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जम्मू कश्मीर में मंत्रीजी के ऐसे आदेश से सेना के बलिदान, शौर्य और पराक्रम का अपमान नहीं ?

वास्तव में रमजान के लिए सीज फॉयर करवाने के पीछे मुफ्ती सरकार का आतंकवाद हितैषी नेताओं और पाकिस्तान के आंतकवादियों का मकसद भारतीय सेना से लड़ने के लिए अस्त्र-शस्त्र और नए आतंकवादियों का बैकअप तैयार करना है।

जम्मू कश्मीर में मंत्रीजी के ऐसे आदेश से सेना के बलिदान, शौर्य और पराक्रम का अपमान नहीं ?

जम्मू-कश्मीर को भारत देश के लिए सबसे बड़ा आत्मदंश कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सरकार ने जब-तब भारतीय सेना के हाथ बांधकर उसकी जो दुर्गति कश्मीर में करवाई है, उससे बड़ी दुखद विडंबना इस देश की कुछ और नहीं। रमजान के कारण सेना को पत्थरबाजों पर कार्रवाई रोकने का आदेश भारत सरकार ने दिया हुआ है। यह आदेश तब दिया, जब प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अनुरोध किया।

रमजान में आतंक और पत्थरबाजों पर प्रतिक्रिया नहीं करने के लिए आदेश पारित करना पूरी तरह गलत निर्णय था। यदि त्योहार के कारण कश्मीर के स्थानीय नागरिक शांतिपूर्ण तरीके से रहते अथवा आतंक व पत्थरबाजी नहीं करते तो सेना स्वयं ही शांत रहती। लेकिन पत्थरबाजों ने शांत नहीं रहना था। सरकार द्वारा सैनिकों के हाथ बांध दिए जाने के बाद जैसे पत्थरबाजी से अराजकता फैलाने का स्वतंत्र मौका मिल गया।

ऐसी ही घटनाओं की निगरानी कर रहे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के एक सैनिक को पत्थरबाजों ने घेर लिया। पत्थरबाज सैनिक की जीप पर चढ़ गए। जीप सहित सैनिक को कुचलने की हर संभव कोशिश की। अंत में सैनिक पत्थरबाजों की भीड़ से बचने के लिए अपने वाहन की गति बढ़ाता है और इस प्रयास में एक पत्थरबाज जीप के नीचे आकर कुचला और मारा जाता है।

इसके बाद जम्मू.कश्मीर पुलिस केरिपुब पर एफआईआर दर्ज कर देती है। क्या यह सब होने देने के लिए ही रमजान में सीज फायर का आदेश दिया था। क्या ऐसे आदेश सेना के बलिदान, शौर्य और पराक्रम का अपमान नहीं। सबसे चिंताजनक बात यह कि क्या ऐसे आदेश उस अधिसंख्य भारतीय जनता का अपमान नहीं।

वास्तव में रमजान के लिए सीज फॉयर करवाने के पीछे मुफ्ती सरकार का आतंकवाद हितैषी नेताओं और पाकिस्तान के आंतकवादियों का मकसद भारतीय सेना से लड़ने के लिए अस्त्र-शस्त्र और नए आतंकवादियों का बैकअप तैयार करना है। सेनाधिकारी और सैन्यकर्मी केंद्र सरकार के इस निर्णय से बहुत निराश थे।

पिछले चार वर्षों में केंद्र सरकार की स्पष्ट व निष्ठापूर्ण सैन्य नीति के चलते कश्मीर में आतंकरोधी अभियान में सेना बहुत आगे बढ़ चुकी है। लगभग रोज ही सेना प्रमुख आतंकियों को ढेर कर रही थी। इन परिस्थितियों में सैनिकों का आत्मसम्मान और आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था।

ऐसे में सीज फॉयर करवाने से सेना और देश के लोगों का आत्मविश्वास डगमगा गया है। ऐसे में एक महीने की लंबी अवधि तक सीज फॉयर होना मतलब आतंकियों के विरुद्ध सेना के अभियान की निरंतरता में बाधा उत्पन्न करना है। कुछ सेना अधिकारी तो कह रहे हैं कि केंद्र सरकार के सीज फॉयर वाले आदेश से सेना अपने अभियान में बुरी तरह पिछड़ गई है।

यह ऐसा ही है जैसे आतंकियों के विरुद्ध एक वर्ष पहले शुरू हुई कार्रवाई से पुनः शुरुआत करना। सीज फॉयर से आतंकी समूह लाभ की स्थिति में आ गए हैं। उन्हें फिर से अपनी आतंकी व्यवस्थाएं बनाने, इसके लिए वित्तपोषण करने और देशी-विदेशी राजनीति व कूटनति करने का भरपूर समय मिल गया है।

राज्य सरकार भी कश्मीर के लोगों के धार्मिक, राजनीतिक और अराजकतावादी हितों का ध्यान रखते हुए उसी दिशा में शासन चला रही है, जैसे आतंक और पत्थरबाजी के अनुकूल माहौल हो। लेकिन राज्य सरकार से ज्यादा अचरज केंद्र की सरकार पर हो रहा है कि आखिर वह किस उद्देश्य के लिए जम्मू में गठबंधन सरकार का हिस्सा बनी हुई है।

विभिन्न मौसमीय आपदाओं में कश्मीर के लोगों को मानवीयता के नाते सबसे ज्यादा सुरक्षा सेना के जवान ही प्रदान करते हैं। सरकारी स्तर पर भी कश्मीरियों के लिए जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएं और सेवाएं सस्ती और सुलभ हैं। इतना होने पर भी कश्मीर के संबंध में स्थायी समाधान की युक्ति नहीं निकल पाना अत्यंत दुर्भाग्यशाली है।

अधिसंख्य लोगों को भाजपा से आशा थी कि वह इस दिशा में पूर्व की सरकारों से अलग और त्वरित निर्णय लेगी, परंतु भाजपा भी अब तक कश्मीर के संदर्भ में संशयग्रस्त ही है तथा देश के लोग कश्मीर में सेना के विरुद्ध होनेवाली स्थानीय और विदेशी अराजकता से बुरी तरह दुखी हैं।

केंद्र सरकार को वहां तुरंत पीडीपी से समर्थन वापस लेकर में राष्ट्रपति शासन कलगा देना चाहिए। उसके बाद सेना को खुले हाथ देने चाहिए कि वे आतंक का समून लाश कर दे।

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