में शांति की फिक्र नहीं है।
न ही उन्हें अपनी कौम की चिंता है। क्योंकि कश्मीर में किसी भी प्रकार की हिंसा व उपद्रव के अधिकतर शिकार वहां के अमन पसंद बहुसंख्यक ही होते हैं। गत नौ जुलाई को हिज्बुल आतंकी बुरहान वानी के सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे जाने के बाद से कश्मीर में लगातार जारी प्रायोजित अशांति के सूरतेहाल को ठीक करने के लिए देश के कई बौद्धिक समूह समेत विपक्षी दलों ने राजनीतिक वार्ता की वकालत की थी। केंद्र सरकार भी कश्मीर में वार्ता का पैगाम दे रही थी। वार्ता को लेकर पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने एक प्रतिनिधिमंडल के साथ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात की थी।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कश्मीर का दौरा किया। उसके बाद जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ्ती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नई दिल्ली में भेंट की। केंद्रीय कैबिनेट की उच्च स्तरीय बैठक हुई। फिर सर्वदलीय बैठक हुई। जिसमें तय हुआ कि एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल कश्मीर जाएगा और वहां सभी संबंधित पक्षों से बातचीत करेगा। अब जब गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अगुवाई में 26 सदस्यीय सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल दो दिवसीय दौरे पर कश्मीर पहुंचा और उनमें से विपक्षी दलों के छह सांसद रविवार को अलगाववादी व हुर्रियत नेताओं से मिलने पहुंचे।
सैयद अली शाह गिलानी ने घर का गेट तक नहीं खोला और खिड़की से ही उन्हें जाने को कह दिया। जबकि केंद्रीय डेलिगेशन के कश्मीर पहुंचने से पहले सीएम महबूबा मुफ्ती ने हुर्रियत व अलगाववादी नेताओं को वार्ता का लिखित आमंत्रण भेजा था। आप कितने भी वैचारिक मतभेद क्यों नहीं रखते हों, लेकिन किसी को दरवाजे से लौटाना इंसानियत नहीं है। ऐसे में गृहमंत्री ने ठीक ही कहा कि हुर्रियत नेताओं के डेलिगेशन से बातचीत नहीं करने का मतलब साफ है कि उनका इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत में यकीन नहीं है।
जो शांति चाहते हैं, सरकार उन सभी से बात करने को तैयार है। बातचीत के लिए सरकार के दरवाजे ही नहीं, रोशनदान तक खुले हैं। गिलानी के इनकार ने केंद्र और कश्मीर के उन सभी नेताओं व लोगों की आंखें खोल दी, जो कश्मीर में शांति बहाली को लेकर अलगाववादियों को एक पक्षकार मानते रहे हैं। हर भारत व पाक वार्ता से पहले हुर्रियत का राग अलापने वालों को भी कड़वे सच से सामना हो गया होगा। कश्मीर में आतंक और हिंसा के इतिहास गवाह हैं कि आजादी के नाम पर अलगाववादियों के हाथ निहत्थे बेकसूरों पर जुल्मों से लाल हैं। और जिनकी सोच में हिंसा हो, उनसे शांति वार्ता की उम्मीद नहीं की जा सकती है।
गिलानी के इस व्यवहार से कश्मीर के लोगों को भी समझ में आ गया होगा, वे घाटी में शांति बहाल नहीं होने देना चाहते हैं। सभी जानते हैं कि पाकिस्तान अलगाववादियों, कुछ हुर्रियत नेताओं व आतंकी गुटों की मदद से कश्मीर में आतंकवाद और हिंसा फैला रहा है। लोग यह भी जानते हैं कि सैयद अली शाह गिलानी, यासिन मलिक, मीरवाइज उमर फारूक, शब्बीर शाह जैसे अलगाववादी नेता पाकिस्तान के हाथ की कठपुतली बने हुए हैं। इस सच को कोई नहीं झुठला सकता कि जम्मू-कश्मीर का वैधानिक तरीके से भारत में विलय हुआ था और आजादी के समय से ही पाकिस्तान कश्मीर को अशांत किया हुआ है।
अब तक तो अलगाववादियों को समझ में आ जाना चाहिए कि पाकिस्तान कश्मीर का दुश्मन है। वरना इस्लामिक स्टेट होने के बावजूद कश्मीरी मुसलमानों का ही रक्त नहीं बहा रहा होता। अलगाववादियों को समझना चाहिए कि पाकिस्तान अगर आजाद कश्मीर का हिमायती होता तो पहले वह पीओके को आजाद कर एक मॉडल पेश करता। लेकिन ऐसा नहीं किया और न ही करेगा। इसलिए सभी को कश्मीर में शांति की पहल में सहयोग करना चाहिए और इसके लिए वार्ता ही श्रेष्ठ विकल्प है।
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलो करें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story
Top