Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

राजनीति में महिलाओं को नेतृत्व देने में भारत पीछे

देश में कुल 4896 सांसदों और विधायकों में महिलाओं की संख्या सिर्फ 418 यानी नौ फीसदी है।

राजनीति में महिलाओं को नेतृत्व देने में भारत पीछे
नई दिल्‍ली. महिलाओं की संसद में उपस्थिति बताने वाली अंतरराष्ट्रीय संगठन अंतर संसदीय संघ (आईपीयू) की रिपोर्ट के अनुसार, जो कि शनिवार को विश्व महिला दिवस के अवसर पर जारी की गई, दुनिया के 188 लोकतांत्रिक देशों की सूची में भारत 111वें स्थान पर है। वर्तमान में देश में महिला जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति लोकसभा में 11 फीसदी और राज्यसभा में 10.6 फीसदी है। वहीं ग्लोबल स्तर पर संसद में यह आंकड़ा औसत 22 फीसदी है। इसमें सालाना करीब 1.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है।
आंकड़ों के हिसाब से देश में कुल 4896 सांसदों और विधायकों में महिलाओं की संख्या सिर्फ 418 यानी नौ फीसदी है। आईपीयू की सूची में भारत अपने पड़ोसी देशों नेपाल, चीन और यहां तक कि पाकिस्तान से भी काफी पीछे है। 1999 में लोकसभा में महिला संसदों की संख्या 49 थी जो 2009 में बढ़कर 59 तक ही पहुंची है। आजादी के छह दशक बाद भी संसद में महिलाओं की मौजूदगी के ये आंकड़े शर्मनाक हैं।
यह दर्शाता है कि हम राजनीतिक रूप से भी महिला सशक्तिकरण में कितना पीछे हैं। जब जीवन के हर क्षेत्र में आधी आबादी की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है, राजनीति में शीर्ष स्तर पर कम उपस्थिति कईसवाल पैदा करती है? सच तो यह है कि महिलाओं को अवसर ही नहीं दिया जाता है, परंतु उन्हें जब-जब अवसर मिला, खुद को साबित किया है। हमारी पंचायतें इसका उदाहरण हैं। वर्तमान राजनीति की बात करें तो सत्ताधारी दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, बसपा सुप्रीमो मयावती, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, सीपीएम की वृंदा करात और दक्षिण में जयललिता हमारे बीच सफल उदाहरण हैं।
हम 21वीं सदी में हैं, परंतु समाज में अभी भी कई स्तरों पर पुरुषवादी मानसिकता हावी है। इस स्थिति को बदलने के लिए राजनीतिक दलों को अपनी नीयत बदलनी होगी। अभी महिलाएं कार्यकर्ता और मतदाता तो हैं पर उनके पास नेतृत्व नहीं है और जब तक उनके पास नेतृत्व नहीं होगा, महिला सशक्तिकरण की बात बेमानी होगी। भारत खुद को लोकतांत्रिक देश होने पर गर्व करता है और हमारा समाज नारी को शक्ति के रूप में पूजता है, परंतु जब उनका हक देने और आगे बढ़ाने की बात आती है तो हमारी सोच का दायरा क्यों सीमित हो जाता है?
अफगानिस्तन, मिस्र, इराक, बांग्लादेश, चीन, पाकिस्तान सहित सौ से ज्यादा देशों में महिलाओं को संसद में किसी न किसी रूप में आरक्षण का प्रावधान है, परंतु यह समझ से परे है कि देश की राजनीतिक पार्टियां 18 साल से इस मुद्दे पर इतनी उदासीन क्यों हैं? करीब तीन साल पूर्व राज्यसभा से भारी विरोध के बाद महिला आरक्षण बिल पास हुआ था, लेकिन अभी भी उसे लोकसभा और कम से कम आधी विधानसभाओं को पार करना जरूरी है।
इससे महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ेगी, न केवल मतदाता के रूप में बल्कि एक नेता के रूप में भी, क्योंकि इसके बाद से लोकसभा और विधानसभाओं की कुल सीटों का 33 फीसदी महिलाओं के लिए निर्धारित हो जाएगा, परंतु वह दिन कब आएगा, जब सारे दल एकजुट होकर महिलाओं का हक देने वाले इस विधेयक को पारित करेंगे, सभी को इंतजार है। अभी देश चुनावी रंग में रंगा हुआ है। सभी दल महिलाओं को अधिक से अधिक प्रत्याशी बनाकर इस समस्या को दूर करने की दिशा में एक सशक्त पहल कर सकते हैं।

Next Story
Top