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घाटी की कहानी : अलगाववाद, बेरोजगारी और कश्मीरी पंडितों का दर्द

केंद्र सरकार वहां के युवाओं के लिए रोजगार, कश्मीरी पंडितों को वापस घाटी में लाने के प्रयास करने में जुटी है। अलगाववादी घाटी में इस कदर अलग-थलग पड़ गए हैं कि वहां पंचायत से लोकसभा तक के चुनाव शांतिपूर्वक ढंग से संपन्न हो गए। कहीं से किसी तरह की हिंसा की कोई खबर नहीं आई। उरी, पठानकोट और पुलवामा की वारदातें आतंकी संगठनों की इसी कुंठा का नतीजा कही जा सकती हैं। वे हताश और निराश हो चुके हैं।

घाटी की कहानी : अलगाववाद, बेरोजगारी और कश्मीरी पंडितों का दर्द
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Jammu Kashmir Politics Story Of Separatism Unemployment and Kashmiri Pandits

कश्मीर नरेंद्र मोदी सरकार की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर है। साढ़े तीन दशकों से भी ज्यादा समय से यह प्रदेश विदेशी साजिशों को शिकार रहा है। वहां ऐसे तमाम हालात बनाने का प्रयास किया गया, जैसे 80 के दशक में पंजाब में बनाने की कोशिश की गई थी। जेहाद के नाम पर प्रदेश के भटके हुए युवाओं को गुमराह करना, अलगाववादी संगठनों से जोड़ना और फिर उन्हें पड़ोसी की नापाक साजिश के तहत खून खराबे में शामिल किया जाता रहा है।

कभी धरती का स्वर्ग कही जाने वाली घाटी में लगातार बिगड़ती स्थिति का क्षेत्रीय व कुछ राष्ट्रीय दलों ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए खूब इस्तेमाल किया, उससे हालात और भी खराब हो गए। अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीरियों को साथ लेकर वहां अमन स्थापित करने और कश्मीर को विकास की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए गंभीरता से प्रयास किए थे, लेकिन उनकी इन कोशिशों को भारत-पाक के बीच शांति न चाहने वाले तत्वों ने पलीता लगा दिया।

नरेंद्र मोदी सरकार भी कश्मीर और वहां के युवाओं को मुख्यधारा में लाने की कोशिशों में लगी है। इसके लिए सुरक्षा बलों को खुली छूट दी गई है, अलगाववाद को फंडिंग करने वाले हवाला रैकेट काे ध्वस्त किया गया है, आतंक का पालन पोषण करने वालों पर नकेल कसी गई है। इसके सार्थक नजीते भी सामने आए हैं। दहशतगर्द घाटी के महज तीन जिलों तक ही सिमटकर रह गए हैं। पिछले पांच सालों में घाटी को छोड़ दें तो देश के अन्य स्थान तो दूर आतंकी जम्मू में भी किसी वारदात को अंजाम नहीं दे पाए हैं।

केंद्र सरकार वहां के युवाओं के लिए रोजगार, कश्मीरी पंडितों को वापस घाटी में लाने के प्रयास करने में जुटी है। अलगाववादी घाटी में इस कदर अलग-थलग पड़ गए हैं कि वहां पंचायत से लोकसभा तक के चुनाव शांतिपूर्वक ढंग से संपन्न हो गए। कहीं से किसी तरह की हिंसा की कोई खबर नहीं आई। उरी, पठानकोट और पुलवामा की वारदातें आतंकी संगठनों की इसी कुंठा का नतीजा कही जा सकती हैं। वे हताश और निराश हो चुके हैं।

किसी भी तरह अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए ऐसी वारादातों को अंजाम दे रहे हैं। 30 जून से घाटी में अमरनाथ यात्रा शुरू होने वाली है। यात्रा निर्विघ्न हो और श्रद्धालु सकुशल वापस अपने घरों को लौट जाएं। इसके पुख्ता बंदोबस्त करने के लिए ही गृहमंत्री अमित शाह दो दिनों के लिए कश्मीर घाटी के दौरे पर गए और सुरक्षा इंतजामों का जायजा लिया। वहां के हालात जानने के बाद उन्होंने स्थानीय प्रशासन, सुरक्षा बलों को जरूरी हिदायतें भी दीं।

इस दौरे के दौरान यह महसूस किया गया है कि अभी कश्मीर में विधानसभा चुनाव करवाना ठीक नहीं होगा। यही कारण रहा कि जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन छह माह और बढ़ाने के लिए गृहमंत्री ने लोकसभा में प्रस्ताव रखा। ऐसा क्यों किया जा रहा है इसकी पूरी जानकारी भी गृहमंत्री ने सदन को दी। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रहने वाले युवाओं को आरक्षण देने का प्रस्ताव भी पेश किया गया। सीमा पर लगातार होने वाले युद्ध विराम के उल्लंघन के कारण इन युवाओं की शिक्षा प्रभावित होती है।

यह युवाओं को मुख्यधारा में जोड़ने की अच्छी पहल कही जा सकती है। सदन में राष्ट्रपति शासन का प्रस्ताव पास हो गया, लेकिन कांग्रेस ने इसका विरोध किया तो इसके पीछे उसके सियासी कारणों को सहज ही समझा जा सकता है। दशकों से विदेशी साजिश का शिकार रहा यह प्रदेश फिर से जन्नत बने इसके लिए जरूरी है कि सभी क्षेत्रीय व राष्ट्रीय राजनीतिक दल एकजुट हों और सियासी फायदे के लिए गलत राजनीति करने के मोह को त्यागें।

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