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अवधेश कुमार का लेख: अभी हाैसला रखना जरूरी

हमारे जीवन को क्षणभंगुर कहा गया है, लेकिन हम यह सोचकर अकर्मक नहीं हो जाते कि जब आने वाले किसी क्षण में हमारी मौत होनी है तो ज्यादा उद्यम क्यों करेंे। हम हर दिन अपने जीवन को बेहतर बनाने की उम्मीद से अपने कर्मों में रत रहते हैं। कोई ऐसी अंधियारी रात नहीं हो सकती जिसका अंत सुबह से नहीं हो। हर अंधकारपूर्ण रात के बाद सूर्य का प्रकाश निकलना ही है। इसलिए बिल्कुल सच मानिए यह आपदा भी जाएगी। उसके बाद हम सब फिर स्वाभाविक भूमिका में सक्रिय होंगे। अभी रास्ता यही है कि हम स्वयं और परिजनों को सुरक्षित रखें। हौसला रखते हुए एक दूसरे की मदद करें व अन्यों को भी हौसला देने की कोशिश करें।

अवधेश कुमार का लेख:  अभी हाैसला रखना जरूरी
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अवधेश कुमार

अवधेश कुमार

निस्संदेह जिस पर विपत्ति आती है उसका दर्द वही जानता है। हम सब महसूस कर सकते हैं, लेकिन भुगतना तो उन्हीं को पड़ता है। जिनको भुगतना पड़ रहा है उनके सामने आप चाहे नीति के जितने वाक्य सुना दें तत्काल उनका मानस उसे ग्रहण करने की स्थिति में नहीं होता। चाहे कितनी बड़ी आपदा हो, चारों ओर मौत का भय व्याप्त हो, मनुष्य के नाते हमें भविष्य के लिए आशा की किरण की ही तलाश करनी होती है। अगर हमने उम्मीद खो दी, तो फिर किसी आपदा पर विजय पाना कठिन हो जाएगा। कोरोना की महाआपदा से घिरे देश में मचा कोहराम कोई भी देख सकता है। जिनके अपने या अपनों की चिताएं जली हैं उनको कहें कि हौसला बनाए रखिए... ये भी दिन गुजर जाएंगे, तो ये बातें उनके गले आसानी से नहीं उतरेंगी, बल्कि इस समय शूल की तरह चुभती हुई भी लगेंगी। एक फेसबुक पोस्ट में लोगों से हौसला बनाए रखने, अपनी सुरक्षा करने के साथ दूसरों को भी हौसला देने की अपील की थी। बड़ी संख्या में उत्तर सकारात्मक थे पर कुछ जवाब ऐसे भी थे जिनको हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। किसी ने लिखा कि अगर घर के सदस्य की या रिश्तेदार की चिता जल रही हो तो ये बातें किस काम की। उनके अनुसार एक ही दिन में कई चिताएं जलाकर लौटे हैं। ये दिन भी गुजर जाएंगे पर एक मित्र ने लिखा कि पता नहीं तब तक हम जीवित होंगे या नहीं।

ये दोनों बातें निराशाजनक लग सकती हैं, किंतु कोरोना से जिस प्रकार का घटाटोप कायम हुआ है उसमें सामान्य मनुष्य की यह स्वाभाविक दारुण अभिव्यक्ति है। जिस तरह ऑक्सीजन और औषधियों के लिए देशभर के अस्पतालों में हाहाकार मचा है, ऑक्सीजन के अभाव में लोगों के घुट-घुट कर दम तोड़ने के समाचार आ रहे हैं, अस्पतालों में मरीज को भर्ती कराने के लिए सौ जुगतें करनी पड़ रहीं है उसमें हर घर मिनट-मिनट डर और आतंक के साये में जी रहा है। व्हाट्सएप मैसेज के उत्तर में एक जानी-मानी एंकर ने लिखा कि सर, हम सब कुछ कर रहे हैं फिर भी हर क्षण इस डर में जी रहे हैं कि पता नहीं क्या होगा। यह किसी एक व्यक्ति की आवाज नहीं है पूरे देश का अंतर्भाव यही है।

कोई कुछ कहे, लेकिन इस समय पूरा भारत ऐसी ही घनघोर निराशा में जी रहा है और चिंता का शिकार है। हम सबने अपने जीवन में कई महामारियों का सामना किया है लेकिन एक-एक व्यक्ति को इतने दहशत में जीते कभी नहीं देखा। कोरोना के बारे में चिकित्सकों एवं वैज्ञानिको के एक बड़े समूह की राय है कि यह इतनी बड़ी बीमारी है नहीं जितनी बड़ी बन या बना दी गई है, किंतु यह अलग से विचार का विषय है। भारत में डर और निराशा का सामूहिक अंतर्भाव कोरोना की आपदा से बड़ी आपदा है। प्रश्न है ऐसी स्थिति में हमारे सामने रास्ता क्या है? ऐसे मुश्किल वक्त में कोई सरल उत्तर व्यावहारिक रास्ता नहीं हो सकता, लेकिन जीवन क्रम की ऐतिहासिक सच्चाई को भी हम नकार नहीं सकते। सृष्टि के आरंभ से मनुष्य ने न जाने कितनी आपदाएं, विपत्तियां, विनाशलीलाएं देखीं, उनका सामना किया और उन सबसे निकलते हुए जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। यही पूरी सृष्टि का क्रम रहा है। हमारे पौराणिक ग्रंथों में तो संपूर्ण प्रलयों का विवरण है। प्रलय में सब कुछ नष्ट हो जाता है। इसके बावजूद वहां से फिर जीवन की शुरुआत होती ही है। हर प्रलय के बाद नवसृजन यही जीवन का सच है। जो ईश्वर में विश्वास करते हैं वे मानते हैं कि हर घटित के पीछे ईश्वरीय महिमा है। कोई अवैज्ञानिक अंधविश्वासी सोच कहकर खारिज कर दे, पर ऐसी सोच से यह भावना कायम रहती है कि जब घटनाएं ईश्वर की देन है तो इनका सकारात्मक तरीके से सामना करना, सहना और जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश करते रहना है। इस धारणा से यह उम्मीद पैदा होती है कि ईश्वर ने बुरे दिन दिए हैं तो वही अच्छे दिन भी लाएगा। इस धारणा ने मनुष्य को सृष्टि के आरंभ से अभी तक हर विपरीत परिस्थितियों से जूझने और उससे उबर कर जीवन क्रम को आगे बढ़ाने की शक्ति प्रदान की है।

तो इस तरह की शक्ति हमारे आपके अंदर है और उसी से वर्तमान आपदा का भी सामना करना पड़ेगा। आप ईश्वर पर विश्वास न भी करें तो प्रकृति की गति और उसके नियमों को मानेंगे ही। अगर हर घटना की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है तो इसमें अच्छी बुरी दोनों प्रकार की घटनाएं शामिल हैं। इस सिद्धांत में ही यह सच अंतर्निहित है कि बुरी घटना की विपरीत प्रतिक्रिया अच्छी ही होगी। तो भौतिकी का यह सिद्धांत भी उम्मीद जगाती है कि निश्चित रूप से निराशा के वर्तमान घटाटोप से प्रकृति अपनी प्रतिक्रियाओं द्वारा हमें उबारेगी। हमारे यहां बुजुर्ग धर्म और इतिहास से ऐसी कहानियां बचपन से सुनाते थे, विद्यालयों की पाठ पुस्तकों में पढ़ाई जातीं थी जिनमें जीवन पर आईं विपत्तियां और उसमें अविचल रह कर जूझने और विजय पाने की प्रेरणा मिलती थी। इस दौर में साहित्य, धर्म, दर्शन, इतिहास, समाजशास्त्र आदि विषयों की ओर युवाओं की रुचि घटी है, स्कूली पाठ्य पुस्तकों से भी वैसी कथाएं गायब हैं और इन सबका परिणाम हमारे सामूहिक मनोविज्ञान पर पड़ा है। हमारे आसपास ही ऐसे परिवार होंगे या स्वयं हम ही वैसे परिवार से आते होंगे जहां किसी बीमारी या घटना में एक साथ बड़ी संख्या में हमारे प्रियजन चल बसे। ऐसी त्रासदीयों के व्यावाहारिक और मानसिक संघात से पीड़ित होते हुए भी हम अपने को संभालते हैं। यही जीवन है। जब विनाशकारी तूफान आता है तो फसलें नष्ट हो जाती हैं। बड़े-बड़े पेड़ भी जड़ों से उखड़ जाते हैं... लगता है पूरी प्रकृति बिखर गई हो, लेकिन धरती बंजर नहीं होती। बीज फिर से अंकुरित होते हैं, वनस्पतियां फिर अठखेलियां करने लगती हैं। मनुष्य अपनी जीजीविषा में फिर फसलें लगाने निकलता है और सफल होता है। जीवन क्रम इसी तरह आगे बढ़ता है। प्रकृति और जीवन के ये दोनों पहलू सच हैं। इसका कोई एक पहलू पूरा सच नहीं हो सकता। कोरोना अगर इस चक्र में तूफान है तो यकीन मानिए इसके बाद फिर जीवन की हरियाली लहलहाती दिखेगी।

हमारे जीवन को क्षणभंगुर कहा गया है, लेकिन हम यह सोचकर अकर्मक नहीं हो जाते कि जब आने वाले किसी क्षण में हमारी मौत होनी है तो ज्यादा उद्यम क्यों करेंे। हम हर दिन अपने जीवन को बेहतर बनाने की उम्मीद से अपने कर्मों में रत रहते हैं। कोई ऐसी अंधियारी रात नहीं हो सकती जिसका अंत सुबह से नहीं हो। हर अंधकारपूर्ण रात के बाद सूर्य का प्रकाश निकलना ही है। इसलिए बिल्कुल सच मानिए यह आपदा भी जाएगी। उसके बाद हम सब फिर स्वाभाविक भूमिका में सक्रिय होंगे। अभी रास्ता यही है कि हम स्वयं और परिजनों को सुरक्षित रखें। हौसला बनाए रखते हुए एक दूसरे की मदद करें व अन्यों को भी हौसला देने की कोशिश करें।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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