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EXCLUSIVE- मैं कविता लिखना चाहता हूं: भालचंद्र नेमाड़े

मातृ भाषा में लिखे साहित्‍य में कहीं ज्‍यादा आत्‍मीयता होती है।

EXCLUSIVE- मैं कविता लिखना चाहता हूं: भालचंद्र नेमाड़े

मराठी के मशहूर लेखक और साहित्‍य के सर्वोच्‍च सम्‍मान ज्ञानपीठ पुरस्‍कार से सम्‍मानित साहित्‍यकार भालचंद्र नेमाड़े से हरिभूमि संवाददाता रंजीत ठाकुर ने साहित्‍य से जुड़े कई महत्‍पूर्ण सवालों पर बातचीत की। पढि़ए पूरा इंटरव्‍यू..

प्रश्‍न. आपको साहित्‍य जगत का सबसे बड़ा सम्‍मान मिला है, आपको बहुत- बहुत बधाई। आप इस सम्‍मान के बारे में क्‍या कहना चाहेंगे?

उत्‍तर.थैंक्‍यू, बहुत-बहुत धन्‍यवाद। निजी स्‍तर पर मेरा पाठक वर्ग बढ़ेगा। ज्‍यादा लोगों तक हम पहुंच पाएंगे। हमें जो कहना होता है और अगर वो ज्‍यादा लोगों तक पहुंचे तो अच्‍छा लगता है। हिंदी साहित्‍य के पाठको में भी बढ़ोत्‍तरी होगी। इसलिए मेरे लिए यह खुशी की बात है।

प्रश्‍न. साहित्‍य के सा‍माजिक सरोकार और साहित्‍य को कला मानने वाली बहस पर आपके क्‍या विचार हैं? साहित्यकार का जनता के प्रति क्या उत्तरदायित्व है ?

उत्‍तर. साहित्‍य महज कला नहीं है, उसका सामाजिक सरोकार होता है। हम समाज के लिए लिखते हैं। जो मेरे दिल की बात है वो आपके दिल की बात भी हो सकती है और पूरे समाज की भी। कला में शायद यह बात नहीं होती है। साहित्‍य एक ऐसी विधा है जिसमें सार्वजनिकता ज्‍यादा से ज्‍यादा होती है। साहित्‍य में सुखान्‍त सुखाए हो सकता है लेकिन जब लोग पढ़ना शुरु करते हैं तो समझ आने लगता है। तब रचना, एक आदमी की कृति नहीं रह जाती, सबकी हो जाती है। अनुभव बांटे जाते हैं। साहित्‍य का सौ प्रतिशत कला होना मुश्किल है। संगीत बगैर की बात अलग है लेकिन साहित्‍य में भाषा होती है इसलिए साहित्‍य सबका हो जाता है। लेखक को समाज के निचले तबके और शोषित वर्ग के साथ खड़ा हाेना चाहिए।

प्रश्‍न. इंटरनेट की उपल‍ब्‍धता से प्रिंट साहित्‍य पर फर्क पड़ा है? क्‍या पाठक वर्ग में कमी आई है ?

उत्‍तर. असर तो पड़ता ही है। जैसे लिखित साहित्‍य ने मौखिक साहित्‍य पर असर डाला था। लेकिन इससे मौखिक साहित्‍य को उतनी हानि नहीं हुई, उतना क्षय नहीं हुआ। लेकिन लिखित माध्‍यम प्रतिष्ठित होता रहा। अब इलैट्रॉनिक मीडिया से मौखिता फिर से बढ़ेगी। अपने लिए यह अच्‍छी बात है। मुझे नहीं लगता कि पाठकों में कमी आई है। अन्‍य भाषा के साहित्‍य कि तो नहीं कह सकता। लोग कई माध्‍यमों से पढ़ते रहे हैं। पाठकों में कमी नहीं आई है। प्रिंट साहित्‍य पर असर पड़ सकता है लेकिन पाठक कम नहीं हुए हैं। पहले लोगों तक साहित्‍य नहीं पहुंच पाता था, एक खास तरह के वर्ग के लोग ही पढ़ते थे लेकिन विकसित होते माध्‍यमों के कारण लेखकों और पाठकों, दोनों की संख्‍या बढ़ी है।

प्रश्‍न. लेखकों के सामने वर्तमान की चुनौतियां क्‍या हैं ?

उत्‍तर. मेरी लिए समाज के निचले और गरीब वर्गों को प्राथमिकता देना है। साहित्‍यकारों को चाहिए कि वे इस वर्ग को केंद्र बनाएं। मैं मानता हूं कि सबको सम्‍मान मिलना चाहिए, सबको बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए। इसिलिए मैं साहित्‍य में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को पसंद नहीं करता। हमारी मातृभाषा अंग्रेजी से ज्‍यादा समृद्ध है। हमारे लिए बड़ी चुनौती है कि हम अपनी मातृभाषा में लिखें।

प्रश्‍न. वर्तमान समय में अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के हनन पर आपके विचार? जैसे कि तमिल भाषा के मशहूर लेखक पेरुमल मुरुगन ने लिखना छोड़ दिया या अन्‍य लेखकों पर दवाब?

उत्‍तर. मेरी लिए यह कोई चिंता की बात नहीं है। यह पहले से अपने यहां है। सत्‍ता पहले लिखने-बोलने की आजादी पर हमले करती रही है। हमें अपने तरीके से रास्‍ता निकालना होगा। यह रहेगा ही। बावजूद इसके हमें अपनी बात कहनी होगी। हमें इसी सबके बीच रास्‍ता निकालना होगा।

प्रश्‍न. लेखक के लिए विचारधारा कितना मायने रखती है, लेखक और विचारधारा का क्‍या संबंध है?

उत्‍तर. लेखक को खुद की अपनी विचारधारा निकालनी चाहिए, जिसमें अन्‍य विचारधारा का मिश्रण हो सकता है लेकिन लेखक को अपने अनुभव और अनुभूति के आधार पर खुद में अपनी एक विचारधारा निकालनी चाहिए। रेडिमेड विचारधारा लेखक के लिए ठीक नहीं है।

प्रश्‍न. मराठी साहित्‍य को दलित चेतना के लिए भी जाना जाता है, हिंदी से पहले मराठी साहित्‍य में यह चेतना विकसित हुई है। मुक्तिबोध ने मराठी के साथ- साथ हिंदी साहित्‍य में भी लिखा है। क्‍या आपने हिंदी में लिखा है या इस दिशा में कुछ सोच रहे हैं?

उत्‍तर. दलित चेतना मराठी साहित्‍य के साथ-साथ विकसित हुई है। 1960 के आसपास हमने लघु पत्रिकाएं निकालीं थीं। दलित लेखक उसमें खुद लिखा करते थे। बाद में उसमें से कई बड़े लेखक निकले। आजकल के लेखकों के लेखन का असर उतना नहीं है, जितना पहले था क्‍यों कि अंदर से वे राजनीति से ग्रस्‍त हो गए है। मैं हिंदी साहित्‍य पढ़ता हूं पर लिखना नहीं हो पाया। दोस्‍तों से हिंदी में ही बात होती है। हिंदी मेरे लिए कोई नई बात नहीं है। जो शुद्ध हिंदी है वो तो अपने से नहीं बनता लेकिन जो बोलचाल में है वो चलता है।

प्रश्‍न. साहित्‍य में ऐसा कुछ है जो आपको लगता है कि कुछ छूट गया या नहीं कर पाए ?

उत्‍तर. तमाम व्‍यस्‍तताओं के कारण कविता को समय नहीं दे पाया। मैं फिर से कविता की ओर लौटना चाहता हूं..

प्रश्‍न. आपने फकीर मोहन सेनापति और गोपीचंद मोहंती को रुश्दि से '50 गुना बेहतर' लेखक कहा है। आप ऐसा क्यों मानते हैं ?

उत्‍तर. हमारे यहां मराठी में भी ऐसे लेखक नहीं हैं। सेनापति जी का ग्रामीण जनता और गोपीचंद जी का जो आदिवासियों से लगाव था, वो हमने कहीं नहीं देखा। हमारे यहां उस काल में जो लोग लिखते थे वे थोड़ा शहरी और उच्‍चस्‍तरीय और अपने-अपने सीमित कार्य क्षेत्र में काम करते थे। लेकिन हमने पहली बार जनता से ऐसा जुड़ाव देखा। इन दोनों ने व्‍यापक स्‍तर पर काम किया है।

प्रश्‍न. गंभीर साहित्य में वह कौनसी बात है जो उसे पॉप्‍यूलर साहित्य से अलग करती है ?

उत्‍तर.पाठक समझता है कि कौन सा साहित्‍य गंभीर है और कौन सा लाइट है। पाठक समझ जाता है कि उसे अपनी अनुभति किसमें ज्‍यादा मिली है। एक पीढ़ी के बाद पाठक समझ जाता है कि किसने गम्‍भीर लिखा है। कभी- कभी कोई उपन्‍यासकार बड़ा लगता है लेकिन 20- 25 साल बाद ही वो भुला दिया जाता है। प्रेमचंद जैसे लेखक हमेशा पाठकों में बने रहते हैं। पाठकों को तय करना हाता है कि गम्‍भीर क्‍या है और लाइट क्‍या है।

प्रश्‍न. किसी भी लेखन में कथ्य महत्वपूर्ण होता है फिर वह किसी भी भाषा में व्यक्त किया जाये। क्या इससे कुछ अंतर पैदा होता है की आप इसे किसी और भाषा में व्यक्त करें या अपनी मातृभाषा में ?

उत्‍तर. हां अंतर आ जाता है। अनुभव अपनी मातृ भाषा में लिखने से ज्‍यादा आत्‍मीय हो जाता है। जो अनुभव भाषा के साथ आता है वो हमेशा बना रहता है लेकिन अन्‍य भाषा में वह अर्थ नहीं खोजे जा सकते। कथ्‍य अपनी मातृभाषा के साथ ही ज्‍यादा मुखरित होता है।

प्रश्‍न. आपको पढ़ाई सिर्फ मातृभाषा में ही क्यूँ जरूरी लगती है ?

उत्‍तर. हां पढ़ाई अपनी मातृभाषा में ही होनी चाहिए। पूरी दुनिया में ऐसा ही चलता है। सिर्फ हमारे अपने देश में अपनी मातृभाषा में पढ़ाई नहीं होती। विकास के नाम पर योजनाएं बनाने वाले लोग ही आम जनता के खिलाफ हैं। वे आम आदमी का फायदा कभी नहीं सोचते। अंग्रेज लोगों का जो शोषण करने का तरीका था, वही चल रहा है। अपनी भाषा में बात होनी चाहिए जैसे अन्‍य देशों में है। लोगों तब बात उन्‍हीं की भाषा में पहुंचनी चाहिए। लेकिन सत्‍ता में बैठे लोग ऐसा नहीं कर रहे हैं।

प्रश्‍न. क्या आप मराठी साहित्य में आलोचना की स्थिति से संतुष्ट हैं ?

उत्‍तर. हां, अभी स्थितियां बदली हैं। अभी सब ठीक चल रहा है। बहुत से बदलाव आए हैं।

प्रश्‍न. यह कहा जा रहा है की साहित्य में पाठक लगातार कम होते जा रहे हैं ऐसी परिस्थितियों में एक साहित्यकार की क्या भूमिका हो सकती है ?

उत्‍तर. मैं ऐसा नहीं मानता। मराठी में तो पाठक वर्ग बढ़ा है। मेरी ही उपन्‍यास के पाठकों में 20 गुना वृद्धि हुई है। पाठक कम नहीं हुआ है।

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