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जम्मू-कश्मीर में भारी संख्या में इकट्ठे हुए आतंकवादी, सीमा पर मचा सकते हैं तांडव

कुछ दिनों पहले देश के प्रायः सभी टीवी चैनलों ने दो साल पहले सेना द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर में किए गए सर्जिकल स्ट्राइक को विस्तार से दिखाया। यह देखकर हर भारतीय का सिर गौरव से उपर उठ गया। पीछे मुड़कर देखने से सारी बातें साफ हो जाती हैं।

जम्मू-कश्मीर में  भारी संख्या में इकट्ठे हुए आतंकवादी, सीमा पर मचा सकते हैं तांडव
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कुछ दिनों पहले देश के प्रायः सभी टीवी चैनलों ने दो साल पहले सेना द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर में किए गए सर्जिकल स्ट्राइक को विस्तार से दिखाया। यह देखकर हर भारतीय का सिर गौरव से उपर उठ गया। पीछे मुड़कर देखने से सारी बातें साफ हो जाती हैं।

पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवादियों का बहुत बड़ा गिरोह जमा हो गया था। सेना की गुप्तचर शाखा ने सेना और सरकार को यह सूचना दी थी कि ये भारी मात्रा में इकट्ठे हुए आतंकवादी कभी भी सीमा पार करके जम्मू कश्मीर में तांडव मचा सकते हैं।

उसके पहले भी इन आतंकवादियों ने जम्मू कश्मीर में कहर मचाना बंद नहीं किया था। हद तो तब हो गई जब पठानकोट ऐयरवेस और उड़ी में भारतीय सेना के शिविर पर आतंकवादियों ने हमला करके निर्दोंष सैनिकों की हत्या कर दी।

चारों तरफ से आवाजें आने लगी कि मोदी सरकार को अब चुप नहीं बैठना चािहए। बहुत सोच विचार कर प्रधानमंत्री मोदी ने सेना को यह आदेश दिया कि पाकिस्तान और उसके द्वारा पोषित आतंकवादियों को सबक सिखाने के लिए पाक अधिकृत कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक किया जाए।

इस बात को पूरी तरह गुप्त रखा गया। प्लान के मुताबिक 28 और 29 सितम्बर, 2016 की रात में सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक की जिसमें लगभग 40 आतंकवादी और पाकिस्तानी फौज के जवान मारे गए।

पाकिस्तान के आकाओं को यह सपने में भी अंदेशा नहीं था कि भारत एकाएक बड़े पैमाने पर सर्जिकल स्ट्राइक करके आतंकवादियों के कैंपों को तहस नहस कर देगा और आतंकवादियों और पाकिस्तानी फौज के जवानों का काम तमाम कर देगा।

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान दिन रात यह कहता रहा कि इस तरह का सर्जिकल स्ट्राइक तो हुआ ही नहीं था। विदेशी पत्रकारों को ले जाकर पाकिस्तान के आकाओं ने उन्हें दिखाया कि यदि सर्जिकल स्ट्राइक हुआ होता तो उसके कुछ निशान तो मौजूद अवश्य होते।

सच यह है कि पाकिस्तान ने विदेशी पत्रकारों को वह स्थान दिखाया ही नहीं जहां सर्जिकल स्ट्राइक हुआ था और जहां आतंकवादियेां के कैंपों को ध्वस्त किया गया था। इस सर्जिकल स्ट्राइक के बाद देश में सेना और मोदी सरकार की जय जयकार होने लगी।

आम जनता में यह आत्मविश्वास पैदा होने लगा कि किसी भी विपरीत परिस्थिति में भारतीय सेना पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दे सकती है। दुर्भाग्यवश सेना और सरकार की तारीफ करने के बदले विपक्षी नेाताओं ने पूरी सर्जिकल स्ट्राइक को फर्जिकल स्ट्राइक बताया।

विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने इसे ‘सैनिकों के खून की दलाली' का नाम दे दिया। सरकार और सेना ने विपक्ष के नेताओं के सारे आरोपंों का खंडन किया। इसमें कोई संदेह नहीं कि विदेशों में जो भारतीय मूल के लोग बसे हुए हैं, उन्होंने भारत की सेना की सर्जिकल स्ट्राइक की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

कुछ दिनों पहले भारत के सभी टीवी चैनलों पर 28 और 29 सितम्बर के मध्य की रात को भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में जो सर्जिकल स्ट्राइक किया था उसे विस्तार से दिखाया गया। सारे देश के लोगों ने संास रोककर इस सर्जिकल स्ट्राइक को अपनी आंखांे से देखा और इसकी प्रशंसा की।

कई समाचारपत्रों ने इस सर्जिकल स्ट्राइक की तुलना पाकिस्तान में छिपे हुए ओसामा बिन लादेन का अमेरिकी सैनिकों ने जिस तरह से काम तमाम किया उससे की। सारा आॅपरेशन गुप्त रखा गया। इस बार टीवी चैनलों पर इस सर्जिकल स्ट्राइक के जो दृश्य दिखाए गए वे वास्तव में अत्यन्त ही सराहनीय हैं।

प्रधानमंत्री मोदी और उनके सलाहकार अपने दफ्तरों में बैठकर इस अभूूतपूर्व सर्जिकल स्ट्राइक के दृश्यों को पल पल अपनी नजरों से देख रहे थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि विस्तृत रूप से इस सर्जिकल स्ट्राइक को टीवी पर दिखाने से सेना का सम्मान आम भारतीयों की नजरों में बहुत बढ़ गया है।

दुर्भाग्यवश विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने इसकी फिर से कटु आलोचना शुरू करते हुए कहा कि दो वर्षों बाद इस सर्जिकल स्ट्राइक को वीडियों के जरिये टीवी पर दिखाए जाने की क्या आवश्यकता थी। ऐसा केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया गया।

इसके जवाब में सरकारी प्रवक्ता ने कहा कि देश हित को देखते हुए सेना की आलोचना नहीं की जानी चाहिए। अपनी जान पर खेलते हुए सैनिकों ने सर्जिकल स्ट्राइक की और आतंकियों के शिविरों को तहस नहस कर आतंकियों का काम तमाम करते हुए भारतीय सैनिक अपने कैंपों में सकुशल लौट आए जो कम तारीफ की बात नहीं है।

भारत के प्रायः सभी समाचारपत्रों ने विपक्षी नेताओं की औछी हरकतों और घटिया बयानों की तीखी आलोचना की। अधिकतर समाचारपत्रों ने एक स्वर में कहा कि इस सर्जिकल स्ट्राइक को टीवी चैनलों पर दिखाने से हर भारतीय के मन में सेना के प्रति सम्मान बहुत बढ़ा है। यह कहना कि इस सर्जिकल स्ट्राइक के दृश्य को टीवी पर दिखाने से मोदी सरकार को राजनीतिक लाभ होगा, गलत है।

किसी भी प्रकार के लाभ का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है। क्योंकि चुनाव अभी दूर हैं और सर्जिकल स्ट्राइक दिखाकर आम मतदाता को प्रभावित नहीं किया जा सकता है। सरकार और सेना की आलोचना करने से पहले विपक्ष के नेताओं को निष्पक्ष रूप से यह सोचना चाहिये कि देशहित सर्वोपरि है।

समय आ गया है जब हम सेना को उसके द्वारा की गई कार्रवाई के लिये प्रोत्साहित करें, उसकी समालोचना नहीं करें। 1965 के भारत-पाक युद्व के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान जय किसान' का नारा दिया था।

उसी तरह 1971 मंे जब बांग्लादेश की स्वतंत्रता का युद्व हुआ तब इंदिरा गांधी ने इसका श्रेय भारतीय सेना के जनरल मानिक शा को दिया था। सेना की प्रशंसा हमेशा से की जाती रही है। अब अकारण ही उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिए।

उन्हें बधाई देनी चाहिए कि वे अपनी जान पर खेल कर देश की रक्षा कर रहे हैं। इस संदर्भ में एक बात याद रखने की है कि हाल के वर्षों में यह प्रवृति देखी गई है कि देश के मेधावी युवक अब सेना में भर्ती होने से कतराते हैं।

सेना में विभिन्न स्तरों पर अनेक पद खाली पड़े हैं जिनके लिए योग्य उम्मीदवार मिल ही नहीं रहे हैं। अब यदि इस स्थिति में सेना की आलोचना की जाएगी तो योग्य उम्मीदवारों का मिलना प्रायः असंभव हो जाएगा जो देश हित में नहीं होगा।

कुल मिला कर हमें सर्जिकल स्ट्राइक की भूरि भूरि प्रशंसा करनी चाहिये। यह पाकिस्तान को एक मुंह तोड़ जवाब है कि यदि उसने अपनी नापाक हरकतें बंद नहीं की तो उसे फिर से इससे भी भयानक सर्जिकल स्ट्राइक झेलनी पड़ेगी।

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