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अलगाववादियों से वार्ता की नसीहत उचित नहीं

एक दिन पहले जहां पाकिस्तान के एक शिक्षाविद् ने कहा कि इस्लामाबाद की कश्मीर नीति हर तरफ केवल मुसीबतें लेकर आई है।

अलगाववादियों से वार्ता की नसीहत उचित नहीं

एक तरफ पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों में जहां कश्मीर मसले को लेकर पाक नीति की गलती का रियलाइजेशन है, तो दूसरी तरफ भारत में एक बड़ा बौद्धिक तबका है, जो अभी भी यूटोपिया में है और वे हुर्रियत से वार्ता को समाधान का बिंदु मानते हैं।

एक दिन पहले जहां पाकिस्तान के एक शिक्षाविद् ने कहा कि इस्लामाबाद की कश्मीर नीति हर तरफ केवल मुसीबतें लेकर आई है। शिक्षाविद् परवेज हुदभॉय ने डॉन में अपने लेख में कहा कि दुनियाभर के देशों की राजधानियों में इस्लामाबाद का नेतृत्व करने वाले पाक राजनयिक इस बात से भलीभांति अवगत हैं कि दुनिया कश्मीर मुद्दे को कोई तवज्जो नहीं देती।

वैचारिक पाकिस्तानियों को यह एहसास होना चाहिए कि देश की कश्मीर-पहले नीति ने हर तरफ सिर्फ मुसीबतें पैदा की हैं। प्रॉक्सी वार का इस्तेमाल विनाशकारी साबित हुआ है।

पाकिस्तानी सेना को पीओके समेत पाक स्थित सभी आतंकवादी समूहों का खात्मा करना चाहिए। ऐसे आतंकी समूह पाकिस्तानी समाज तथा सशस्त्र बलों के लिए खतरा हैं।

पाक की भारत को हजारों जख्म देने की नीति ने कसाईखाने का रूप ले लिया है और वैश्विक राजनीतिक शब्दकोष में जेहाद एक कुरूप शब्द बन गया है। वहीं ठीक उसी दिन स्वामी अग्निवेश जैसे कुछेक बुद्धिजीवी व सामाजिक कार्यकर्ता और कुछ विपक्ष के नेता सरकार को हुर्रियत से वार्ता की सलाह दे रहे हैं।

हमारे देश के कुछेक यूटोपियाई बुद्धिजीवियों, विचारकों व नेताओं को लगता है कि कश्मीर समस्या का हल हुर्रियत से वार्ता है, जबकि ताजा स्टिंग ऑपरेशन में साफ दिख रहा है कि हुर्रियत के नेता पाक के भाड़े टट्टू बने हुए हैं। वे सोच-विचार और नीति से पाकपरस्त हैं और कश्मीर में भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।

भारत से वार्ता में पाकिस्तान हमेशा हुर्रियत को बीच में लाता रहा है। आज से नहीं वर्षों से हुर्रियत के अलगाववादी धड़े भारत के खिलाफ आग उगलते रहे हैं। अचरज की बात तो यह रही है कि कांग्रेस नीत सरकार के समय अलगाववादी नेता आर्थिक मदद और सुरक्षा भारत सरकार से लेते रहे हैं और कश्मीर में आतंकवाद व हिंसा का जख्म भी भारत को ही देते रहे हैं।

कश्मीर में शांति के भारत व पाक के प्रयासों को न ही कश्मीरी अलगाववादी और न ही पाक स्थित लश्कर व जैश जैसे जेहादी आतंकी गुट ने कभी सफल होने दिया है। जब-जब भारत व पाक वार्ता टेबल पर आए हैं, भारत के सैयद अहमद शाह गिलानी, यासिन मलिक, शब्बीर शाह, उमरवाइज फारूख, आसिया अंद्राबी, मसर्रत आलम जैसे हुर्रियत व कश्मीरी अलगाववादी नेता और पाक के हाफिज सईद, अजहर मसूद जैसे आतंकियों ने वार्ता को डिरेल करने की पूरी कोशिश की है।

ये दोनों ओर के परजीवी तत्व हैं, जो पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई व पाक फौज की कठपुतली बने हुए हैं। भारत के बुद्धिजीवियों व विचारकों को यह भलीभांति जानना चाहिए कि कश्मीर के हुर्रियत व अलगाववादी नेताओं से वार्ता का कोई नतीजा नहीं निकलेगा। वे चाहते ही नहीं है कि कश्मीर में शांति हो। उन्हें कश्मीर को अशांत रखने का ही पाक से पैसा मिलता है।

वर्तमान केंद्र सरकार ने कश्मीर में शांति की हर कोशिश की हैै। केंद्र सरकार ने वार्ता के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल श्रीनगर भेजा, लेकिन क्या हुआ, गिलानी ने दरवाजा तक नहीं खोला। कोई भी अलगाववादी सर्वदलीय प्रतिनिधि से नहीं मिला। तो जो वार्ता करना ही नहीं चाहते हैं, उनसे वार्ता के लिए सरकार की नसीहत देने का क्या मतलब है? कश्मीरी अलगाववादियों से वार्ता नहीं करने की सरकार की नीति बिल्कुल सही ट्रैक पर है।

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि कश्मीर भी हमारा है और कश्मीरी भी हमारे हैं, एनडीए सरकार कश्मीर का स्थाई समाधान जल्द ढूंढ लेगी, तो हमें सरकार की नीति पर भरोसा होना चाहिए। जो लोग हिंसा की भाषा समझते हैं, वे वार्ता की भाषा नहीं समझेंगे। हमारे विचारकों व विपक्षी नेताओं को अगर वाकई कश्मीर समस्या की चिंता है तो उन्हें सरकार का साथ देना चाहिए।

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