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योग दिवस: विश्व कल्याण का यज्ञ योग, छिपा है निरोग जीवन का सार

वर्तमान मनुष्य जीवन में बढ़ते मानवीय विकारों से मुक्त होने के लिए जितने आधुनिक उपाय अपनाए गए, सभी विफल रहे। इसीलिए आज योग जैसी वैदिक स्वास्थ्य वृद्धि रीति विश्व स्तर पर अपनाई जाने लगी है।

योग दिवस: विश्व कल्याण का यज्ञ योग, छिपा है निरोग जीवन का सार

पिछले चार वर्षों के भारतीय शासन की अनेक उपलब्धियों में से एक अति महत्वपूर्ण उपलब्धि है अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन। इस वर्ष भारतीय संस्कृति, आयुर्वेद पद्वतियों तथा चारों वेदों में केंद्रक स्वास्थ्य विचार के रूप में मानित योग विद्या यदि आज इस सदी के इस कालखंड में सविश्व में व्याप्त हो चुकी है, तो इसका श्रेय आदिकालीन भारतीय जीवन संहिता की महानता को जाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयास से भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण जीवनचर्या योग को आज पूरी दुनिया में स्वास्थ्य लाभ के वैदिक सूत्र के रूप में देखा जा रहा है। इसी अभिप्रेरणा से संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने को मान्य कर दिया। योग दिवस आज तीसरी बार मनाया जा रहा है।

भारत की सांस्कृतिक श्रेष्ठता को स्वास्थ्य वृद्धि के एक महत्वपूर्ण आयाम अर्थात योग के रूप में पूरे विश्व में स्थापित करना अपने आप में बहुत ही श्रमसाध्य कार्य था। यह संपन्न हुआ और आज संपूर्ण विश्व योग से मिलने वाले स्वास्थ्य लाभ के बारे में जागरूक हुआ है। निश्चित ही इससे भारत का सर्वांगीण विकास होगा।

सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से तो हमारा देश विश्व स्तर पर जाना ही जाएगा। साथ ही योग की शिक्षा से भारत को व्यापारिक सेवा क्षेत्र भी प्राप्त होगा, जो आने वाले वर्षों में करोड़ों-अरबों रुपये के कारोबार और रोजगार का सृजन करेगा। अभी तक तो भारतीय यौगिक क्रियाएं किसी आधुनिक अकादमिक अनुशासन के पूर्ण नियंत्रण में कभी नहीं रहीं,

लेकिन अब देश-विदेश में योग को विद्यालयी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने का प्रयास चल रहा है। मूल वैदिक मान्यताओं के अनुसार योग शिक्षा का कोई औपचारिक ढांचा नहीं है। योग की शक्तियों का विकास मानव में नैसर्गिक रूप में होता है। आज संपूर्ण विश्व आधुनिकता और यंत्रजनित विकास की दो कठिन सहस्राब्दियों से जूझता हुआ प्राकृतिक रूप से अनियंत्रित हो चुका है।

विश्व को प्राकृतिक नियंत्रण की अवधारणा के अनुरूप संचालित करने की आवश्यकता ने ही वैश्विक प्रतिनिधियों को भारतीय वेदों की जीवनचर्या अपनाने को विवश किया है। वर्तमान मनुष्य जीवन में बढ़ते मानवीय विकारों से मुक्त होने के लिए जितने आधुनिक उपाय अपनाए गए, सभी विफल रहे। इसीलिए आज योग जैसी वैदिक स्वास्थ्य वृद्धि रीति विश्व स्तर पर अपनाई जाने लगी है।

पुरातन काल में पृथ्वी का विस्तार राष्ट्रों के रूप में विभाजित नहीं था। मानव अस्तित्व जिस रूप में भी था, वह प्राकृतिक शक्तियों से संजीवित, संचालित था। आज भी निर्जन स्थानों, सघन वन क्षेत्रों और हिमालय पर्वतों में जो पशु-पक्षी तथा अन्य जीव रह रहे हैं, उनका जीवन प्राकृतिक योग विधान से ही चल रहा है। योग विद्या परिपक्व मानव को यही सब सोचने-विचारने के लिए संस्थिर करती है।

योग द्वारा हम स्वयं का प्राकृतिक साक्षात्कार करते हैं। इस आत्मिक भावमुद्रा में हमें मात्र इसलिए नहीं रमना कि यह हमें आधुनिक विकारों के मध्य शांत व संतुलित होने की शक्ति दे, अपितु योग का विचार और अभ्यास सांसारिक बातों, जिज्ञासाओं और लोभ लिप्साओं से पूरी तरह मुक्त होने की प्रेरणा पर आधारित है।

यदि योग को आधुनिक जीवन की विसंगतियों से उपजे तन-मन के विकारों का शमन करने की मात्र एक आयुर्वेदिक चिकित्सा मानेंगे तो यह योग को जानने का एक तुच्छ प्रयास होगा। बल्कि योग को मानवीय जीवन की ऐसी प्रणाली बनाने की अति आवश्यकता है, जिसके बल पर संसार में प्रत्यक्ष व परोक्ष किसी भी तरह की हिंसा, दुर्व्यवहार और अत्याचार पर पूर्ण नियंत्रण पाया जा सके।

योग का प्रचार-प्रसार किसी व्यक्ति, राष्ट्र, संस्थान या किसी पद्वति का प्रचार-प्रसार नहीं है। योग तो जगत कल्याण के नियोजन के लिए मानव मन को सशक्त तथा प्रशस्त करने का दैवीय माध्यम है। योग एक निश्चित शारीरिक मुद्रा में बैठकर श्वासों के शांत, संतुलित और संगठित संचालन तक ही सीमित नहीं। न ही प्रतिदिन इस तरह के अभ्यास से स्वयं को व्यापारिक व पूंजीगत जगत के लिए योग्य और प्रतिस्पर्द्धी बनाने तक ही योग का महत्व है।

सत्य बात तो यह है कि योग की गहराइयों में समाकर मानव को बाह्य जगत की मिथ्या गतिविधियों के प्रति अरुचि हो जाती है। योग की जड़ों से जुड़ने के बाद यही भावनात्मक अंश आज के दंभी मानव में थोड़े-थोड़े रोपित होने चाहिए। यही उपाय है जिससे विनाश के ढेर पर बैठी दुनिया को शनैः.शनैः वापस प्राकृतिक जीवन की ओर मोड़ा जा सकता है।

आज के बेचैन और चंचल मनुष्य के लिए योग की ज्ञान धारणाओं को आत्मसात करना इतना सुगम नहीं। प्रारंभ में वह योग का शारीरिक विन्यास व मुद्रा अभ्यास ही कर सकता है, जबकि आवश्यकता इसकी है कि योग का गंभीर तथा स्थिर अभ्यास कैसे हो, ताकि यंत्रचालित युग का मानव आत्मकेंद्रित हो अपने सच्चे अस्तित्व के बारे में सोच-विचार कर सके।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाना तब ही सार्थक होगा जब योग को ज्ञान-विज्ञान की साधारण समझ से अलग एक वैदिक व आध्यात्मिक सूत्र के रूप में जाना, समझा और अपनाया जाएगा। योग करने वाले यह न सोचें कि यह व्यायाम उन्हें व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धा में मानवीयता के सिद्धांतों की अनदेखी करने या जलवायु के प्रतिकूल उत्पादन करने की मशीनी शक्ति देता रहेगा।

योग दिवस आयोजित करने का प्रारंभिक उद्देश्य भले ही लोगों के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि करना है। लेकिन इसका सूक्ष्म उद्देश्य लोगों को आत्मिक रूप में भी स्वस्थ करना है। विश्व का विभाजन विभिन्न राष्ट्रों के रूप में यदि हुआ है तो इसका अर्थ कल्याणकारी तो कदापि नहीं रहा होगा। इसी तरह एक राष्ट्र के अंदर भी विभिन्न मानवीय जातियों, भाषाओं, रहन-सहन और अनेक अन्य जीवन संचालन विधियों का विभाजन भी कहीं से मानव कल्याण और उत्थान को इंगित नहीं करते।

इसके निवारण का स्थायी उपाय तब ही मिलेगा जब योग जैसी स्वास्थ्य विधाओं के द्वारा मनुष्यगण स्वयं से नैतिक व मौलिक रूप से जुड़ सकेंगे। निस्संदेह योग दिवस मनाने के संबंध में भारत और अन्य देशों के मध्य मतभेद हों अथवा कोई देश भारत की इस स्वास्थ्य लाभकारी विधा की अंतरराष्ट्रीय मान्यता से ईर्ष्या करे, परंतु यह सर्वस्वीकार्य सत्य है कि इसी विधा की वैश्विक जागरूकता से सभी लोगों को वास्तविक स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होगा।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस किसी तरह के मतभेद अथवा भेदभाव के कारण उपजी अवधारणा नहीं। यह तो मात्र सार्वभौमिक कल्याण और विश्व शांति के लिए किया जाने वाला एक शुद्ध यज्ञ है। इसमें सभी को यत्नपूर्वक अवश्य सम्मिलित होना चाहिए। तभी कल्याण होगा।

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