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संपादकीय लेख : देश के न्‍याय तंत्र को समावेशी बनाना जरूरी

देश में गरीबों को न्‍याय अभी भी सपना है। आज जब देश आजादी के 75वें वर्ष में है तो समावेशी न्‍याय प्रणाली पर गंभीरता से विचार किया जाना जरूरी है। 125 साल से अधिक समय पहले, गांधीजी ने कहा था कि सबसे अच्छी कानूनी प्रतिभा सबसे गरीब लोगों को उचित दरों पर उपलब्ध होनी चाहिए।

संपादकीय लेख : देश के न्‍याय तंत्र को समावेशी बनाना जरूरी
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : देश में गरीबों को न्‍याय अभी भी सपना है। आज जब देश आजादी के 75वें वर्ष में है तो समावेशी न्‍याय प्रणाली पर गंभीरता से विचार किया जाना जरूरी है। राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (नलसा) के छह सप्ताह के पैन-इंडिया लीगल अवेयरनेस एंड आउटरीच कैंपेन के शुभारंभ पर राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपील की है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं को अपने समय का एक निश्चित हिस्सा कमजोर वर्ग के लोगों को नि:शुल्क सेवाएं प्रदान करने के लिए निर्धारित करना चाहिए। राष्‍ट्रपति की यह बात आमजन को न्‍याय के संदर्भ में काफी मायने रखती है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस अल्‍तमस कबीर ने अपने कार्यकाल के दौरान एक बार रांची में कहा था कि देश में शैक्षिक दृष्टि से व न्‍यायिक दृष्टि से वंचित व अधिकार संपन्‍न दो वर्ग पनप रहा है, जिसमें वंचित वर्ग के लिए अदालतों से न्‍याय पाना बड़ी चुनौती है। नेशनल ज्‍यूडिशियल डाटा ग्रिड व सुप्रीम कोर्ट के मुतबिक आज जिला व सबोर्डिनेट अदालतों में 3.9 करोड़ केस, उच्‍च न्‍यायलयों में 58.‍5 लाख केस और सुप्रीम कोर्ट में 69 हजार से अधिक केस पैंडिंग हैं। अदालतों में पेंडिंग केस के आंकड़े बताते हैं कि हमारी न्‍याय प्रणाली में कुछ तो खामियां हैं। देश के पुलिस तंत्र की गड़बडि़यों के चलते भी अदालतों में केसों का अंबार है।

125 साल से अधिक समय पहले, गांधीजी ने कहा था कि सबसे अच्छी कानूनी प्रतिभा सबसे गरीब लोगों को उचित दरों पर उपलब्ध होनी चाहिए। राष्‍ट्रपति कोविंद ने कहा कि गांधीजी की सलाह का पालन कानूनी बिरादरी को करना चाहिए, विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में नामित वरिष्ठ अधिवक्ताओं को। चीफ जस्टिस (सीजेआई) एनवी रमणा ने भी कहा कि यदि कमजोर वर्ग अपने अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे तो समान न्याय की संवैधानिक गारंटी अर्थहीन हो जाएगी, गरीबों को न्याय तक समावेशी पहुंच प्रदान किए बिना स्थायी और समावेशी विकास हासिल नहीं किया जा सकता। इसलिए हाशिए के और वंचित वर्गों को निष्पक्ष और सुलभ न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक समावेशी कानूनी प्रणाली को बढ़ावा दिया जाना मौजूदा समय की मांग है। सभी को न्याय दिलाने के लिए समान और बाधा मुक्त पहुंच प्रदान करने के संवैधानिक उद्देश्य की दिशा में नलसा को काम करना चाहिए। आज सरकार व हमारे कानूनविदों की महती जिम्‍मेदारी है कि वह समावेशी न्‍याय व्‍यवस्‍था के लिए माहौल व इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर बनाने की दिशा में काम करें। अभी देश को संवैधानिक अर्थशास्‍त्र के लक्ष्‍य को आगे बढ़ाते हुए न्यायिक अभिजात वर्ग के युग से न्यायिक लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ना शेष है।

इसके लिए लंबित ज्‍यूडिशियल रिफॉर्म पर अमल करने की जरूरत है। कानूनी ढांचे में परिवर्तन, कानूनों में सुधार, कानूनी शिक्षा में सुधार, जनता में विधिक जागरूकता, न्याय को त्वरित एवं सस्ता बनाना, न्‍यालयों की दशा में सुधार, वकालत (बार) तंत्र में परिवर्तन, लीगल दस्तावेजों का रखरखाव आदि में सुधार लाकर व न्‍यायिक स्‍वतंत्रता सुनिश्चित करके ही ज्‍यूडिशियल रिफॉर्म को अमलीजामा पहनाया जा सकता है। पिछले पांच दशकों से भारतीय विधि आयोग, संसदीय स्थायी समितियों और सरकार द्वारा नियुक्त अन्य समितियों, उच्चतम न्यायालय की अनेक पीठ, प्रतिष्ठित वकील और न्यायाधीश, विभिन्न कानूनी संघ/संगठन और गैर सरकारी संगठनों जैसे विभिन्न कानूनी स्थापित/सरकारी प्राधिकरणों ने न्याय तंत्र में समस्याओं की पहचान की है और उनको जल्दी दूर करने का आह्वान किया है। फिर भी, ऐसी अनेक सिफ़ारिशों का प्रभावी कार्यान्वयन अब भी लंबित है। गृह मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति के अनुसार विधि आयोगों की प्राय: पचासों रिपोर्टें कार्यान्वयन की प्रतीक्षा में हैं। ज्‍यूडिशियल रिफॉर्म की राह में बजट बड़ी बाधा है। यह जीडीपी के 0.1 फीसदी से भी कम है। जिससे न्याय तंत्र के बुनियादी ढांचे में सुधार लाने के प्रति उपेक्षा, जजों की रिक्तियों को भरने में असाधारण देरी और आबादी-न्यायाधीशों का निम्न अनुपात देखने को मिलती है। दशकों से भारतीय न्यायतंत्र में सुधारों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। राष्‍ट्रपति की बातों को गंभीरता से लेते हुए सरकार को समावेशी न्‍याय तंत्र बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।

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