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अब क्रायोजेनिक तकनीक में इसरो को मिली महारत

जीएसएलवी-डी 5 की मदद से श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से संचार उपग्रह जीसैट-14 को कक्षा में स्थापित किया गया।

अब क्रायोजेनिक तकनीक में इसरो को मिली महारत
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नई दिल्ली. देश का दशकों पुराना सपना रविवार को हकीकत में बदल गया जब स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन वाले भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी-डी 5) की मदद से श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से करीब दो टन वजनी संचार उपग्रह जीसैट-14 को कक्षा में स्थापित किया गया। क्रायोजेनिक तकनीक में महारत हासिल होना भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।
भारत अब सभी तरह के उपग्रहों के प्रक्षेपण में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया है। साथ ही अंतरिक्ष में दूसरे ग्रहों, उपग्रहों के लिए बड़े अंतरिक्ष मिशन भी भेज सकता है। दुनिया के चुनिंदा देशों जैसे अमेरिका, रूस, जापान, फ्रांस और चीन के पास ही ऐसी तकनीक थी। अब भारत भी इन देशों के क्लब में शामिल हो गया है। 20 वर्ष पूर्व अमेरिका के दबाव में रूस ने यह तकनीक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को देने से मना कर दिया था। तब वैज्ञानिकों ने खुद के बूते क्रायोजेनिक इंजन को साकार करने की ठानी थी।
हालांकि ऐसा नहीं हैकि वैज्ञानिकों को पहली बार में ही यह सफलता मिल गई है। दरअसल, देसी क्रायोजेनिक इंजन के माध्यम से जीएसएलवी का प्रक्षेपण इसरो के लिए 2001 से ही एक गंभीर चुनौती बना हुआ था। वर्ष 2010 में दो बार जीएसएलवी अपने पथ से भटक गया था। वहीं गत वर्ष19 अगस्त को भी इसरो को मायूस होना पड़ा था जब प्रक्षेपण के करीब एक घंटे पूर्व ही रॉकेट में रिसाव होने की जानकारी मिली, तब कार्यक्रम को बीच में ही रोक दिया गया था। फिर भी इसरो ने हार नहीं मानी और उसका नतीजा हैकि भारत इस जटिल तकनीकी का एक विशेषज्ञ देश बन गया है।
देश पीएसएलवी से छोटे उपग्रहों को भेजने में पहले ही महारात हासिल कर चुका है, परंतु भारी जैसे दो टन या उससे अधिक वजन के उपग्रह भेजने में हम आत्मनिर्भर नहीं थे। क्योंकि इसके लिए क्रायोजेनिक इंजन वाले जीएसएलवी रॉकेट की जरूरत होती थी। इसके लिए इसरो को अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। साथ ही भारी रकम भी चुकानी पड़ती थी, परंतु अब न केवल प्रक्षेपण खर्च को काफी कम किया जा सकेगा बल्कि अन्य देशों के उपग्रहों को स्थापित करके विदेशी मुद्रा भी अजिर्त की जा सकेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में भारत की संचार और प्रसारण सेवा मजबूत होगी।
अब अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए आगे की राह भी आसान हो जाएगी। 2016 में भारत अपना दूसरा चंद्रयान मिशन भेजेगा जिसमें इस रॉकेट का इस्तेमाल होना है। अभी हाल ही में भारत ने पीएसएलवी के जरिये मंगलयान मिशन भेजा है। भारत सामरिक क्षेत्र में भी तकनीकी स्तर पर आत्मनिर्भरता प्राप्ति की ओर अग्रसर है। गत वर्ष देश का पहला जंगी विमानवाही पोत जल में उतारा गया। साथ ही स्वदेशी निर्मित पहली परमाणु पनडुब्बी अरिहंत के रिएक्टर को भी चालू किया गया। भारत हल्के लड़ाकू विमान तेजस का निर्माण कर रहा है।
आज देश के पास उपमहाद्वीप तक मार करने वाली अग्नि-5 मिसाइल है। भारत परमाणु शक्ति पहले ही बन चुका है। तकनीकी में आत्मनिर्भरता मायने रखती है। इससे युवाओं में विज्ञान के प्रति आकर्षण बढ़ने के साथ-साथ वैज्ञानिकों में भी नया उत्साह आएगा। आज जिस तरह की भौगोलिक परिस्थितियां बन रही हैं, उससे निपटने के लिए भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ-साथ तकनीकी में भी आत्मनिर्भर होना जरूरी है। इससे दुनिया में भारत अपनी धमक बढ़ा सकेगा।

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