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विक्रमादित्य का मिलना सामरिक दृष्टि से अहम

आईएनएस विक्रमादित्य का भारतीय नौसेना को मिलना बहुत मायने रखता है। हालांकि यह अगले वर्ष फरवरी तक देश में पहुंचेगा।

विक्रमादित्य का मिलना सामरिक दृष्टि से अहम
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आज सीमाओं की सुरक्षा को लेकर जिस तरह की चुनौतियां पेश आ रही हैं, उसमें सेना के तीनों अंगों के बेड़े को नए-नए हथियारों, युद्धक साजो-सामानों और नई तकनीकों से लैस करते जाना ही र्शेयस्कर होगा। क्योंकि आर्थिक दृष्टि से महाशक्ति बनने जा रहे भारत के लिए जरूरी है कि उसकी सामरिक तैयारियां भी पुख्ता हों। इस कड़ी में आईएनएस विक्रमादित्य का भारतीय नौसेना को मिलना बहुत मायने रखता है। हालांकि यह अगले वर्ष फरवरी तक देश में पहुंचेगा। इसे पांच साल पूर्व ही रूस द्वारा भारत को सौंपा जाना था, परंतु तकनीकी खामियों और सौदे की लागत पर विवाद के कारण इसकी तिथि दो बार बढ़ाई गई। रूस के युद्धपोत एडमिरल गोर्शकोव को ही भारतीय नौसेना ने आईएनएस विक्रमादित्य नाम दिया है। इस सौदे की यह कहकर आलोचना भी हुई कि यह नया युद्धपोत नहीं है, बल्कि पुराने पड़ चुके एडमिरल गोर्शकोव को ही मरम्मत कर नई शक्ल दी गई है। एक समय इस विमानवाही पोत का सौदा भारत-रूस द्विपक्षीय संबंधों में एक बड़ी अड़चन का कारण बन गया था। क्योंकि समय से मरम्मत नहीं होने के कारण वक्त पर आपूर्ति नहीं हो पाई थी और बाद में रूस की ओर से मरम्मत की लागत भी काफी बढ़ा दी गई थी। यद्यपि दोनों देशों ने एक अतिरिक्त समझौता किया जिसके तहत भारत पोत की मरम्मत के लिए अधिक कीमत का भुगतान करने पर सहमत हुआ। हालांकि बढ़ी कीमत के बावजूद इसे एक अच्छा सौदा माना जा सकता है, क्योंकि उसकी तरह का पोत अंतरराष्ट्रीय बाजार में दोगुनी से कम कीमत पर नहीं मिलेगा और कोई भी विमानवाहक पोत निर्यात के लिए नहीं बनाता। इसमें कोई दो राय नहीं कि आईएनएस विक्रमादित्य से भारत की सामरिक ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। फिलहाल नौसेना के पास एक ही विमानवाहक पोत आईएनएस विराट है। जिसे पांच दशक पहले ब्रिटेन से खरीदा गया था। आईएनएस विक्रमादित्य उससे आधुनिक और आकार में दोगुना बड़ा है। अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं, जब देश के पहले विमानवाही जंगी पोत आईएनएस विक्रांत को जल में उतारा गया था। हालांकि इसे अभी नौसेना में शामिल होने में पांच साल लगेंगे। जब ये दोनों पोत जल सेना का अंग बन जाएंगे, तब सैन्य क्षमता में अप्रत्याशित वृद्धि हो जाएगी। आईएनएस विक्रांत का निर्माण स्वदेशी तकनीक के जरिए किया गया है। अब तक अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस के पास ही यह क्षमता थी। पिछले दिनों भारत ने स्वदेशी तकनीक से निर्मित पहली परमाणु पनडुब्बी अरिहंत के रिएक्टर को भी चालू किया था। इसके साथ-साथ भारत स्वदेशी तकनीक से हल्के लड़ाकू विमान का निर्माण करने के साथ-साथ आधुनिक हथियारों का आयात भी कर रहा है। आज देश के पास उपमहाद्वीप तक मार करने वाली अग्नि-5 मिसाइल है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम भी प्रगति पर है। भारत परमाणु शक्ति पहले ही बन चुका है। इस तरह जल, थल और नभ तीनों ही क्षेत्रों में भारतीय सेनाएं आहिस्ता-आहिस्ता मजबूती हासिल कर रही हैं। भारत के समक्ष पाकिस्तान ही नहीं, चीन जैसे देशों की ओर से जिस तरह की चुनौतियां पेश की जा रही हैं उसे देखते हुए ये तैयारियां जरूरी भी हैं।


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