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डाॅ. अश्विनी महाजन का लेख : स्वदेशी ही समाधान

लगता है सरकार ने कमर कस ली है। वर्ष 2021-22 के बजट में अगले कुछ सालों में 1.97 लाख करोड़ रुपये के प्रोडक्शनलिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) की घोषणा इसी संकल्प की ओर इंगित करती है। आज जरूरत इस बात की है कि चीनी और अन्य सामानों पर रोक लगाते हुए अपने उद्यमियों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाए कि वे भारत में ही उत्पादन बढ़ाएं। इस नीति के अच्छे परिणाम आने भी शुरू हुए हैं। एपीआई, इलेक्ट्रॉनिक, खिलौने, केमिकल्स, मशीनरी आदि उद्योगों में इसके परिणाम दिखने लगे हैं। देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और अस्मिता बचाने का शायद आत्मनिर्भरता यानी स्वदेशी ही एक सही रास्ता है।

डाॅ. अश्विनी महाजन का लेख : स्वदेशी ही समाधान
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Dr. Ashwini Mahajan

डाॅ. अश्विनी महाजन

हाल ही में अमेरिकी प्रशासन द्वारा इस महामारी में जनता के सुरक्षा कवच के नाते भारत के वैक्सीन उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की आपूर्ति रोकने और उसके पास बेकार पड़ी वैक्सीन की चार करोड़ खुराकों के स्टाॅक को भारत और अन्य देशों को भेजने पर रोक लगाने वाले फैसले की अमेरिका सहित दुनियाभर में आलोचना हुई। गौरतलब है कि अमेरिका के बाइडेन प्रशासन ने पहले फैसला लिया था कि 'पहले अमेरिका' की नीति के तहत वैक्सीन के कच्चे माल और वैक्सीन को भारत में नहीं भेजेंगे। हालांकि अब अमेरिका ने वैक्सीन के लिए कच्चा माल भेजने का निर्णय ले लिया है, इससे यह सबक जरूर मिलता है कि हम आवश्यक वस्तुओं के लिए दूसरे मुल्कों पर निर्भर नहीं रह सकते।

उल्लेखनीय है इस वैक्सीन के स्टॉक की अमेरिका को फिलहाल कोई जरूरत नहीं है और न ही कच्चे माल की अमेरिका में कोई कमी है, जिससे उसे भारत को देने में उसे कोई नुकसान होगा। ऐसे में अमेरिका के इस फैसले से न केवल अमेरिका की असंवेदनशीलता उजागर होती है, बल्कि हमें आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा भी मिलती है। वह देश जिन्होंने दुनिया को एक गांव है और आपसी व्यापार और सहकार ही जनता के कल्याण के लिए जरूरी होने का दंभ भरते हुए हमें भूमंडलीकरण की ओर धकेला, वही देश बिना वजह हमारी आवश्यकता की चीजों को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। चीन से आये वायरस ने पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। एक और स्वास्थ संकट और उपकरणों का अभाव, संक्रमण के डर से मानसिक तनाव और मौत का तांडव, तो दूसरी और अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट तथा बेरोजगारी के कारण अमीर-गरीब और मध्यम वर्ग पर कहीं थोड़ा तो कहीं ज्यादा असर हुआ है। जहां तक बीमारी के असर की बात है, वहां भी सभी वर्ग प्रभावित हुए हैं।

दूसरी ओर दुनिया की बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं, चाहे वे दवा कंपनियां हो, कृषि, ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया या बड़ी टेक-कंपनियां, सभी के लाभ और व्यवसाय में पहले से ज्यादा वृद्धि हुई है। समझना होगा कि दुनिया के मुट्ठीभर अरबपतियों के पास ही उपरोक्त इन सभी कंपनियों का स्वामित्व है। पिछले 30 वर्षों का भी यदि इतिहास देखा जाए तो भूमंडलीकरण के इस युग में सबसे ज्यादा लाभ यदि किसी को हुआ है तो भी इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इसका लाभ हुआ है। इन कंपनियों के व्यवसाय और परिसंपत्तियां कई गुना बढ़ गई हैं। अधिकांश बौद्धिक संपदा अधिकार हो अथवा अन्य परिसंपत्तियां, इन कंपनियों के हाथों में केंद्रित होती जा रही हैं। असमानता की बात करें तो दुनियाभर में आय और संपत्ति की असमानताएं भी बढ़ी है।

अधिकांश बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अमेरिका, यूरोप और जापान में हैं और अब चीन में भी इन कंपनियों का प्रादुर्भाव हुआ है। भूमंडलीकरण के लाभों का लालच दिखाकर विकासशील देशों को मुक्त व्यापार और विदेशी पूंजी के भंवर में फंसाया गया। कहा गया कि मुक्त व्यापार से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे हमारे उद्योग धंधे और खेती पनपेगी, लेकिन इसका असर एकदम उल्टा हुआ। चीन के डब्ल्यूटीओ में प्रवेश के बाद उसने नियमों को धत्ता दिखाते हुए, गलत तरीके से दुनियाभर के देशों में अपना माल डंप करना शुरू कर दिया। नतीजन अमेरिका, यूरोप, भारत समेत अनेक देशों के घरेलू उद्योग दम तोड़ने लगे और उनका चीन के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ने लगा। भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 2000-01 में 0.2 अरब डॉलर से बढ़ता हुआ 2017-18 तक 63 अरब डॉलर यानी 315 गुना बढ़ गया। साथ-ही-साथ भारत हर जरूरी या गैर जरूरी वस्तुओं के लिए चीन पर निर्भर हो गया। इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम, एपीआई समेत तमाम ऑर्गेनिक और इनऑर्गेनिक कैमिकल्स, मशीनरी, स्टील, खिलौने, साईकिल समेत सभी चीजें चीन से आने लगी थी।

नरेंद्र मोदी द्वारा 2014 में सत्ता संभालने के बाद 'मेक इन इंडिया' का नारा आया। कुछ प्रयास भी हुए, लेकिन चीन से आयात बदस्तूर जारी रहे। यह सही है कि कई चीनी और अन्य विदेशी कंपनियों ने मेक इन इंडिया के तहत भारत में उत्पादन केंद्र शुरू कर दिए, जिसके कारण व्यापार घाटा थोड़ा कम जरूर हुआ, लेकिन मार्च 2020 में महामारी के बाद देश को चीन पर अत्यधिक निर्भरता की गलती का एहसास पूरी तरह से हो गया। यह भी सही है कि उससे भी चार-पांच वर्ष पहले से ही चीन की विस्तारवादी नीति और सीमाओं के अतिक्रमण के कारण देश की जनता ने चीनी वस्तुओं का बहिष्कार शुरू कर दिया था। सरकारी प्रयासों और जनता के चीन के प्रति आक्रोश के बावजूद चीन से व्यापार घाटा 2019-20 तक मात्र 48 अरब डालर तक ही घट सका। फिर मार्च 2020 से आये कोरोना ने तो नीति निर्माताओं की आंखें खोल दी। पीपीई किड्स, मास्क, टेस्टिंग किट्स, वेंटिलेटर और अन्य जरूरी मेडिकल उपकरणों की कमी ने तो जैसे देश को झकझोर कर रख दिया था। ऐसे में पूरे देश की एक आवाज थी कि देश को आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान किया कि हमारा लक्ष्य आत्मनिर्भर का है और उसके लिए देश में सभी को जुटना होगा। बड़े उद्योग, छोटे उद्योग या सामान्य जन सभी को आह्वान किया गया। आज वक्त है कि हम विचार करें कि क्या हुआ है कि चीनी सामान की डंपिंग के कारण हमारे औद्योगिक विकास पर विराम लग गया। गलती कहां हुई? क्यों जब भारत के उद्योग चीनी सामानों के आक्रमण के कारण दम तोड़ रहे तो उस समय की सरकार आयात शुल्क और अधिक घटाकर उस प्रक्रिया को और तेज करने का काम कर रही थी? क्यों हमारे अर्थशास्त्री उपभोक्ता को सस्ता सामान मिलने के नाम पर आंखें मूंदकर अपने उद्योगों के नष्ट होने का तमाशा देख रहे थे, लेकिन आज इस महामारी ने हमारी आंखें खोल दी है। कैसे महामारी के पहले चरण में चीन ने नकली टेस्िटंग किट्स भेजकर हमारी मुश्किलों को बढ़ाया। हमारी जरूरत के मद्देनजर बाकी साजो सामान की कीमत बढ़ा दी। अमेरिकी सरकार का वैक्सीन भेजने पर रोक लगाने और पहले तो वैक्सीन के कच्चे माल को भी रोकने का निर्णय इसी प्रकार हमारे आत्मनिर्भरता के संकल्प को मजबूत बनाने का काम कर रहा है।

लगता है सरकार ने भी इसके लिए कमर कस ली है। वर्ष 2021-22 के बजट में अगले कुछ सालों में 1.97 लाख करोड़ रुपये के प्रोडक्शनलिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) की घोषणा इसी संकल्प की ओर इंगित करती है। आज जरूरत इस बात की है कि चीनी और अन्य सामानों पर रोक लगाते हुए अपने उद्यमियों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाए कि वे भारत में ही उत्पादन बढ़ाएं। इस नीति के अच्छे परिणाम आने भी शुरू हुए हैं। एपीआई, इलेक्ट्रॉनिक, खिलौने, केमिकल्स, मशीनरी आदि उद्योगों में इसके परिणाम दिखने लगे हैं। देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और अस्मिता बचाने का शायद आत्मनिर्भरता यानी स्वदेशी ही एक सही रास्ता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)


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