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कृष्ण मोहन झा का लेख: श्रमिकों का दिल जीतना जरूरी

केंद्र ने फिलहाल 6 विशेष श्रमिक ट्रेन प्रारंभ की हैं जो दूसरे राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूरों की विशाल संख्या को देखते हुए काफी कम प्रतीत होती हैं लेकिन यह निसंदेह संतोष का विषय है कि अब यह सिलसिला आगे भी चलता रहेगा।

कृष्ण मोहन झा का लेख: श्रमिकों का दिल जीतना जरूरी

कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लाॅकडाउन की घोषणा के बाद जो लाखों प्रवासी मजदूर करीब डेढ़ माह से दूसरे राज्यों में फंसे हुए थे अब उनकी घर वापसी का रास्ता साफ हो गया है। केंद्र ने फिलहाल 6 विशेष श्रमिक ट्रेन प्रारंभ की हैं जो दूसरे राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूरों की विशाल संख्या को देखते हुए काफी कम प्रतीत होती हैं लेकिन यह निसंदेह संतोष का विषय है कि अब यह सिलसिला आगे भी चलता रहेगा।

प्रवासी मजदूरों को वापस लाने की मांग ने तब जोर पकड़ा जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ कोटा में फंसे अपने राज्य के छात्रों को बसों के जरिए वापस लाने में सफल हो गए। इसके बाद दूसरे कई राज्यों की सरकारों ने कोटा से अपने राज्यों के छात्रों को वापस लाने के लिए बसें भेजना शुरू कर दिया, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह कहते हुए अपने राज्य के छात्रों को कोटा से बुलाने से इनकार कर दिया कि इसके लिए केंद्र सरकार को स्पष्ट गाइड लाइन जारी करना चाहिए। नीतीशकुमार के सख्त रुख के लिए राज्य के प्रमुख विपक्षी दल राजद ने उनकी तीखी आलोचना भी की परंतु उसका कोई असर नहीं हुआ। उधर कई राज्यों की सरकारों ने प्रवासी मजदूरों की गृह राज्य वापसी के लिए केंद्र सरकार से विशेष ट्रेन चलाने की मांग प्रारंभ कर दी।

प्रवासी मजदूरों को वापस उनके घर भेजने के लिए केंद्र सरकार ने विशेष ट्रेनें चलाने का अभी जो फैसला किया है उस पर भी विवाद शुरू हो गया है। अब केंद्र सरकार की आलोचना इस आधार पर की जा रही है कि सरकार को यह फैसला उसी समय करना चाहिए था जब देश में संपूर्ण लाॅकडाउन की घोषणा की गई थी। सरकार अगर उसी समय विशेष ट्रेनें चला देती तो संक्रमण फैलने का खतरा आज की तुलना में काफी कम होता। जो लोग या राजनीतिक दल ऐसे विवाद खड़े कर रहे हैं वे यह समझने के लिए आखिर तैयार क्यों नहीं हैं कि उस समय कोरोना वायरस के संक्रमण का फैलाव रोकना सबसे बड़ी चुनौती थी इसलिए उस समय इस चुनौती से निपटने के उपायों पर ध्यान देना जरूरी था। शायद सरकार को उस समय यह अनुमान नहीं रहा होगा कि आगे चल कर देश में कोरोना संक्रमितो की संख्या पैंतीस हजार के ऊपर पहुंच जाएगी।

यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि प्रवासी मजदूरों की सैकड़ों, हजारों में नहीं बल्कि लाखों में है। बिहार के मुख्यमंत्री के अनुसार देश के दूसरे राज्यों में काम करने वाले बिहार के प्रवासी मजदूरों की संख्या 17लाख से अधिक है। इसी तरह उत्तर प्रदेश, झारखंड, उडीसा सहित अनेक राज्यों के लाखों लोग दूसरे राज्यों में जाकर रोजी रोटी कमा रहे हैं। इन लाखों लोगों के घर लौटने का इंतजाम करना एक जटिल प्रक्रिया है। अगर सरकार पर्याप्त संख्या में विशेष ट्रेनें चलाने के लिए तैयार हो भी जाती है तो उसके बाद जब ये प्रवासी मजदूर जब अपने राज्य में पहुंचेंगे तब एक साथ इतने लोगों को रखना भी कठिन चुनौती होगा। बहुत से मजदूरों के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे अपनी टिकट खुद खरीद सकें इसलिए इनके रेल किराए के भुगतान की जिम्मेदारी राज्य सरकारें अपने ऊपर ले रही हैं। दरअसल इस संबंध में एक विस्तृत गाइड लाइन जारी किए जाने की आवश्यकता है ताकि प्रवासी मजदूरों की घर वापसी बिना किसी झंझट के संपन्न हो सके |

यहां यह बात भी विशेष उल्लेखनीय है जो प्रवासी मजदूर अपने घर वापस जा रहे हैं उनमें से बहुतों का यह कहना है कि वे अब अपने निवास स्थान की जगह के आसपास ही रोजी रोटी का कोई साधन तलाश लेंगे लेकिन वापस नहीं अाएंगे, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि इन प्रवासी मजदूरों के लिए उनके मूल राज्य में ही रोजगार के साधन उपलब्ध होते तो वे रोजगार की तलाश में अपने घर से मीलों दूर जाने का विकल्प नहीं चुनते। सवाल यह उठता है कि किसी राज्य में लाखों की संख्या में घर लौटने वाले इन मजदूरों को क्या अपने गृह राज्य में ऐसा रोजगार मिल पाएगा कि वे अपना और अपने परिवार का पेट अच्छी तरह पाल सकें। कुछ समय बाद बहुत से मजदूरों के मन में यह विचार आ सकता है कि परिवार के आर्थिक सामाजिक उन्नयन के लिए घर से मीलों दूर जाकर बेहतर नौकरी करने में ही भलाई है।

दरअसल आज आवश्यकता इस बात की है कि गृह राज्य लौटने वाले प्रवासी मजदूरों को यह भरोसा दिलाया जाए कि कुछ दिन बाद हालात बेहतर होते ही सभी उद्योग धंधे पहले की तरह चलने लगेंगे और फिर उनकी जिंदगी की गाड़ी एक बार फिर से पटरी पर आ जाएगी। हरियाणा, तेलंगाना और कर्नाटक आदि राज्यों की सरकारें इस दिशा में पहल करने के लिए आगे आई हैं। दरअसल हकीकत यह है कि अगर मजदूरों को काम चाहिए तो उद्योग जगत को भी काम काज शुरू करने के मजदूर चाहिए। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए अब यह सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे प्रवासी मजदूरों को घर वापसी के अपने फैसले पर पुनर्विचार के राजी करें। इसके लिए निराश हताश मजदूरों के दिल जीतने की जरूरत है। देखना यह है कि इस दिशा में किसी पक्ष से कोई ईमानदार कोशिश होती है अथवा नहीं लेकिन सर्वोत्तम विकल्प यही है।

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