Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

डा. आलोक पुराणिक का लेख : सस्ते कर्ज पर महंगाई का ग्रहण

रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है। यह चार फीसदी पर बरकरार है। इसकी एक वजह यह है कि रिजर्व बैंक महंगाई को लेकर चिंतित है। चिंता यह है अगर महंगाई बढ़ रही है, तो कर्ज की ब्याज दरों में कमी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि अगर ब्याज दरों में कमी हुई, तो लोग ज्यादा कर्ज लेकर चीजें खरीदेंगे, चीजों की मांग बढ़ जायेगी। चीजों की मांग बढ़ने के साथ ही महंगाई में बढोत्तरी होने के आसार हो जाते हैं। महंगाई बढ़ने की चिंता जब रिजर्व बैंक को होती है, तो ब्याज दरों में कटौती नहीं होती। कुल मिलाकर ब्याज दरों में कमी के आसार फिलहाल नहीं दिख रहे हैं। कुल मिलाकर रिजर्व बैंक महंगाई बनाम सस्ते कर्ज की उहापोह से जूझ रहा है।

डा. आलोक पुराणिक का लेख : सस्ते कर्ज पर महंगाई का ग्रहण
X

डा. आलोक पुराणिक

रिजर्व बैंक ने हाल में मौद्रिक नीति से जुड़ी जो घोषणाएं की हैं, उनमें कुछ बातें एकदम साफ हैं। एक तो यह कि देश की अर्थव्यवस्था अब पक्के तौर पर पटरी पर आ रही है। रिजर्व बैंक के अनुसार अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर अगले वित्त वर्ष में सुधरकर 10.5 फीसदी पर आने का अनुमान है। देश विदेश के तमाम संस्थानों के आकलन पर नजर डालें, तो साफ होता है कि 2021-22 के दौरान देश की विकास दर का आंकड़ा दस प्रतिशत से ऊपर ही दिख रहा है। कुछ दिनों पहले प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण में भी अनुमान किया गया था कि 2021-22 में विकास दर 11 प्रतिशत रहेगी। यह अपने आप में बहुत आश्वस्तिकारक बात है। इसके अलावा जीएसटी का संग्रह जनवरी 2021 में 1,20,000 करोड़ रुपये का रहा। यह अभी तक का सबसे ज्यादा बड़ा संग्रह है जीएसटी का। यानी अर्थव्यवस्था के सुधार के सिर्फ आकलन ही नहीं हैं। बल्कि जमीनी स्तर पर उनके संकेत भी साफ हैं।

रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि हमारा दृढ़ विश्वास है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई वित्त वर्ष 2021-22 में हो जाएगी। यह आकलन, यह भरोसा, यह अनुमान बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि कोरोना जैसी महामारी से अर्थव्यवस्था की वापसी एक ही वित्त वर्ष में हो जाये, यह छोटी बात नहीं है। कुछ दिन पहले प्रस्तुत बजट ने राजकोषीय घाटे को लेकर कुछ गंभीर आंकड़े दिये थे। 2020-21 के लिए राजकोषीय घाटे का अनुमान था कि यह सकल घरेलू उत्पाद का 3.5 प्रतिशत होगा, पर यह कूदकर 9.5 प्रतिशत पर चला गया । 2021-22 के लिए अनुमान रखा गया है कि राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 6.8 प्रतिशत रहेगा। कोरोना काल में राजकोषीय घाटा तय लक्ष्य के दोगुने से भी ऊपर चला गया। पर इस पर ज्यादा चिंता होती नहीं दिख रही। आर्थिक सर्वेक्षण कुछ दिन पहले ही कोरोना संकट को शताब्दी के संकट के तौर पर चिन्हित कर चुका है। यानी ऐसा अपवाद पूर्ण संकट जो एक शताब्दी में देखने में आता है कभी कभार। तो इस अपवाद स्वरुप परिस्थिति में राजकोषीय घाटा का ज्यादा हो जाना चिंता का विषय तो है, पर इस पर हाहाकार की आवश्यकता नहीं है।

रिजर्व बैंक का आकलन आश्वस्तकारी इसलिए है कि बजट में प्रस्तुत आंकड़े तो संसाधनों के संकट का संकेत दे रहे थे। विनिवेश यानी सरकारी उपक्रमों के शेयर बेचकर 2020-21 में 2,10,000 करोड़ रुपये उगाहे जाने थे, पर सिर्फ 32000 हजार करोड़ रुपये ही उगाहे जा सके। यानी तय लक्ष्य का करीब 15 प्रतिशत ही हासिल किया जा सका। 2021-22 के लिए इस मद से 1,75,000 करोड़ रुपये उगाहे जाने का प्रस्ताव रखा गया है। 2020-21 के लिए कंपनी करों से 6,81,000 करोड़ रुपये उगाहे जाने का लक्ष्य था। पर कोरोना के संकट की वजह से इस मद से सिर्फ 4,46,000 करोड़ रुपये हासिल हुए यानी करीब 65 प्रतिशत इस मद से हासिल हुए। अब 2021-22 में सरकार ने अपनी उम्मीदों को 2020-21 के मूल स्तर से भी कम कर दिया है। अब कंपनी कर से 2021-22 में 5,47,000 करोड़ रुपये उगाहने की योजना है। सरकार को उम्मीद थी कि 2020-21 में आयकर की मद से 6,38,000 करोड़ रुपये की वसूली होगी, पर वास्तविक वसूली हुई 459000 करोड़ रुपये की य़ानी तय लक्ष्य के मुकाबले 72 प्रतिशत की प्राप्ति हुई आयकर से। स्वाभाविक है सिकुड़ती अर्थव्यवस्था में जब आय सिकुड़ रही हो तो आयकर कैसे बढ़ सकता है। सरकार को उम्मीद है कि वापसी की राह पर चलती अर्थव्यवस्था में 2021-22 में 561000 करोड़ रुपये आयकर की मद में हासिल किये जा सकते हैं। यही हाल आयात शुल्क का रहा, 2020-21 में सरकार को उम्मीद थी कि सीमा शुल्क से 138000 करोड़ रुपये उगाहे जायेंगे, पर वास्तव में सिर्फ 1,12,000 करोड़ रुपये ही इस मद से आये। यानी तय लक्ष्य का करीब 81 प्रतिशत ही हासिल हो पाया इस मद से। यानी कमाई उतनी ना हुई, जितनी उम्मीद थी पर खर्चे बढ़ाकर करने पड़े।

रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला किया है। रिजर्व बैंक को जब ब्याज दरों में कटौती के संकेत देने होते हैं, तो रिपो रेट और रिवर्स रिपो रेट में कमी की जाती है। ये वो दरें हैं, जिन पर बैंक रिजर्व बैंक से रकम लेते हैं और रिजर्व बैंक को रकम देते हैं, छोटी अवधि कि लिए। इन दरों में कमी बेशी से ही रिजर्व बैंक के संकेत हासिल किये जाते हैं कि रिजर्व बैंक बैंकिंग में ब्याज दरों में कमी चाहता है या बढ़ोत्तरी चाहता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है। यह चार फीसदी पर बरकरार है। केंद्रीय बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि रिवर्स रेपो रेट को भी 3.35 फीसदी पर स्थिर रखा गया है। यानी ब्याज दरों का परिदृश्य जैसा था, वैसा ही बना रहेगा। यानी कार, मकान आदि के कर्ज की किश्त सस्ती नहीं होने जा रही है। इसकी एक वजह यह है कि रिजर्व बैंक महंगाई को लेकर चिंतित है। महंगाई को लेकर रिजर्व बैंक की चिंता यह है अगर महंगाई बढ़ रही है, तो कर्ज की ब्याज दरों में कमी नहीं होनी चाहिए। क्योंकि अगर ब्याज दरों में कमी हुई, तो लोग ज्यादा कर्ज लेकर चीजें खरीदेंगे, चीजों की मांग बढ़ जायेगी। चीजों की मांग बढ़ने के साथ ही महंगाई में बढोत्तरी होने के आसार हो जाते हैं।

महंगाई बढ़ने की चिंता जब रिजर्व बैंक को होती है, तो ब्याज दरों में कटौती नहीं होती। कुल मिलाकर ब्याज दरों में कमी के आसार फिलहाल नहीं दिख रहे हैं। कुल मिलाकर रिजर्व बैंक महंगाई बनाम सस्ते कर्ज की उहापोह से जूझ रहा है। इसमें फिलहाल महंगाई की चिंताएं हावी होती दिख रही हैं।

महंगाई के बारे में आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि निकट भविष्य में सब्जियों के दाम नरम बने रहने की उम्मीद है। वित्त वर्ष 2020-21 की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में महंगाई दर 5.2 फीसदी तक रह सकती है। वहीं अगले वित्त वर्ष 2021-22 की तीसरी तिमाही में घटकर 4.3 फीसदी पर रह सकती है। गौरतलब है कि रिजर्व बैंक के हिसाब से 2 प्रतिशत से लेकर छह प्रतिशत तक की सीमा के अंदर महंगाई होनी चाहिए। रिजर्व बैंक इस उद्देश्य के लिए महंगाई का आशय खुदरा महंगाई से लगाता है। हालांकि अगर आपको तेज विकास दर चाहिए तो महंगाई दर के लक्ष्य 5 फीसदी के आसपास रखने होंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Next Story