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संपादकीय लेख : इजरायल के भारत से बेहतर संबंध बने रहेंगे

इजरायल में बेंजामिन नेतन्याहू युग के अंत का असर पश्चिम एशिया की राजनीति, फिलिस्तीन के साथ संबंध, अमेरिका से दोस्ती और भारत के साथ सहयोग पर देखने को मिलेगा। 12 साल से इजरायल की सत्ता पर काबिज नेतन्याहू ने अपने देश को मजबूत इरादे वाले व इस्लामिक कट्टरवाद के खिलाफ एक शक्ति के रूप में बनाया। इस दौरान इजरायल विश्व में एक शक्ति के तौर पर उभरा है।

संपादकीय लेख : इजरायल के भारत से बेहतर संबंध बने रहेंगे
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : इजरायल में बेंजामिन नेतन्याहू युग के अंत का असर पश्चिम एशिया की राजनीति, फिलिस्तीन के साथ संबंध, अमेरिका से दोस्ती और भारत के साथ सहयोग पर देखने को मिलेगा। 12 साल से इजरायल की सत्ता पर काबिज नेतन्याहू ने अपने देश को मजबूत इरादे वाले व इस्लामिक कट्टरवाद के खिलाफ एक शक्ति के रूप में बनाया। इस दौरान इजरायल विश्व में एक शक्ति के तौर पर उभरा है। केवल 90 लाख की आबादी वाले इजरायल ने ग्लोबल डिफेंस सेक्टर में दमदार एंट्री की और अपने हाईटेक रक्षा उपकरणों के लिए बाजार बनाया। अब जब नेतन्याहू सत्ता में नहीं होंगे और 49 वर्षीय नेफ्टाली बेनेट के हाथ में इजरायल की कमान होगी, तो देखना दिलचस्प होगा कि नए प्रधानमंत्री अपने देश को आगे कैसे ले जाते हैं। हालांकि नेतन्याहू की सरकार भी नेफ़्टाली बेनेट के समर्थन पर ही टिकी थी।

नेतन्याहू सरकार में नेफ़्टाली 2006 से 2008 तक इजरायल के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ रह चुके हैं। इस साल मार्च में हुए चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को बहुमत नहीं मिल सका था। चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद इजरायली राष्ट्रपति रुवेन रिवलिन ने नेतन्याहू को सरकार बनाने और 2 जून तक बहुमत साबित करने का आदेश दिया था। नेतन्याहू के जोड़तोड़ के बावजूद लिकुड पार्टी अपने सहयोगियों को साध नहीं सकी। उसके बाद विरोधी नेता येर लेपिड ने ऐलान किया कि आठ विपक्षी पार्टियों का गठबंधन इजरायल में नई सरकार बनाएगा। गठबंधन में बनी सहमति के मुताबिक पहले यामिना पार्टी के प्रमुख नेता नेफ्टाली बेनेट इजरायल के नए प्रधानमंत्री बनेंगे। दो साल बाद उनकी जगह येश एटिड पार्टी के नेता येर लेपिड खुद यह दायित्व संभालेंगे।

बड़ी बात यह है कि नेतन्याहू की सरकार के खिलाफ बने इस गठबंधन में इजरायल में अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली राम पार्टी भी शामिल है। राम पार्टी के प्रमुख मंसूर अब्बास का मानना है कि फिलिस्तीनियों को उनका हक मिलना चाहिए और इजरायल को नई कॉलोनियां बनाने के प्रयास को रोक कर यरूशलम पर से दावा छोड़ना चाहिए। नेफ्टाली बेनेट घोर दक्षिणपंथी विचारधारा वाले नेता हैं, वे यहूदी राष्ट्र के कट्टर समर्थक बताए जाते हैं, वे वेस्ट बैंक, पूर्वी यरूशलम और सीरियाई गोलान हाइट्स को भी यहूदी इतिहास का हिस्सा बताते हैं, तो बेनेट के बाद पीएम बनने वाले येर लेपिड मध्यमार्गी विचारधारा के नेता हैं। इस तरह देखा जाए तो यह गठबंधन समान विचारधारा वाले दलों का नहीं है, इसमें वैचारिक भिन्नता इतनी अधिक है कि सरकार का टिके रहना मुश्किल भरा होगा।

विचारों की असमानता संकेत देती है कि यह गठबंधन बेमेल है और केवल सत्ता के लिए सभी दल साथ आए हैं। इजरायल हमेशा से यरूशलम को अपना मानता है और वह फिलिस्तीन के साथ कोई रियायत नहीं देना चाहता है, लेकिन टू नेशन थ्योरी के प्रबल समर्थक नए पीएम बनने जा रहे बेनेट पर सहयोगियों का दबाव रहेगा। नेफ्टाली बेनेट के आगमन से इजरायल की विदेश नीति का प्रभावित होने तय माना जा रहा है। बेनेट के गठबंधन सरकार में अलग विचारधारा वाली पार्टियां शामिल हैं। ग़ाज़ा पट्टी, फिलिस्तीन, हमास, ईरान, लेबनान, हिजबुल्लाह, अमेरिका जैसे ज्वलंत मुद्दों को लेकर इन पार्टियों के विचार बंटे हुए हैं। इस गठबंधन के सत्ता में आने से हो सकता है कि पश्चिम एशिया में इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ इजरायल थोड़ा सॉफ्ट हो जाए। भारत से इजरायल के मजबूत कूटनीतिक व ट्रेड संबंध है। रक्षा तकनीक, उपकरणों व हाईटेक बराक मिसाइल की आपूर्ति इजरायल से हो रही है, बहुत चीजों पर इजरायल भी भारत पर निर्भर है, उम्मीद है नेतन्याहू की तरह इजरायल की बेनेट सरकार भारत से बेहतर संबंध बनाए रखेगा।

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