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खेलों में पदक बरसारे गांव...

हाल ही में जकार्ता में समाप्त हुए एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन बीते सभी एशियाई खेलों से इक्कीस ही रहा। इस बार एक नई बात सामने आई। भारत के 67 फीसद स्वर्ण और चांदी के पदक जीतने वाले खिलाड़ी गांवों से ही संबंध रखने वाले हैं।

खेलों में पदक बरसारे गांव...
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हाल ही में जकार्ता में समाप्त हुए एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन बीते सभी एशियाई खेलों से इक्कीस ही रहा। इस बार एक नई बात सामने आई। भारत के 67 फीसद स्वर्ण और चांदी के पदक जीतने वाले खिलाड़ी गांवों से ही संबंध रखने वाले हैं।

जर्काता में हमारे हिस्से आए कुल जमा 69 पदक। इनमें 15 स्वर्ण, 24 चांदी और शेष 30 कांस्य के थे। न केवल अधिकतर पद भारत को ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले खिलाड़ियों ने दिलवाए, ये सब के सब अति सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि वाले परिवारों से हैं।

स्वर्ण पदक जीतने वाली स्वप्ना बर्मन के पिता गरीब रिक्शा चालक हैं, वहीं 1500 मीटर स्पर्धा का कांस्य पदक जीतने वाली चित्रा उन्नीकृष्णन के माता-पिता ने खेतों में मजदूरी कर बेटी को किसी तरह स्कूल भेजा।

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चित्रा चार मिनट 12.56 सेकेंड के समय में दौड़ पूरी कर तीसरे स्थान पर रहीं। उत्तरी बंगाल के शहर जलपाईगुड़ी के रिक्शा चालक की बेटी स्वप्ना बर्मन ने सोने का तमगा अपने गले में डाला। वह इस स्पर्धा में स्वर्ण जीतने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी बनी।

अब बात कर लें पहलवान बजरंग पूनिया की। उसने एशियाई खेलों में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीता। बजरंग को इस स्तर तक पहुंचने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। वह दूध-मलाई, मेवा वाला पहलवान नहीं है। दाल-रोटी और मेहनत का कमल दिखाया है, बजरंग ने। झज्जर, हरियाणा के एक निर्धन परिवार से संबंध रखने वाले बजरंग ने कई अवरोधों- चुनौतियों को पार कर यह मुकाम प्राप्त किया।

यह कोई नहीं कह रहा कि शहरी क्षेत्रों के खिलाड़ी अच्छा नहीं कर रहे पर यहां बात तथ्यों के आधार पर रखी जा रही है। क्या देश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्तरीय खेल सुविधाएं हैं? क्या गांवों के स्कूलों में कोच हैं? क्या वहां स्टेडियम हैं? इन सभी प्रश्नों के उत्तर न में हैं। बावजूद इसके गावों के बच्चे खेलों में आगे हैं।

अपने भारत में दुर्भाग्यवश स्टेडियम और खेलों की सुविधाओं से ग्रामीण इलाके अब तक दूर ही रहे। ये मान सा लिया गया कि ग्रामीण भारत से खिलाड़ी नहीं निकलेंगे। भारत में 1951 तथा 1982 में एशियाई खेल हुए। दोनों दिल्ली में हुए। साल 2010 में राष्ट्रमंडल खेल भी हुए। वे भी दिल्ली में। सवाल है कि छोटे शहरों में विकास कैसे होगा?

राजधानी दिल्ली में जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम, इंदिरा गांधी इंडौर स्टेडियम, शिवाजी स्टेडियम, तालकटोरा स्टेडियम वगैरह 1982 के एशियाड के वक्त बने। इनके निर्माण पर हजारों करोड़ों रुपये खर्च हुए। आप कभी इनमें जाकर देख लें। वहां पर गिनती के ही खिलाड़ी प्रेक्टिस करते हुए मिलेंगे।

अब अगर बात एशियाई खेलों में कांस्य पदक विजेता महिला हॉकी टीम, चांदी का पदक जीतने वाली महिला कबड़्डी टीम तथा कांस्य पदक विजयी खिलाड़ियों से हटकर करें तो भारत के 16 राज्यों से संबंध रखने वाले खिलाड़ियों ने पदक जीते। इस दौड़ में हरियाणा ने सबको मात दी। उसके खिलाड़ियों ने 8 पदक जीते। दरअसल एशियाई खेलों में हरियाणा के खिलाडिय़ों पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई थीं।

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भारत की जकार्ता गई टोली में हरियाणा से 83 खिलाड़ी थे। असम, पंजाब, गुजरात, केरल, दिल्ली, तमिलनाडू, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, राजस्थान, झारखंड, कर्नाटक के भी खिलाड़ी पदक जीतने में सफल रहे।

नौकरी की तलाश में रहने वाले युवाओं को खेलों को भी अपने करियर के प्राथमिकता के रूप में अपनाने के संबंध में सोचना ही चाहिए। अब आपको खेलों की सफलता भी मालामाल कर सकती है। आपको नौकरी, नकद पुरस्कार और सामाजिक प्रतिष्ठा के अलावा भी तमाम सुविधाएं मिलती हैं।

बिहार से इस एशियाई खेलों में कोई भी पदक विजेता नहीं निकला। यह ठीक है कि बिहारी समाज में पढ़ने -लिखने पर विशेष फोकस दिया जाता है, पर यह सोच तो थोड़ी बदलनी होगी। आप पढ़िए जरूर पर खेलों को नजरअंदाज तो मत करिए। बिहारी कहावत है कि, “पढ़ोगे-लिखोगे, बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे, बनोगे खराब” अब सार्थक नहीं रही।

एक समस्या यह भी हो रही है कि हमारे यहां खेलों का मतलब मोटा-मोटी क्रिकेट को ही मान लिया गया है। इस मानसिकता के चलते जगह-जगह क्रिकेट कोचिंग सेंटर खुलते जा रहे हैं। एथलेटिक्स, मुक्केबाजी, बैडमिंटन, स्क्वैश, शूटिंग जैसे खेलों की अकादमियां गिनती की ही हैं। नौजवानों को भी इन खेलों को अपनाना होगा।

ये खेल आपको देखते-देखते एक मुकाम पर पहुंचा सकते हैं। रातों रात हीरो बना सकते हैं। अमेरिका या चीन से तो हम मीलों पीछे हैं। हमें फिलहाल अपनी तुलना अमेरिका या चीन से करनी भी नहीं चाहिए क्योंकि इसका कोई मतलब ही नहीं है। अभी तो अगर हम अपने स्कूलों में खेल के मैदान ही उपलब्ध करवा दें तो बड़ी उपलब्धि होगी।

हम कुछ ही खेलों तक अपने को सीमित नहीं रख सकते। हालांकि, कुछ जानकार इस तरह का सुझाव देते रहते हैं। दरअसल हमारा देश बहुत ही विशाल है। यहां पर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग खेलों को लेकर जनता में दिलचस्पी रहती है।

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इसलिए सरकार के स्तर पर कुछ खेलों पर ही खास फोकस नहीं रखा जा सकता है। क्रिकेट, फुटबाल, हॉकी, बैडमिंटन, टेनिस, कबड्डी, कुश्ती, शतरंज समेत अनेक खेल लोकप्रिय हैं। इसलिए देश को सभी खेलों को तवज्जो देते रहना होगा।

यहां यह भी समझ लिया जाए कि एशियाई खेलों से लेकर ओलंपिक में देश उसी स्थिति में आगे जाएगा जब देश का निजी क्षेत्र खेल के प्रति अपना दायित्व समझेगा। खेलों के विकास में प्राइवेट सेक्टर को और निवेश करते रहना होगा। अभी हमारे यहां आईटी सेक्टर की कंपनियां खेलों से दूर हैं। अंत में एक बात और।

विभिन्न खेलों की टीमों के चयन में धांधली के आरोप लगते रहे हैं। इस स्तर पर पारदर्शिता अपनाई जानी चाहिए। पक्षपात करने वाले तत्वों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। पहले तो चुनाव में क्षेत्रवाद की भूमिका रहती थी। इस मोर्चे पर हम पहले से बहुत सुधर गए हैं। एक बात और कहने का मन है। पीवी सिंधू को लेकर।

वो बेहतरीन खिलाड़ी है। उसने बैडमिंटन की एकल प्रतियोगिता में चांदी का पदक जीता। वो फाइनल में हार गई। उसका फाइनल में बार-बार हारना सुखद संकेत नहीं है। वो रियो ओलंपिक में भी फाइनल में हारी थी। कुछ अन्य प्रतियोगिताओं में भी उसे चांदी का पदक ही मिला।

उसके कोच गोपीचंद भी उसके फाइनल में लगातार हारने से निराश होंगे। सिंधू को अब स्वर्ण पदक जीतने की आदत डालनी होगी। बहरहाल, 18वां एशियाई खेल भारत को खूब पदक दे गया। पर अभी तो हमारे युवा खिलाडियों को शिखर पर जाना है।

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