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जानिए अब क्यों नहीं लुभाता परी-कथाओं का जादू

ऑयरलैंड की परी-कथाओं की ‘पिक्सी’ परियां लोगों को गायब कर देती हैं।

जानिए अब क्यों नहीं लुभाता परी-कथाओं का जादू
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सिर्फ अपने ही देश नहीं बल्कि दुनिया के तमाम देशों में सदियों से परी-कथाएं सुनी और सुनाई जाती रही हैं। कुछ वर्ष पहले तक तो ये बच्चों को भरपूर पसंद हुआ करती थीं। लेकिन खूबसूरत कल्पनाओं से उपजी इन कहानियों के प्रति बच्चों का लगाव कई वजहों से कम होता जा रहा है। परियों की विश्वव्यापी परंपरा और इसके प्रति घटते लगाव के कारणों पर एक नजर।
परी-शब्द कानों में पड़ते ही आंखों के सामने उभर आती हैं-बूढ़ी दादी या नानी। आंखें फैलाकर कभी विस्मय जताते, कभी डरकर इनकी गोद में दुबकते, कभी खिलखिलाते, कभी खुश होते, कभी-कभी सुबकने भी लगते मासूम बच्चे और हां, वो बेहद खूबसूरत जादूगरनियां जिन्हें कोई परी कहता है, कोई अप्सरा तो कोई किसी और नाम से उन्हें संबोधित करता है। वो सुनहरे पंखों वाली होती हैं। कभी इन खूबसूरत स्वर्ग कन्याओं के हाथ में कोई जादुई छड़ी होती है तो कभी कुछ और। वास्तव में इंसान की बेहद खूबसूरत और असीमित कल्पनाओं से बनती हैं परियां, रची जाती हैं परी-कथाएं। एक जमाना था और ये कोई बहुत पहले की बात नहीं है, अभी दो दशक पहले तक की बात है, जब गरीब से गरीब बच्चे के हिस्से में परी-कथाएं, जादूगरनियों की कहानियां या कुछ ऐसे ही नामों वाली प्यारी-प्यारी कहानियां जरूर आती थीं। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता था कि किसी की दादी बहुत पढ़ी-लिखी हैं और किसी की बिल्कुल अनपढ़। इन प्यारी कहानियों की पूंजी हर किसी के पास होती थी। सिर्फ अपनी दादी-नानी ही नहीं पास-पड़ोस और मोहल्ले की दादियों-नानियों से भी इन परी कहानियों की फरमाइश की जा सकती थी, वो खुशी-खुशी इन फरमाइशों को पूरा भी कर देती थीं। लेकिन धीरे-धीरे अब ये सब महज अतीत की बातें बनकर रह गई हैं। अब इन्हें आसानी से महज किताबों में संग्रहीत लोककथाओं के नाम पर ही पाया जा सकता है या टीवी में कुछ नामचीन परियों पर बने धारावाहिकों के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि कुछ नानियां-दादियां इन्हें आज भी जिंदा रखे हुए हैं। लेकिन लगता है कि उखड़ चुकी सांसों वाली ये परी-कथाएं इनके पास भी अब बहुत दिनों तक नहीं बचने वालीं।
हर देश की अपनी परी-कथा
हमारे पुरखों की तमाम अनमोल देनों में से एक परियों की असीम कल्पना भी है। परियों की कल्पना दुनिया के हर समाज में की गई है या इसे यूं भी कह सकते हैं कि दुनिया के हर समाज में परियां पाई जाती हैं। दुनिया के हर समाज का लोकसाहित्य इनसे भरा पड़ा है। जहां तक सवाल है कि सबसे पहले दुनिया के किस देश में परी कहानियों ने जन्म लिया तो इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब कोई नहीं दे सकता। क्योंकि परियों के संबंध में कोई सार्वभौमिक और तथ्यात्मक इतिहास नहीं है। सबके अपने अपने दावे और उन दावों का अपना अपना आधार है। दुनिया के हर देश के पास अपनी परी-कथाएं हैं। इनके अपने स्थानीय पात्र हैं और इनके समाज से जुड़ने वाली इनकी मौलिक कल्पनाएं हैं। इन परी-कथाओं में पंखों की मदद से उड़ने वाली परियों के अलावा भी कई प्रकार के चरित्र हैं। भयंकर दैत्य और जादूगरनियां भी यहां हैं। अच्छी और बुरी आत्माएं भी हैं। आयरलैंड की परीकथाओं के ‘लैप्रेकान’ परियों या बौनों का रूप रखते हैं। अगर वे पकड़े गए तो खजाने का पता बताते हैं। स्कॉटलैंड की परी-कथाओं के ‘केल्पी’ समुद्री राक्षस हैं। वे नाविकों और यात्रियों का मन भी बहलाते हैं और नाराज हो जाने पर जलपोतों को डुबा भी देते हैं। आॅयरलैंड की परी-कथाओं की ‘पिक्सी’ परियां लोगों को गायब कर देती हैं।
परी-कथाओं का इतिहास
कुछ लोग मानते हैं परी-कथाओं का जन्म भारत में हुआ। लगभग 2300 साल पहले हमारे यहां लिखी गई ‘पंचतंत्र’ की कहानियां भी एक तरह की परी-कथाएं ही हैं। क्योंकि इनके पात्र जो कि जानवर हैं या पक्षी समुदाय से हैं। फिर भी ये इंसानों की तरह बोलते हैं, बहस करते हैं और विचार-विमर्श भी करते हैं। इनके पास भी कुछ अद्भुत शक्तियां हैं, जो इन्हें परियों के जैसा चमत्कारिक बनाती हैं। अब से लगभग 2300 वर्ष पहले पं. विष्णु शर्मा ने ये कहानियां दुनिया को सुनाई थीं। ये वैसे तो नीति की कहानियां हैं लेकिन इनकी रोचकता इतनी ज्यादा है कि इन्हें नीति कहानियों के दायरे भर में समेटा ही नहीं जा सकता। लेकिन पंचतंत्र से पहले भी कुछ कहानियों का अस्तित्व है, जो एक किस्म से परी-कथाएं हैं। कम से कम 2600 साल पहले यूनान में इस तरह की कहानियां सुनाई गर्इं। मिस्र में दो भाइयों की परी-कथा 3300 वर्ष पहले सुनी-सुनाई गई। रूस, चीन, जापान, आॅस्ट्रेलिया, अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप के विभिन्न देशों की अपनी परी-कथाएं हैं।
भारत में परियों की परंपरा
भारत में अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तरह की परियों की कल्पना की गई है। उत्तराखंड के ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी सुनहरे पंखों वाली धवल परियों की कल्पना की गई है, जो आमतौर पर गरीब और ईमानदार लोगों की मदद करती हैं। कभी-कभी जब इन्हें गुस्सा आता है तो नुकसान पहुचाती हैं। कुल मिलाकर ये दोस्ताना व्यवहार में ही होती हैं। हमारे यहां परियों का एक रूपांतरण अप्सराओं के रूप में मौजूद है, जिनका काम देवताओं के राजा इंद्र के दरबार में नाचना- गाना होता है। वैसे इनकी भी यूएसपी इनके सम्मोहन की ताकत ही है। इसीलिए तो देवराज इंद्र जब किसी ऋषि-मुनि को घोर तपस्या करते देखते और इस तपस्या से अपने इंद्रासन को ढोलता महसूस करते, तब इन अप्सराओं को ऋषियों मुनियों की तपस्या भंग करने के लिए उन्हें मृत्युलोक भेज दिया जाता, जो तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर ऋषि मुनियों की तपस्या को भंग करती और कई दफा यह सब करते हुए उन्हें ऋषियों मुनियों की संगिनियां, पत्नियां बनकर भी रहना पड़ता। कइयों ने तो बकायदा इस नाटक में ऋषियों मुनियों की संतानें भी पैदा की हैं। मेनका परी की बेटी शकुंतला ऐसी ही है। उर्वशी नामक अप्सरा ने राजा पुरुरवा से शादी की थी। विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए अप्सरा रंभा का इस्तेमाल किया गया था। कहते हैं विश्वामित्र ने उसे दस हजार साल तक पत्थर की शिला बनने का शाप दे दिया था।
कमजोर होता जादू
इतनी प्राचीन और भव्य परंपरा के बावजूद यह परियों के लिए दुर्भाग्य का समय है कि उनकी कहानियां सुनने के लिए अब न तो किसी के पास समय है और न ही अब कोई झूठमूठ की परी-कथाएं सुनाना चाहता है। सवाल उठता है, क्या हमारी दिमागी ताकत इनके अस्तित्व पर भारी पड़ रही है? वास्तव में लगता है आक्रामक और अपार तकनीकी को देखते और उसे बरतते हुए हमारा दिमाग हमारे मन पर भारी पड़ रहा है। तर्क बेपरवाह उड़ानों पर लगाम लगा रहे हैं। अगर नहीं तो अब नाजुक बुद्धि और विवेक की परवाह न करने वाली परी कथाएं क्यों नहीं सुनी और सुनाई जा रहीं? ऐसा नहीं है कि आज के बच्चों में काल्पनिक उड़ानों की गतिविधियां लुप्त हो गई हैं, वो आज भी कल्पना की उड़ान भरते हैं, पहले से ज्यादा भरते हैं, लेकिन तर्क और तकनीकी से लिपटी हुई उड़ाने बच्चे भी अब बुद्धू नहीं बनना चाहते। इसलिए परी-कथाएं अब वो नहीं सुन रहे, हम खुद भी उन्हें ये सब सुनाते हुए झेंप रहे हैं। ऐसा करते हुए हमें अपने पिछड़े होने का अहसास होता है। बच्चों को हवा में उड़ते रोबोट समझ में आ रहे हैं। लेकिन 100 साल से सोई किसी राजकुमारी को जगाता कोई राजकुमार उन्हें हास्यास्पद और अविश्वसनीय लग रहा है।
परी-कथाओं से दूर होते बच्चे
परी-कथाएं अब बच्चों को आकर्षित नहीं करतीं, क्योंकि लॉजिक के दौर वाले इस दौर में परी-कथाएं, कथा आनंद देने से पहले ही अंधविश्वास लगने लगती हैं। स्कूलों में जिस तरह की पढ़ाई का जोर है, उससे भी इन मासूम सी कहानियों के लिए कोई जगह नहीं बची। यही वजह है कि अब न छोटे बच्चे घरों में अपनी दादियों-नानियों से परी-कथाएं सुनाने की जिद करते हैं और न दादी-नानी इसके लिए उत्सुक रहती हैं। इसकी वजह नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ियों के बीच तकनीकी की गहरी खाई भी है। बच्चों को लगता है उनकी दादी या नानी जब सलीके से स्मार्ट मोबाइल नहीं चला पातीं तो भला उनके पास ऐसा क्या हो सकता है बताने के लिए, जो बच्चों को पता न हो। दादियां-नानियां भी संकोच करती हैं कि वो बच्चों को ऐसी कहानियां कैसे सुनाएं, जिनमें बहुत कुछ अतार्किक होते हो। ये पहले से ही आज के दौर के मासूमों के वयस्कों जैसे सवालों से परेशान रहती हैं, ऐसे में अंधविश्वास सी लगने वाली परी-कथाएं सुनाकर ये सवालों की झड़ी से नहीं दो-चार होना चाहतीं।
कहां से आया परी शब्द
परी शब्द ‘फेयरी’ का हिंदी अनुवाद है, जिसका मतलब होता है जादू। इस शब्द के अन्य संपर्क सूत्र इतावली भाषा के शब्द ‘फाटा’ और यहीं के प्रादेशिक शब्द ‘फाडा’ से भी जुड़ते हैं, जिसका मतलब भी जादू या जादूगरी से ही जुड़ा होता है। पुरानी फ्रेंच भाषा में महिलाओं की जादूगरी के लिए एक और शब्द ‘फी’ का भी इस्तेमाल होता था, जिसका मतलब होता था महिलाओं में मोह लेने की क्षमता। इसका भी कालांतर में फेयरी या परी शब्द के मतलब में विलय हुआ है। फी शब्द का इस्तेमाल फ्रेंच में जिन जादूगर महिलाओं के लिए होता था, समझा जाता था कि वो पत्थर और जड़ी बूटियों की खूबियां पहचानती थीं और उनके जरिए जादू पैदा करने की कूव्वत रखती थीं। हालांकि आजकल ये शब्द बिल्कुल गायब हो गया है। सिर्फ यह शब्द ही नहीं बल्कि इससे मिलते जुलते तमाम दूसरे शब्द भी गायब होकर सब फेयरी शब्द में समाहित हो गए हैं।
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