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जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता की वजह है पाकिस्तान

उनके इस बयान पर देश भर में कड़ी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक है। संसद में भी इस पर जोरदार हंगामा हुआ है।

जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता की वजह है पाकिस्तान
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रविवार को शपथ ग्रहण करने के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की आरे से बयान दिया गया कि राज्य में चुनावी माहौल बनाने में पाकिस्तान, आतंकवादियों और अलगाववादियों की अहम भूमिका रही। यह निंदनीय बयान है। यह हर लिहाज से विचित्र और राष्ट्रीय हितों के लिए खतरा बने इन सभी तत्वों को बल प्रदान करने वाला बयान है।

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उनके इस बयान पर देश भर में कड़ी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक है। संसद में भी इस पर जोरदार हंगामा हुआ है। केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाली सरकार ने भी उनके इस बयान से पूर्णत: असहमति जताई है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के माध्यम से यह साफ कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनावों के लिए बेहतर माहौल बनाने के पीछे चुनाव आयोग, राज्य की जनता और सेना का महत्वपूर्ण योगदान है।

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इन्हीं की वजह से जम्मू-कश्मीर में शांतिपूर्ण ढंग से विधानसभा चुनाव हो सके। दरअसल, जम्मू-कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भाजपा की साझा न्यूनतम कार्यक्रम के तहत गठबंधन सरकार बनी है। मुफ्ती मोहम्मद सईद पीडीपी के मुखिया हैं। दोनों दलों में राजनीतिक और वैचारिक मतभेद रहे हैं, लेकिन जनादेश की प्रकृति को देखते हुए दोनों को सरकार बनाने के लिए हाथ मिलाना पड़ा है। लिहाजा बेहतर होगा कि मुफ्ती मोहम्मद सईद किसी विवाद को जन्म देने की बजाय राज्य में विकास और सुशासन बहाल करने पर ध्यान केंद्रित करें।

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एक तरफ जब केंद्र सरकार और भाजपा राज्य में बनी नई सरकार को पूर्ण सहयोग की भावना व्यक्त कर रही है तो दूसरी तरह मुफ्ती मोहम्मद सईद के ऐसे रुख से टकराव के हालात बनेंगे, जो किसी भी सूरत में राज्य और देशहित में नहीं होगा। पूरा देश जानता है कि बीते वर्ष नवंबर-दिसंबर में संपन्न हुआ विधानसभा चुनाव भ्रष्टाचार, आतंकवाद, कुशासन और लचर प्रशासन के मुद्दे पर लड़ा किया था। समूचा जम्मू-कश्मीर पिछले दो दशकों से आतंकवाद से किस कदर ग्रस्त है इसे बताने की जरूरत नहीं है। पाकिस्तान नहीं चाहता कि राज्य में जनजीवन सामान्य हो, लोकतंत्र फले-फूले। उसका सिर्फ एक ही मकसद है कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र को बेपटरी करना।

इसके लिए वह कोई कोर कसर नहीं छोड़ता है। उसने इसी रणनीति के तहत कश्मीर में आतंकवाद को हवा दी है। सभी ने देखा कि चुनावों के दौरान आतंकवादियों ने कैसी दहशत फैलाई थी। कश्मीर के अलगाववादी भी पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली हैं। इस बार भी तमाम अलगाववादी धड़ों ने प्रदेश की जनता से चुनाव का बहिष्कार करने की अपील की थी, परंतु मतदाताओं ने लोकतंत्र में विश्वास करते हुए रिकॉर्ड 65 फीसदी मतदान किया। कुछ चरणों में तो 71 से 76 फीसदी तक मतदान हुआ। इतना भारी मतदान देश के विकसित माने जाने वाले महानगरों में नहीं होता है।

यह पाकिस्तान, आतंकवादियों और अलगाववादियों के गाल पर करारा तमाचे की तरह था। निश्चित रूप से चुनाव आयोग और सुरक्षाकर्मियों की मुस्तैदी और सजगता की वजह से ही भयमुक्त वातावरण बन पाया और लोगों ने शांतिपूर्ण तरीके से बदलाव के लिए मतदान किया। इसके लिए इनकी तरीफ होनी चाहिए।

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