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सुशील राजेश का लेख : कोविड के स्रोत का खुलासा जरूरी

आज तक यह सवाल भी अनुत्तरित है कि क्या चीन में वुहान की दोनों प्रयोगशालाओं में कोरोना वायरस बनाया गया और फिर उसे दुनिया में फैला दिया गया? स्वास्थ्य संगठन यह भी नहीं मानता कि चीनी लैब में कोविड वायरस का कोई भंडारण है अथवा नहीं। जबकि ऐसे वीडियो सार्वजनिक हुए हैं कि उनके वैज्ञानिक लैब्स में चमगादड़ों पर प्रयोग कर रहे हैं। जुनहुआ नामक वैज्ञानिक को तो ‘चमगादड़ का शिकारी’ तक कहा जाता है। लिहाजा इन दलीलों और साक्ष्यों में दम है कि चीन की प्रयोगशालाओं में चमगादड़ के साथ 1004 अन्य जानवरों के वायरस भी मिलाए गए थे।

सुशील राजेश का लेख : कोविड के स्रोत का खुलासा जरूरी
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सुशील राजेश

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चीन के नये कोरोना टीके 'सिनोवैक' को आपात इस्तेमाल की मंजूरी दी है। उसे 'कोवैक्स' कार्यक्रम में भी शामिल किया गया है। संगठन ने चीन के पहले टीके को भी मान्यता दी थी, जबकि उसकी प्रभावशीलता 50 फीसदी ही पाई गई थी। जिन देशों में 'सिनोफार्म' के परीक्षण किए गए थे, उनके निष्कर्ष संदिग्ध थे, लिहाजा बहरीन मिस्र, फिलीपींस सरीखे देशों ने चीनी टीके को खारिज कर दिया है और दुबई में फाइज़र पर परीक्षण किए जा रहे हैं। बहरीन में करीब 60 फीसदी लोगों को चीनी टीके की खुराक दी जा चुकी थी। इसके बावजूद विश्व स्वास्थ्य संगठन चीन की पैरोकारी कर रहा है! आज तक यह सवाल भी अनुत्तरित है कि क्या चीन में वुहान की दोनों प्रयोगशालाओं में कोरोना वायरस बनाया गया और फिर उसे दुनिया में फैला दिया गया? स्वास्थ्य संगठन यह भी नहीं मानता कि चीनी लैब में कोविड वायरस का कोई भंडारण है अथवा नहीं। जबकि ऐसे वीडियो सार्वजनिक हुए हैं कि उनके वैज्ञानिक लैब्स में चमगादड़ों पर प्रयोग कर रहे हैं। जुनहुआ नामक वैज्ञानिक को तो 'चमगादड़ का शिकारी' तक कहा जाता है। लिहाजा इन दलीलों और साक्ष्यों में दम है कि चीन की प्रयोगशालाओं में चमगादड़ के साथ 1004 अन्य जानवरों के वायरस भी मिलाए गए थे। संभव है कि चीन के नये टीके में ये वायरस इस्तेमाल किए गए हों! यह सवालिया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी मार्च रपट में माना है कि चीन ने चमगादड़ों के जरिए संक्रमण नहीं फैलाया।

इस संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति जोसेफ बाइडेन ने खुफिया एजेंसियों से व्यापक जांच करने के जो आदेश दिए हैं, वे महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। अमेरिका इस निष्कर्ष पर पहुंचना चाहता है कि क्या कोरोना वायरस का स्रोत चीन ही है? क्या यह वायरस मानव-निर्मित है? इस संदर्भ में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में यह जांच जारी थी, जिसे बाइडेन ने गैर-जरूरी और आर्थिक अपव्यय करार देते हुए खारिज करा दिया था। यह खुलासा सीएनएन टीवी नेटवर्क ने किया था। अब राष्ट्रपति बाइडेन 90 दिन में ही जांच-रपट चाहते हैं। बीते दिनों अमेरि‍की खुफिया सूत्रों ने ही यह खबर दी थी कि चीन के वैज्ञानिक वुहान की दोनों प्रयोगशालाओं में जैविक बम और अस्त्र बनाने के प्रयोग कर रहे हैं। चीन उन अस्त्रों का, वायरस के तौर पर, दुनिया भर में प्रयोग करेगा। यदि युद्ध के आसार बने, तो इस बार जैविक, रासायनिक हथियारों वाला विश्व-युद्ध होगा! दरअसल जांच बिठाकर अमेरिका चीन की एक बार फिर घेराबंदी करना चाहता है, जबकि 'सिनोवैक' को मान्यता देकर विश्व स्वास्थ्य संगठन चीन को 'स्वास्थ्य नायकों' की पंक्ति में स्थापित करने की इच्छा रखते दिखता है। डब्‍ल्‍यूएचओ की कार्यप्रणाली सवालों में इसलिए भी लग रही है कि भारत के 'कोवैक्सीन' टीके को अभी तक मान्यता नहीं दी है, लिहाजा विदेश जाने पर ऐसे भारतीयों के लिए मुश्किल हो सकती है, जिन्होंने 'कोवैक्सीन' लिया था। आखिर पृष्ठभूमि में क्या समीकरण काम कर रहे हैं? इन सब में डब्‍ल्‍यूएचओ अपना कौन सा हित साध रहा है और किसके लिए काम कर रहा है?

चीन वायरस के संदर्भ में विश्व स्वास्थ्य संगठन की भूमिका सवालिया रही है, क्योंकि जो अंतरराष्ट्रीय जांच-दल वुहान गया था, उसमें आधे वैज्ञानिक चीनी थे अथवा चीन मूल के थे। दो वैज्ञानिकों को तो अनुमति ही नहीं मिली थी। जांच-दल ने वुहान के इर्द-गिर्द काफी जांच की थी। चीन ही ऐसा देश है, जहां चमगादड़ों की पूजा भी की जाती है और उनका शिकार भी किया जाता है। वुहान लैब से करीब 5 किलोमीटर दूरी पर चमगादड़ों और सी-फूड का बाज़ार भी है। चीन के प्रमुख वैज्ञानिक जुनहुआ के निर्देश पर 155 चमगादड़ पकड़े गए थे। तय है कि उनपर प्रयोग भी किए गए होंगे! लेकिन जांच-दल की कोई ठोस और वैज्ञानिक रपट दुनिया के फलक पर पेश क्यों नहीं की जा सकी है? विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तथाकथित रपट से खुद को अलग क्यों कर लिया है? चीन से कोरोना वायरस का फैलाव हुआ, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आज तक बुनियादी और सैद्धांतिक तौर पर इस यथार्थ को स्वीकार नहीं किया है। लिहाजा विश्व स्वास्थ्य संगठन और चीन के आपसी समीकरण संदिग्ध हैं। अमेरिका खुफिया जांच के जरिए इन सवालिया संबंधों को बेनकाब करना चाहता है।

अब 16 जून को अमेरिका और रूस के राष्ट्रपति जिनेवा में अति महत्वपूर्ण मुलाकात करने जा रहे हैं। यह भी चैंकाता है। कभी एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन रहे और वैचारिक स्तर पर भी विपरीत रहे ये दोनों देश मौजूदा कालखंड में नये संबंधों को परिभाषित करने जा रहे हैं। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन चीन का साझा विरोध साझा मुद्दा बनकर जरूर उभरा है। अब अमेरिका और चीन के दरमियान प्रतिद्वंद्विता जारी है। अमेरिका में कोरोना के स्रोत को लेकर भिन्न मत रहे हैं। राष्ट्रपति बाइडेन के प्रमुख सलाहकार एंथनी फाउची भी लैब थ्योरी का खंडन करते थे। अब उन्होंने पलटी मार ली है और वह समर्थन कर रहे हैं कि कोरोना वायरस वुहान की प्रयोगशाला में मानव-निर्मित वायरस हो सकता है। विश्वस्तर पर चीन के टीकों और समर्थक देशों के जवाब में अमेरिका ने नया कूटनीतिक निर्णय लिया है। अब वह गरीब और अफ्रीकी देशों को 'कोवैक्स' कार्यक्रम के तहत टीके मुहैया कराएगा। भारत पर फोकस महत्वपूर्ण है। बुनियादी सवाल चीनी टीके और वायरस फैलाने की साज़िश का है। अमेरिका ने विश्‍व स्वास्थ्य संगठन में अभी तक मुखर विरोध नहीं किया है। बहरहाल अमेरिकी जांच का निष्कर्ष और मकसद क्या है, इसका खुलासा बाद में ही संभव है।

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