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अरविंद जयतिलक का लेख : भुखमरी का चक्रव्यूह भेदना जरूरी

खाद्यान्न वितरण प्रणाली में लगातार सुधार, कड़ी निगरानी और कृषि क्षेत्र में नित-नए अनुसंधान के बावजूद भी भुखमरी के चक्रव्यूह का नहीं टूटना चिंता का विषय है। हाल ही में वर्ल्ड हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत 107 देशों में से 94वीं रैंक पर है। रिपोर्ट में अन्य तथ्यों पर भी प्रकाश डाला गया है। मसलन भारत की 14% आबादी कुपोषण का शिकार है, पांच साल तक के बच्चों में बाल मृत्यु दर 3.7% पर स्थिर है, अच्छी बात यह है कि 2018 के मुकाबले शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। आंकड़ों से स्पष्ट है कि भूख से निपटने की चुनौती अभी बरकरार है।

bihar congress said that there is nothing to eat in the homes of children and that they are being forced to eat by catching frogs
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प्रतीकात्मक तस्वीर

अरविंद जयतिलक

यह चिंताजनक है कि खाद्यान्न वितरण प्रणाली में लगातार सुधार, कड़ी निगरानी और कृषि क्षेत्र में नित-नए अनुसंधान के बावजूद भी भुखमरी का चक्रव्यूह टूट नहीं रहा। हाल ही में प्रकाशित वैश्विक भूख सूचकांक-2020 (वर्ल्ड हंगर इंडेक्स) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत 107 देशों में से 94वीं रैंक पर है, जबकि इस सूची में भारत के पड़ोसी देश मसलन पाकिस्तान 88वें, श्रीलंका 64वें, म्यांमार 78वें, नेपाल 73वें, बांग्लादेश 75वें और इंडोनेशिया 70वें स्थान पर है। यानी देश में भूखे लोगों की हालत नेपाल और पाकिस्तान से भी गंभीर है।

उल्लेखनीय है कि यह रिपोर्ट आयरलैंड की गैर लाभकारी संस्था कंसर्न वर्ल्डवाइड और बर्लिन स्थित वेल्थुरहिल्फे द्वारा जारी किया जाता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भूख के मामले में भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक है और बीते साल के मुकाबले इस बार मामूली सुधार हुआ है। पिछले साल की तुलना में भारत को इस बार 50 में से 27.2 अंक मिले हैं। वहीं पाकिस्तान को 24.6, बांग्लादेश को 20.4 और नेपाल को 19.4 अंक मिले हैं। गत वर्ष के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2019 में भारत 102वें और वर्ष 2018 में 103वें स्थान पर था। भारत से पीछे रवांडा, नाइजीरिया, अफगानिस्तान, लीबिया, मोजाम्बिक और चाड जैसे महज 13 देश ही हैं। रिपोर्ट में अन्य तथ्यों पर भी प्रकाश डाला गया है। मसलन भारत की 14 प्रतिशत आबादी कुपोषण का शिकार है। पांच साल के बच्चों में उम्र के लिहाज से लंबाई में कमी दर 37.4 प्रतिशत और वजन में 17.3 प्रतिशत है। पांच साल तक के बच्चों में बाल मृत्युदर 3.7 प्रतिशत पर स्थिर है। लेकिन अच्छी बात यह है कि 2018 के मुकाबले शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। इन आंकड़ों से एक बात स्पष्ट है कि भूख से निपटने की चुनौती अभी भी बरकरार है।

अभी गत वर्ष पहले ही संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ था कि भुखमरी की वजह से दुनिया की एक तिहाई आबादी कुपोषित है और उनके स्वास्थ्य सेवाओं और उत्पादकता में नुकसान के रूप में सालाना 3.5 लाख करोड़ डाॅलर की चपत लग रही है। संयुक्त राष्ट्र की मानें तो संवेदनहीनता के कारण ही भूख और कुपोषण की समस्याएं गहरा रही हैं और अगर इस पर काबू नहीं पाया गया तो 2035 तक दुनिया की आधी आबादी भूख और कुपोषण के चपेट में होगी। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक भुखमरी के शिकार अधिकांश लोग विकासशील देशों में रहते हैं। इनमें भी सर्वाधिक संख्या एशिया और अफ्रीका के देशों में हैं। यह बिडंबना ही है कि एक ओर दुनिया की बड़ी आबादी भूख से जूझ रही है वहीं दुनियाभर में अन्न की बर्बादी भी चरम पर है। एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया में सालाना 1.6 अरब टन अन्न की वैश्विक बर्बादी होती है जिसकी कीमत 1000 अरब डाॅलर है। आंकड़ों के मुताबिक विकसित देशों में अन्न की बर्बादी से 680 अरब डाॅलर और विकासशील देशों में 310 अरब डाॅलर का नुकसान होता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि अमीर देश भोजन के सदुपयोग के मामले में सबसे ज्यादा संवेदनहीन और लापरवाह हैं। इन देशों में सालाना 22 करोड़ टन अन्न बर्बाद होता है, जबकि उप सहारा अफ्रीका में सालाना कुल 23 करोड़ टन अनाज पैदा किया जाता है। अमेरिका की ही बात करें तो यहां जितना अन्न खाया जाता है उससे कहीं अधिक बर्बाद होता है। भारत भी अन्न बर्बाद करने के मामले में पीछे नहीं है। देश में हर साल उतना भोजन बर्बाद होता है जितना ब्रिटेन उपभोग करता है। भारत में कुल पैदा किए जाने वाले भोज्य पदार्थ का 40 प्रतिशत बर्बाद होता है। अर्थात हर साल भारत को अन्न की बर्बादी से करीब 50 हजार करोड़ रुपये की चपत लगती है। साथ ही बर्बाद भोजन को पैदा करने में 25 प्रतिशत स्वच्छ जल प्रयोग होता है। इसके अलावा बर्बाद हो रहे भोजन को उगाने में 30 करोड़ बैरल तेल की भी खपत होती है। यही नहीं बर्बाद हो रहे भोजन से जलवायु प्रदूषण का खतरा भी बढ़ रहा है। उसी का नतीजा है कि खाद्यान्नों में प्रोटीन और आयरन की मात्रा लगातार कम हो रही है। खाद्य वैज्ञानिकों की मानें तो कार्बन डाइ आॅक्साइड उत्सर्जन की अधिकता से भोजन से पोषक तत्व नष्ट हो रहे हैं जिसके कारण चावल, गेहूं, जौ जैसे प्रमुख खाद्यान्न में प्रोटीन की कमी होने लगी है। अगर भोज्य पदार्थों में प्रोटीन की मात्रा में कमी आई तो भारत के अलावा उप सहारा अफ्रीका के देशों के लिए भी स्थिति भयावह होगी, इसलिए कि यहां लोग पहले से ही प्रोटीन की कमी और कुपोषण से जूझ रहे हैं। दक्षिण एशिया एवं उत्तर अफ्रीका समेत दुनियाभर में पांच वर्ष से कम उम्र के 35.4 करोड़ बच्चों और 1.06 महिलाओं के इस खतरे से ग्रस्त होने की संभावनाएं हैं। इसके कारण उनके भोजन में 3.8 प्रतिशत आयरन कम हो जाएगा। फिर एनीमिया से पीड़ित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी। यूनाइटेड नेशन के फूड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट से पहले ही उद्घाटित हो चुका है कि सरकार की कई योजनाओं के बावजूद भी भारत में एक दशक में भुखमरी की समस्या में वृद्धि हुई है। देश में आज भी 30 करोड़ लोग रोज भूखे पेट सोने को मजबूर हैं, जबकि सरकारी गोदामों में हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये का अनाज सड़ जाता है। अगर अनाज को गरीबों में बांटा जाए तो भूख और कुपोषण से निपटने में मदद मिलेगी।

गौरतलब है कि विश्व बैंक ने कुपोषण की तुलना 'ब्लैक डेथ' नामक उस महामारी से की है जिसने 18वीं सदी में यूरोप की जसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। विश्व बैंक के आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में कुपोषण का दर 55 प्रतिशत है जबकि उप सहारीय अफ्रीका में यह 27 प्रतिशत के आसपास है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में हर साल कुपोषण के कारण मरने वाले पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की संख्या दस लाख से भी ज्यादा है। एसीएफ की रिपोर्ट से साफ हो चुका है कि भारत में कुपोषण जितनी बड़ी समस्या है वैसे पूरे दक्षिण एशिया में और कहीं देखने को नहीं मिला है।

अच्छी बात है कि केंद्र सरकार ने भूख व कुपोषण से निपटने के लिए राष्ट्रीय पोषण मिशन का खाका तैयार कर उसे मूर्त रूप देना शुरू कर दिया है। सरकार ने इस मिशन को सफल बनाने के लिए जमीनी स्तर पर सूचना प्रौद्योगिकी के जरिए निगरानी की व्यवस्था भी की है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने इस योजना को फलीभूत करने के लिए कड़े निर्देश भी जारी किए हैं। सरकार ने बच्चों के पोषक देखभाल के लिए एक ठोस नई प्रणाली स्थापित की है। याद होगा गत वर्ष सरकार ने विश्व बैंक की सहायता से सुदृढ़ीकरण तथा पोषण सुधार कार्यक्रम से संबंधित समेकित बाल विकास सेवाएं प्रणाली के आठ राज्यों आंध्रप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश के 2534 सर्वाधिक पिछड़े ब्लाॅकों में दो लाख भवन बनाने की हरी झंडी भी दिखा चुकी है। इसके अलावा असम, ओडिशा तथा तेलंगाना में मनरेगा योजना के अंतर्गत अगले चार वर्षों में प्रतिवर्ष 50 हजार भवन बनाया जाना भी सुनिश्चित हुआ है। लेकिन बात तब बनेगी जब बर्बाद हो रहे अन्न का सदुपयोग कर करोड़ों लोगों का पेट भरा जाएगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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