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सुशील राजेश का लेख : देश में न्यू नॉर्मल बनती महंगाई

जिस दौर में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का अभियान जारी था, तब यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियों और पेट्रोलियम पदार्थों पर करीब 4 लाख करोड़ रुपये के बाॅन्ड्स की खूब आलोचना की गई थी। ‘महंगाई डायन खाय जात हो’ गीत को खूब गाया जाता था। आज मुद्रास्फीति दर रिजर्व बैंक की ‘लक्ष्मण-रेखा’ को भी लांघ चुकी है, 18 राज्यों में पेट्रोल के दाम 100 रुपये से अधिक प्रति लीटर हो गए हैं, छह माह में रसोई गैस करीब 150 रुपये प्रति सिलेंडर महंगी हुई है, खाने के तेल, दूध, सब्जी सब महंगे हो गए हैं। महंगाई के सख्त विरोधी रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी, तो आज उन्हें क्या हो गया है कि औसत नागरिक की तकलीफ भी महसूस नहीं होती? क्या कोरोना-काल में हम इसे ही ‘न्यू नाॅर्मल’ मान लें कि अब इसी महंगाई, बेरोज़गारी और बीमारी के साथ ही हमें जीना पड़ेगा?

सुशील राजेश का लेख : देश में न्यू नॉर्मल बनती महंगाई
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सुशील राजेश

सुशील राजेश

जिस देश के 18 राज्यों में पेट्रोल के दाम 100 रुपये से अधिक प्रति लीटर हो गए हों और डीजल भी बहुत पीछे न हो, जिस देश के 97 फीसदी लोगों की आमदनी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से घटी हो, जब इस महामारी और मंदी के दौर में 23 करोड़ नागरिक 'गरीब' हुए हों, जब कई करोड़ बेरोज़गार हो चुके हों और औसत बेरोज़गारी दर बढ़ती जा रही हो, आम आदमी कटी-फटी तनख्वाह के सहारे ही गुज़र-बसर करने को विवश हों और वह नमक-रोटी खाने की स्थिति में आ जाए, तो वह स्थिति सिर्फ महंगाई और मंदी की नहीं है। ऐसे दौर में रसोई गैस का सिलेंडर भी 900 रुपये के करीब तक पहुंच जाए, तो बेचारा आम आदमी क्या करेगा? मुंबई, चेन्नई और कोलकाता में गैस इससे भी महंगी बिके, तो आम आदमी आर्तनाद करने ही लगेगा-'कंगाली में आटा गीला।' बीते छह माह के दौरान रसोई गैस करीब 150 रुपये प्रति सिलेंडर महंगी हुई है। सब्सिडी वाला सिलेंडर, कमर्शियल सिलेंडर भी महंगे हुए हैं, तो यह भी पेट्रो अर्थव्यवस्था की ही देन है। पेट्रोल और डीजल की कीमतें तो पूरा देश झेल ही रहा है। इनकी कीमतों के बढ़ने से महंगाई सबसे ज्यादा बढ़ती है। उसका सीधा असर खाद्य मुद्रास्फीति पर पड़ता है, लेकिन सरकार पेट्रोल डीजल को ही तुरंत राजस्व का ठोस जारिया मानती है।

एक अनुमान है कि मौजूदा दौर में जब कोरोना संक्रमण भी जारी है और तीसरी लहर की भरपूर संभावनाएं दिखने लगी हैं, भारत सरकार पेट्रोल-डीजल पर टैक्स के जरिये अभी तक 5 लाख करोड़ रुपये वसूल चुकी है। यह आंकड़ा ज्यादा भी हो सकता है। आम आदमी को रेहड़ियों पर छोले-कुलचे खाते अक्सर देखा जा सकता है। कंगाली की मार इतनी जबरदस्त पड़ी है कि यह भी उधार खाना पड़ रहा है। फुटपाथ या रेहड़ी पर ही बिकने वाली चाय भी महंगी हो गई है, क्योंकि दूध और चाय की पत्ती के दाम भी बढ़ गए हैं। सरसों का तेल, अन्य खाद्य तेल और रसोई गैस के दाम आसमान छूने से घर में खाना बनाना दुश्वार होता जा रहा है, क्योंकि वह भी महंगा पड़ता है। फिलहाल थोक महंगाई की दर करीब 13 फीसदी है, जो 2012 के बाद से सर्वाधिक है। खुदरा महंगाई की दर करीब 6.5 फीसदी है। यह बीते छह माह के अंतराल में सबसे ज्यादा है। हालांकि सरकार के पैरोकार तुलना करते हैं कि खाद्य मुद्रास्फीति वैश्विक स्तर पर करीब 39 फीसदी है, जबकि भारत में यह 5 फीसदी ही है। क्या भारत सरकार ने 2014 में नेतृत्व परिवर्तन और मोदी सरकार बनने के बाद 2020 तक मुद्रास्फीति को इसी तरह 'माॅडरेट' रखा है? गैस और पेट्रोल-डीजल के अलावा, दूध भी 2 रुपये प्रति लीटर महंगा हो चुका है। अमूल ने तो बढ़ी कीमत की घोषणा भी कर दी है और उसके खुदरा एजेंटों ने 2 रुपये बढ़ा कर दूध बेचना शुरू भी कर दिया है। दूध के बाद घी, पनीर,मक्खन, आइसक्रीम और मिठाइयां आदि भी महंगी हो जाएंगी, यह तय दिख रहा है। लिहाजा बड़ा संवेदी सवाल है कि आम आदमी जाए, तो कहां जाए? क्या बिना हवा और पानी जिंदा रहे और जब तक कुदरत चाहे, जिंदा रहे, नहीं तो...!

हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी कैबिनेट का विस्तार और फेरबदल किया है। नई मंत्रिपरिषद् की पहली ही बैठक में महामारी, मंदी, महंगाई आदि पर भी चर्चा की गई। सरकार के सामने वित्त मंत्रालय की ताज़ा रपट थी। अर्थव्यवस्था की उस माहवार रपट में पेट्रो पदार्थों पर चुप्पी साधी गई थी। सूत्र बताते हैं कि नये पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी फिलहाल कोई समाधान देने से इंकार कर दिया। कैबिनेट में माना गया कि खाद्य मुद्रास्फीति ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। शहरी इलाकों में हालात बुरे हैं, नतीजतन रिजर्व बैंक ने भी मौद्रिक नीति में बदलाव नहीं किए हैं, बल्कि जीडीपी की विकास दर का अनुमान 9 फीसदी से भी कम आंका है। इससे पहले रिजर्व बैंक का आकलन था कि 2021-22 में विकास दर करीब 11 फीसदी हो सकती है। करीब 10.5 फीसदी का तो भरोसा था। चर्चा के दौरान कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का भी उल्लेख किया गया कि मुद्रास्फीति बढ़ने का एक बुनियादी कारण वह भी है। रपट के मुताबिक, होटल, रेस्तरां, पर्यटन आदि क्षेत्रों के लिए नकदी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है, ताकि लाॅकडाउन के बाद उद्योग और उत्पादन गति पकड़ सकें। लेकिन बाज़ार में फिलहाल मांग नहीं है, लिहाजा उत्पादन स्थगित-सा है। इसका असर रोज़गार और नकदी पर पड़ेगा। आम उपभोक्ता की मांग ठप्प है, क्योंकि उसकी जेब में अतिरिक्त खर्च के लिए पैसा ही नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था उपभोग पर ही टिकी है, लिहाजा किसी भी तरह भारत सरकार को आम आदमी की जेब में नकदी मुहैया कराना होगा।

दरअसल जिस दौर में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का अभियान जारी था, तब यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियों और पेट्रोलियम पदार्थों पर करीब 4 लाख करोड़ रुपये के बाॅन्ड्स की खूब आलोचना की गई थी। 'महंगाई डायन खाय जात हो' गीत को खूब गाया जाता था। आज महंगाई और मुद्रास्फीति रिजर्व बैंक द्वारा खींची गई 'लक्ष्मण-रेखा' को भी लांघ चुकी है, लेकिन दुहाई अंतरराष्ट्रीय बाज़ार और स्वास्थ्य आपातकाल की दी जा रही है। दलीलें दी जा रही हैं कि स्वास्थ्य और कोविड के खर्चों को वहन करने के लिए टैक्स लगाने पड़ रहे हैं। हकीकत यह है कि गरीब के चूल्हे से लेकर चिता तक सब कुछ महंगा होता जा रहा है। लगातार टैक्स बढ़ाने के पीछे अर्थव्यवस्था का खराब प्रबंधन ही बुनियादी कारण होता है। कोरोना-काल के दौरान स्वास्थ्य के तमाम खर्चों के लिए पेट्रोलियम पदार्थों पर वह अतिरिक्त और विशेष एक्साइज बढ़ाई जाती रही है, जिसमें राज्यों की हिस्सेदारी नहीं होती। विडंबना यह है कि हमें उत्पादन के आंकड़े दिए जाएंगे, तो मांग का डाटा नहीं दिया जाएगा। उत्पादन और मांग का सम्यक् डाटा उपलब्ध कराने की परंपरा हमारे यहां नहीं रही है, लिहाजा हमें सरसों के तेल के दाम पता होते हैं, लेकिन सरसों की फसल किस भाव बिक रही है और किसान को क्या मिल रहा है, इसकी कोई भी जानकारी हमें नहीं होती। तो महंगाई का सही मूल्यांकन कैसे संभव होगा? महत्वपूर्ण सवाल यह है कि स्थितियां कब स्थिर होंगी, जब रोज़गार और नौकरियां भी होंगी, आम उपभोक्ता की जेब में नकदी होगी और बाज़ार में मांग बढ़ेगी? सरकार के पैरोकार 3-4 माह की मोहलत मांग रहे हैं, लेकिन तब तक आम नागरिक क्या करे? मुट्ठी भर अनाज देने से दायित्व पूरा नहीं होता। जितने भी वंचित हैं, सभी को निःशुल्क अनाज भी कहां मयस्सर है? महंगाई के सख्त विरोधी रहे हैं मोदी, तो आज उन्हें क्या हो गया है कि नागरिक की तकलीफ भी महसूस नहीं होती? क्या कोरोना-काल में हम इसे ही 'न्यू नाॅर्मल' मान लें कि अब महंगाई, बेरोज़गारी व बीमारी के साथ जीना पड़ेगा?

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं )

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