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इराक में 39 भारतीयों के मारे जाने से देश दुखी, हरजीत बना अली

इराक में 40 में से एक हरजीत मसीह ने अपना मुस्लिम नाम अली बताकर किसी तरह जान बचा ली जबकि 39 भारतियों को आतंकी संगठन आईएसआईएस ने मौत के घाट उतार दिया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने विस्तृत बयान देते हुए राज्यसभा में पूरे घटनाक्रम का ब्योरा देते हुए बताया कि किस तरह आतंकवादियों ने भारतीयों की हत्या के बाद उनके शवों को सुदूर पहाड़ी इलाके में दफन कर दिया था और चार साल के अथक प्रयासों के बाद किस तरह विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह की अगुवाई वाला दल उन शवों को खोजने में कामयाब हुआ।

इराक में 39 भारतीयों के मारे जाने से देश दुखी, हरजीत बना अली

भारत सरकार ने संसद में मंगलवार को चार साल पहले 2014 में इराक में आईएसआईएस के हाथों मारे गए उनतालीस भारतीयों की मौत की पुष्टि कर दी है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने विस्तृत बयान देते हुए राज्यसभा में पूरे घटनाक्रम का ब्योरा देते हुए बताया कि किस तरह आतंकवादियों ने भारतीयों की हत्या के बाद उनके शवों को सुदूर पहाड़ी इलाके में दफन कर दिया था और चार साल के अथक प्रयासों के बाद किस तरह विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह की अगुवाई वाला दल उन शवों को खोजने में कामयाब हुआ।

बांग्लादेशियों को तो मुक्त कर दिया गया

अब पोस्टमार्टम से लेकर डीएनए के मिलान की पूरी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और जल्दी ही विशेष विमान से उनके पार्थिव अवशेषों को स्वदेश लाकर उनके परिजनों को सौंप दिया जाएगा ताकि वे विधि अनुसार उनका अंतिम संस्कार कर सकें। जो इराक में मारे गए, वह सब कर्मचारी थे, जो वहां कार्यरत थे। बांग्लादेश के मूल निवासी करीब पचास कर्मचारियों के साथ उनका भी अपहरण कर लिया गया था। बाद में बांग्लादेशियों को तो मुक्त कर दिया गया, परंतु भारतीय नागरिक इतने खुशकिस्मत नहीं रहे। उनकी हत्या कर दी गई।

हरजीत मसीह बना अली

चालीस में से एक हरजीत मसीह ने अपना मुस्लिम नाम अली बताकर किसी तरह जान बचा ली। हालांकि वह जो बयान दे रहा है, उसकी विदेश मंत्री ने पुष्टि नहीं की। भारतीय दल को जानकारी मिली है कि वह बांग्लादेशियों के साथ वहां से निकलने में कामयाब हो गया था, जबकि उसका कहना है कि उसे भी गोली लगी थी और उसे भी अन्यों की तरह मृत समझकर आतंकवादी वहां से चले गए थे, जबकि वह दो गोली लगने के बाद भी बच गया था। यह सब जांच का विषय है, परंतु इस घटना से कुछ सवाल जरूर उठ खड़े हुए हैं।

इराक में मारे गए भारतीयों में से ज्यादातर पंजाब से

सबसे अहम प्रश्न यही है कि दुनिया के जिन भी देशों में युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, वहां भारतीयों को जाने की इजाजत ही क्यों दी जाती है। विदेश मंत्रालय को अब इस पर गौर करना होगा कि भारतीय नागरिकों को ऐसे वार जोन में नहीं दिया जाए, जहां हालात विस्फोटक बने हुए हों। जो नागरिक वहां मारे गए हैं, उनमें ज्यादातर पंजाब से हैं। कुछ बिहार और पश्चिम बंगाल से भी हैं। चार साल से किसी खुशखबरी की प्रतीक्षा कर रहे उनके परिजनों पर इस दुखद खबर से क्या बीत रही होगी, यह समझना मुश्किल नहीं है।

खाड़ी के देशों में बहुत बड़ी तादाद में भारतीय काम करते हैं

परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त करने के लिए कोई यूं ही परदेस नहीं चला जाता है। उसे और उसके परिवार को दिल पर पत्थर रखना पड़ता है। हरेक की यही दुआ होती है तो वह जहां भी है, सुरक्षित, स्वस्थ और खुश रहे, परंतु इराक सीरिया, जोर्डन और आस-पड़ोस के दूसरे देशों में पिछले एक दशक से जो हालात बने हुए हैं, उसका असर पूरी दुनिया पर दिखाई दे रहा है। खाड़ी के देशों में बहुत बड़ी तादाद में भारतीय काम करते हैं और वह वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की तरह काम कर रहे हैं, परंतु इस तरह की दुखद घटना का सामना उन्हें कभी-कभी करना पड़ता है।

दिवंगत भारतीयों को श्रद्धासुमन अर्पित

पूरा देश इस सूचना से स्तब्ध और दुखी है। राज्यसभा ने देश की ओर से दो मिनट मौन रहकर दिवंगत भारतीयों को श्रद्धासुमन अर्पित किए हैं, परंतु दूसरे सदन लोकसभा में जिस तरह का वातावरण देखने को मिला, वह भीतर तक परेशान करने वाला है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज लगातार जारी हो हल्ले के चलते बयान नहीं दे सकीं और लोकसभा अध्यक्ष के बार-बार समझाने के बावजूद हल्ला कर रहे सांसदों की संवेदना मृतकों के प्रति नहीं जाग सकी। यह वाकई बेहद पीडाजनक है।

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