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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : कैसे थमे आधी आबादी के प्रति अपराध...

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Mar 8 2019 4:51PM IST
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : कैसे थमे आधी आबादी के प्रति अपराध...

दिल्ली के निर्भया कांड के बाद वर्ष 2012 में देशभर में सड़कों पर महिलाओं के आत्मसम्मान के प्रति जिस तरह की जन-भावना और युवाओं का तीखा आक्रोश देखा गया था, उससे लगने लगा था कि समाज में इससे संवदेनशीलता बढ़ेगी और ऐसे कृत्यों में लिप्त असामाजिक तत्वों के हौंसले पस्त होंगे किन्तु यह विड़म्बना ही है कि समूचे तंत्र को झकझोर देने वाले निर्भया कांड के बाद भी शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो, जब ‘आधी दुनिया’ से जुड़े अपराध के मामले सामने न आते हों। होता सिर्फ यही है कि जब भी कोई बड़ा मामला आता है तो हम पुलिस-प्रशासन को कोसने और संसद से लेकर सड़क तक कैंडल मार्च निकालने की रस्म अदायगी करके शांत हो जाते हैं और पुनः तभी जागते हैं, जब ऐसा ही कोई बड़ा मामला पुनः सुर्खियां बनता है। 

निर्भया कांड के बाद कानून में सख्ती के बावजूद आखिर ऐसे क्या कारण हैं कि बलात्कार के मामले हों या छेड़छाड़ अथवा मर्यादा हनन या फिर अपहरण अथवा क्रूरता, आधी दुनिया के प्रति अपराधों का सिलसिला थम नहीं रहा है? इसका एक बड़ा कारण तो यही है कि कड़े कानूनों के बावजूद असामाजिक तत्वों पर वो कड़ी कार्रवाई नहीं हो रही है, जिसके वो हकदार हैं। आधी दुनिया के साथ देश में हो रहे अपराधों को लेकर स्थिति कितनी भयावह है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि 2015 में देश में बलात्कार संबंधी 34651 मामले दर्ज हुए जबकि एक साल में छेड़छाड़ के 8 लाख से भी अधिक मामले पुलिस के समक्ष आए, जो इस बात का प्रतीक है कि महिलाएं आज भी सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि महज कानून कड़े कर देने से ही महिलाओं के प्रति अपराध थमने से रहे, जब तक उनका ईमानदारीपूर्वक कड़ाई से पालन न किया जाए।

ऐसे मामलों में पुलिस की भूमिका भी अनेक अवसरों पर संदिग्ध रहती है। पुलिस पीडि़ताओं को ही परेशान करके उनके जले पर नमक छिड़कने का कार्य करती है, ऐसे उदाहरण अक्सर सामने आते रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों के मद्देनजर अपराधियों के मन में पुलिस और कानून का भय कैसे उत्पन्न होगा और कैसे महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों में कमी की उम्मीद की जाए? ऐसे में जरूरत इस बात की है कि पुलिस को लैंगिक दृष्टि से संवदेनशील बनाया जाए ताकि पुलिस पीडि़त पक्ष को पर्याप्त संबल प्रदान करे और पीडि़ताएं अपराधियों के खिलाफ खुलकर खड़े होने की हिम्मत जुटा सकें, साथ ही जांच एजेंसियों और न्यायिक तंत्र से भी ऐसे मामलों में तत्परता से कार्रवाई की अपेक्षा की जानी चाहिए। ऐसी घटनाओं पर अंकुश के लिए समय की मांग यही है कि सरकारें मशीनरी को चुस्त-दुरूस्त बनाने के साथ प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित करें। 

अब दिनदहाड़े सामने आती छेड़छाड़, अपहरण, बलात्कार या सामूहिक दुष्कर्म जैसी घटनाएं सभ्य समाज के माथे पर बदनुमा दाग के समान हैं। आए दिन देशभर में हो रही इस तरह की घटनाएं हमारी सभ्यता की पोल खोलने के लिए पर्याप्त हैं। पिछले साल एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें बताया गया था कि चार वर्षों में महिला अपराध के लंबित मामलों में सिर्फ सात फीसदी का ही निपटारा हुआ और उनमें भी महज 23 फीसदी मामलों में ही अपराधियों को सजा मिली। इस मामले में देश की राजधानी दिल्ली की हालत तो बहुत बदतर है, जहां प्रतिदिन 48 महिलाएं अपराधिक घटनाओं का शिकार बनती हैं, जिनमें दुष्कर्म, छेड़छाड़, अश्लील इशारे, दहेज हत्या शामिल हैं। केन्द्रीय महिला बाल विकास मंत्रालय ने एक नवम्बर 2017 को प्लान इंडिया की 30 राज्यों की एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसके अनुसार बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और झारखंड महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित हैं, जो क्रमशः 30वें, 29वें, 28वें व 27वें पायदान पर हैं।

हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि बलात्कार और छेड़छाड़ के आए दिन जो मामले सामने आ रहे हैं, उनमें बहुत से ऐसे भी होते हैं, जिनमें पीडि़ता के परिजन, निकट संबंधी या परिचित ही आरोपी होते हैं। दिल्ली पुलिस द्वारा जारी आंकड़ों में तो यहां तक कहा गया है कि करीब 97 फीसदी मामलों में महिलाएं अपनों की ही शिकार होती हैं। जहां देश में हर 53 मिनट में एक महिला यौन शोषण की शिकार होती है और हर 28 मिनट में अपहरण का मामला सामने आता है, वहीं संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में प्रत्येक तीन में से एक महिला का कभी न कभी शारीरिक शोषण होता है। दुनिया में करीब 71 फीसदी महिलाएं शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना अथवा यौन शोषण व हिंसा की शिकार होती हैं, दक्षिण अफ्रीका में हर छह घंटे में एक महिला को उसके साथी द्वारा ही मौत के घाट उतार दिया जाता है और अमेरिका में भी इसी प्रकार कई महिलाएं हर साल अपने ही परिचितों द्वारा मार दी जाती हैं।

अगर बात करें दुष्कर्म पीडि़ताओं के जख्मों पर मरहम लगाने में सरकारी भूमिका की तो 2012 के निर्भया कांड के बाद पीडि़ताओं को मुआवजा देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर निर्भया कोष बनाया गया था, जिसमें करीब दो हजार करोड़ की राशि बताई जाती है और पिछले साल सरकार द्वारा महिला सुरक्षा के लिए इस कोष में 2900 करोड़ रुपये का योगदान भी दिया गया किन्तु इस फंड का प्रयोग करने के मामले में राज्य सरकारें उदासीन रही हैं। गत वर्ष सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों से जानकारी मांगी गई थी कि उन्हें दुष्कर्म पीडि़त महिलाओं को मुआवजे के मद में कितना पैसा मिला और उसमें से कितना बांटा गया। विड़म्बना देखिये कि देश के 24 राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश यह मामूली सी जानकरी उपलब्ध कराने में भी नाकाम रहे, जिसके बाद अदालत द्वारा सख्त रूख अपनाते हुए कहा कि इन सरकारों द्वारा हलफनामा दाखिल न करना यह दिखलाता है कि राज्य सरकारें महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित और गंभीर नहीं हैं।

जहां तक पीडि़ताओं को न्याय दिलाने की बात है तो इसके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग काफी समय से उठती रही है किन्तु हमारा सिस्टम कछुआ चाल से रेंग रहा है। ऐसे मामलों में कठोरता के साथ-साथ त्वरित न्याय की भी सख्त जरूरत है ताकि महिला अपराधों पर अंकुश लग सके। आज शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं तो हमें यह जानने के प्रयास करने होंगे कि कमी हमारी शिक्षा प्रणाली में है या कारण कुछ और हैं। ऐसे कृत्यों में लिप्त रहने वाले लोगों की पड़ताल करना भी बहुत जरूरी है, साथ ही सामाजिक मूल्यों का विकास करने के लिए नैतिक शिक्षा को लागू करना समय की मांग है ताकि युवाओं की नकारात्मक सोच को परिवर्तित करने में मदद मिल सके, जिससे स्थिति में सुधार की उम्मीद की जा सके।


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