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आलोक पुराणिक का लेख : चीन से निपटना कठिन है, असंभव नहीं

अब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा का है, तो अब स्थितियां दूसरी हैं। चीन हमारे घर में घुसकर सरासर चोरी डकैती कर रहा है। कमजोर से कमजोर परिवार भी अपनी तरीके से घर की रक्षा के लिए लड़ता है। इस भाव के साथ चीन से लड़ना होगा। भारतीय कंपनियों को पहल लेनी होगी और सरकारों को उनका साथ देना होगा, उनका कारोबार आसान बनाना होगा।

Breaking: चीनी सेना ने आज फिर भारतीय सीमा में की घुसने की कोशिश, सुरक्षा बलों ने किया नाकाम
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Breaking: चीनी सेना ने आज फिर भारतीय सीमा में की घुसने की कोशिश, सुरक्षा बलों ने किया नाकाम

आलोक पुराणिक

चीन के 59 मोबाइल ऐप्प पर प्रतिबंध लगने के बाद स्थितियां बिलकुल बदली हुई हैं। टिकटाॅक के भारत में 12 करोड़ सक्रिय प्रयोक्ता थे। भारत तमाम चीनी कंपनियों के लिए बहुत बड़ा बाजार है। अब भारत से चीनी कंपनियों का पत्ता साफ हो रहा है। बहुत साफ तौर पर पूरी कड़ाई से यह संदेश चीन को दिया गया है कि इस बार यह संभव नहीं है कि चीन की कंपनियां भारत में आसानी से कारोबार भी करती रहें और चीन सीमा पर अतिक्रमण भी करता रहे। चीन की रणनीति यह रही कि वह सीमा विवाद और कारोबारी गतिविधियों को अलग अलग करके देखने का हामी रहा है। उसका तर्क यह है कि कारोबार और सीमा विवाद को नहीं मिलाया जाना चाहिए। कारोबार अपनी जगह चलता रहना चाहिए और सीमा विवाद से जुड़े मसलों को अलग करके रखा जाना चाहिए। चीन का आशय यह है कि सीमा पर हमारी दादागिरी वैसे ही चलेगी और पर भारत को अपने बाजार, अपने कारोबार हमारे लिए वैसे ही खुले रखने चाहिए, जैसे अब तक रहे हैं। अब हालात बिलकुल अलग हैं। अब भारत के तेवर एकदम बदले हुए हैं। चीनी मोबाइल एप्लीकेशन पर प्रतिबंध लगने के बाद पीएम मोदी लेह की अग्रिम चौकी पर जाकर संदेश दे आए हैं कि युद्ध अगर होगा तो समग्र स्तर पर होगा। भारत की सीमाएं भी चीन के लिए बंद होंगी और भारत के बाजार भी चीन के लिए बंद होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी आत्मनिर्भर भारत की बात करते हैं तो समझा जाना चाहिए कि चीनी उत्पादों के खिलाफ मुहिम की अंतर्ध्वनि इसमें से निकलती है।

भारत सरकार ने चीन से बिजली उपकरण आयात नहीं करने का फैसला लिया है। चीन ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान से भी अब भारत कोई बिजली उपकरण नहीं खरीदेगा। बिजली मंत्री आर के सिंह ने यह घोषणा की है। एक वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आरके सिंह ने कहा कि चीन और पाकिस्तान से उपकरणों के आयात को विशेष रूप से निरीक्षण के आधार पर अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने आगे कहा कि राज्य के डिस्कॉम्स यानी विद्युत वितरण कंपनियों को चीनी कंपनियों को उपकरण की आपूर्ति के आदेश नहीं देने चाहिए।

रेलवे से लेकर निजी कारोबारियों में चीन के खिलाफ रोष का माहौल है। इस आशय की खबरें आने लगी हैं कि ये मोबाइल गैर-चीनी हैं, इन्हे खरीदा जाना चाहिए। सौ में 72 स्मार्ट फोन अभी चीनी ब्रांडों के हैं, यह सच्चाई है। यह भी सच्चाई है कि चीनी फोन का गहरा क्रेज भारत में है। सरकारी विभाग, सरकारी मंत्रालय अपने स्तर पर अपनी परियोजनाओं से चीनी कंपनियों को बाहर कर सकते हैं पर समग्र स्तर पर जनता के स्तर पर, ग्राहकों के स्तर चीनी उत्पादों की जड़ें गहरी हैं, इस स्थिति की ठोस वजहें हैं।

चीन से आयातित होने वाले आइटमों में ऐसा खास क्या है। क्या भारत में वो चीजें नहीं बन सकतीं। इस सवाल का जवाब यह हो सकता है कि भारत का तकनीकी स्तर इतना उन्नत तो है कि वह खिलौने, गणेश की मूर्ति बना ले, इनका आयात भी चीन से होता है। क्यों, इसकी वजह है कि ये आइटम चीन से लेने पर सस्ते पड़ते हैं। करीब बीते दो दशकों में भारतीय मैन्युफेक्चरिंग, निर्माण क्षेत्र में चीन अपने सस्ते आइटमों की वजह से घुसा है। भारतीय कंपनियों ने अपनी मैन्युफेक्चिरंग, निर्माण बंद किया और चीन से माल मंगाकर बेचना शुरु कर दिया। निर्भरता चीन पर तकनीक के मामले में नहीं है, कीमत के मामले में है। सस्ता आइटम बनाना चीन के लिए क्यों संभव है। इसका जवाब है कि वहां आधारभूत ढांचा बहुत बहुत बढ़िया है। बिजली, पानी, सड़क का बेहतरीन इंतजाम है। परियोजनाएं लटकती नहीं हैं, चीन में संयंत्र स्थापित करने वाले कई भारतीय उद्योगपति बताते हैं कि चीन में तमाम परमिट लाइसेंस कई बार कुछ घंटों में ही मिल जाते हैं। कुछ घंटों में अनुमति भारत में लेना असंभव कार्य है। इसलिए भारत तकनीक के मामले में क्षमतावान होने के बावजूद कीमत के मामले में पिटा। भारत में कारोबारी आसानी उतनी नहीं, जितनी चीन में है। इन वजहों से भारत पिटा मैन्यूफेक्चरिंग, निर्माण के मामले में। ऐसा नहीं कि भारतीय कंपनियां चीनी कंपनियों की तरह फोन नहीं बना सकतीं, बस बात यह है कि उतने सस्ते बनाने की स्थितियां यहां नहीं हैं।

चीन में फैसलों में तेजी इसलिए भी होती है कि तानाशाही व्यवस्था है, ऊपर से फैसले आ गए तो आ गए, कोई बहस नहीं है। भारत में ऐसा नहीं है। चार स्तर की सरकारें हैं, केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय नगर निगम, नगर पालिका और ग्राम पंचायत के स्तर की सरकार। इनमें समन्वयन बहुत जरुरी है। चीन के मुकाबले भारत में मैन्युफेक्चरिंग को बढ़ाना तकनीक के स्तर पर मुश्किल नहीं है। बस कामकाजी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करना होगा। तुरंत परमिट लाइसेंस देने होंगे, बिजली की अबाधित व्यवस्था करनी होगी। सड़क आदि दुरुस्त करनी होगी। फिर भारत में भी सस्ता बनाना आसान होगा। भारत में बनाना आसान है, पर सस्ता बनाना आसान नहीं है। इस बिंदु पर भारतीय कंपनियां मात खा रही हैं चीन से। ग्राहक भी चीन प्रेमी नहीं है, उसे सस्ता जहां मिल जाता है, वहां चला जाता है। दुर्भाग्य से पिछले बीस सालों में भारत में मैन्युफेक्चरिंग निर्माण क्षेत्र को मजबूत करने के ठोस और तेज नीतिगत फैसले नहीं हुए। वियतनाम और बंगलादेश ने बहुत तेजी के साथ उन मोर्चों को दुरुस्त किया, जिन पर ये देश चीन के मुकाबले कमजोर पड़ रहे थे।

अब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा का है, तो अब स्थितियां दूसरी हैं। चीन हमारे घर में घुसकर सरासर चोरी डकैती कर रहा है और हमें उसका प्रतिकार ठोस तरीके से करना होगा। कमजोर से कमजोर

परिवार भी अपनी तरीके से घर की रक्षा के लिए लड़ता है। इस भाव के साथ चीन से लड़ना होगा। भारतीय कंपनियों को पहल लेनी होगी और सरकारों को उनका साथ देना होगा, उनका कारोबार आसान बनाना होगा। हां मानसिक तौर पर उपभोक्ताओं को इस बात के लिए भी तैयार करना होगा कि कुछ वक्त के लिए थोड़ा महंगा खरीदने की

आदत डालें, पर भारतीय खरीदें। यह काम आसान नहीं है, पर असंभव नहीं है। शीर्ष नेतृत्व की परीक्षा ऐसी स्थितियों में ही होती है। मुश्किल कामों को जनता के बीच आसानी से स्वीकृत करा पाएं, ऐसी उम्मीद कामयाब नेतृत्व से की जाती है।

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