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शांति व विकास के लिए भारत-पाक वार्ता जरूरी

लेकिन कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों ने सदन में गंभीरता का परिचय नहीं दिया

शांति व विकास के लिए भारत-पाक वार्ता जरूरी
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पिछले दिनों भारत व पाकिस्तान अपने द्विपक्षीय रिश्ते को लेकर जिस तेजी से वार्ता की मेज पर आए उसके बाद से ही लोगों के मन में एक कौतुहल बना हुआ था कि दोनों टकराव और कटुता की भाषा छोड़ एकाएक दोस्ती और अमन की बात कैसे करने लगे? इसका उत्तर जानने की हर किसी में जिज्ञासा थी। यही वजह है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के संसद में होने वाले बयान का इंतजार हो रहा था।
हालांकि कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों ने सदन में गंभीरता का परिचय नहीं दिया और इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी हंगामा करते रहे। कुछ वगरें की ओर से सवाल उठाया जा रहा था कि जब पाकिस्तान की ओर से अभी भी आतंकवाद और घुसपैठ बंद नहीं हुआ है, वैसे में वार्ता की जरूरत क्या थी? हालांकि ऐसे प्रश्नों का जवाब देते हुए सुषमा स्वराज ने साफ किया है कि पाकिस्तान से संबंध सुधारने की दिशा में आगे बढ़ना भारत के साथ-साथ पूरे दक्षिण एशिया के हित में है।
इसी से शांति, विकास और तरक्की के रास्ते खुलेंगे। बेशक अभी कुछ समस्याएं हैं, लेकिन एक बार समग्र वार्ता की शुरुआत हो जाएगी तो उम्मीद है पाकिस्तान उन पर गंभीरता से पालन करेगा। हाल में पाकिस्तान ने अपने रुख में बदलाव के संकेत दिए थे। उसी के बाद पेरिस में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने संक्षिप्त मुलाकात कर रिश्ते सुधारने की दिशा में आगे बढ़ने पर विचार किया। परिणामस्वरूप बैंकॉक में दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों और विदेश सचिवों की बैठक हुई जिसकी सफलता के बाद भारत के विदेश मंत्री का हॉर्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में हिस्सा लेने पाकिस्तान जाना संभव हुआ। जहां उनकी नवाज शरीफ और विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज से वार्ता हुई।
जिसके बाद दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने के लिए समग्र वार्ता करने का निर्णय लिया। इसके तहत जिन मुद्दों पर बात की जाएगी उनमें शांति और सुरक्षा, जम्मू-कश्मीर, सियाचिन, सर क्रीक, तुलबुल परियोजना, आर्थिक और वाणिज्यिक सहयोग, आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई, मादक पदाथरें की रोकथाम, मानवीय मुद्दे और लोगों की आवाजाही शामिल हैं। यह बातचीत कैसे आगे बढ़ेगी इसका फैसला दोनों देशों के विदेश सचिव करेंगे।
माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले साल सितंबर में होने वाले दक्षेस शिखर सम्मेलन के लिए पाकिस्तान जा सकते हैं। अगर वे गए तो यह जनवरी 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बाद भारत के पहले प्रधानमंत्री की पाकिस्तान यात्रा होगी। वह यात्रा दोनों देशों के रिश्तों में मील का पत्थर साबित होगी। वहीं अपने बयान से सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार की नीति को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है।
नई सरकार के अब तक के प्रयासों पर नजर दौड़ाएं तो एक बात साफ हो जाती है कि यह सरकार पड़ोसी देशों से मधुर संबंध चाहती है। इसके लिए सत्ता में आने के दिन से ही राजग सरकार काम कर रही है। नरेंद्र मोदी ने अपने शपथग्रहण समारोह में पाक सहित सभी दक्षेस देशों के प्रमुखों को आमंत्रित किया था, लेकिन पाकिस्तान के संबंध में वह दोस्ताना माहौल बहुत आगे नहीं बढ़ पाया। उसके बाद इसी साल रूस के उफा में प्रधानमंत्री मोदी ने नवाज से मिलकर अमन बहाली की दोबारा पहल की थी, लेकिन पाकिस्तान के हठ के कारण यह भी आगे नहीं बढ़ सका।
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