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बजट सुधार की दिशा में ऐतिहासिक फैसला

ब्रिटिश हुकूमत के समय (1924) से ही रेल बजट अलग से पेश किया जाता रहा है।

बजट सुधार की दिशा में ऐतिहासिक फैसला
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केंन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार एक के बाद एक सुधारों की दिशा में ठोस फैसले करती जा रही है। देश के खजाने की हालत दुरुस्त करने, व्यवस्थागत भ्रष्टाचार को खत्म करने और सबसे आखिरी पंक्ति में खड़े आदमी को विकास योजनाओं का निर्बाध गति से फायदा पहुंचाने के मकसद से सरकार कई अहम फैसले ले चुकी है।
घरेलू गैस सब्सिडी सहित कई योजनाओं का पैसा सीधे उनके खाते में जमा करने का निर्णय हो या कोल खदानों की नीलामी का फैसला। स्पैक्ट्रम की नीलामी का प्रश्न हो या गरीबों के बैंक खाते खुलवाने और उन्हें जनधन योजना और बीमा कवर देने का अहम फैसला, इनसे गरीब व्यक्ति को भी सामाजिक सुरक्षा मिलने के रास्ते खुल गए हैं। ब्रिटिश हुकूमत के समय (1924) से ही रेल बजट अलग से पेश किया जाता रहा है।
आजादी के 69 साल बाद तक भी किसी को इसमें बदलाव की बात नहीं सूझी। अलग-अलग समय पर भिन्न भिन्न सरकारों में अलग-अलग राज्यों के रेलवे मंत्री बने और अक्सर उन्होंने अपने राज्यों में राजनीतिक हित साधने के लिए फैसले किए। इससे उन क्षेत्रों की उपेक्षा की जाती रही, जिन्हें रेलवे परियोजनाओं की सबसे ज्यादा जरूरत थी।
खासकर उन राज्यों में यदि चुनाव होने होते थे, तब वहां के रेल मंत्री परियोजनाओं और नई रेलगाड़ी के परिचालन की घोषणाओं की झड़ी लगा देते थे। पिछले साल के रेलवे बजट में मोदी सरकार ने इस तरह की लोकप्रिय घोषणाओं पर रोक लगा दी। रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने एक भी नई रेलगाड़ी का ऐलान नहीं किया। उल्टे यह कहा कि जो रेलगाड़ी चल रही हैं, उनमें सुधार पर जोर दिया जाएगा।
इस नई पहल का हर ओर से स्वागत हुआ। इस साल जून में मोदी सरकार ने बजटीय सुधार का ठोस संकेत दे दिया था। नीति आयोग ने सिफारिश की कि रेल बजट को अलग से पेश न किया जाए। इस आम बजट का हिस्सा बना दिया जाए। अलग से रेल बजट की कोई जरूरत नहीं है। तब ही से इसे लेकर तमाम तरह की अटकलें शुरू हो गई थीं। आखिरकार बुधवार को केन्द्रीय कैबिनेट ने इस फैसले पर मुहर लगा दी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कैबिनेट ने जो ऐतिहासिक फैसला लिया है, उसमें रेल बजट अलग से पेश की परंपरा को खत्म कर दिया गया। अब संसद की मंजूरी के बाद रेल बजट के सभी प्रस्ताव आम बजट में शामिल कर दिए जाएंगे। हालांकि इसके बावजूद रेलवे एक अलग इकाई के तौर पर ही कामकाज करती रहेगी और इसका रुतबा कायम रहेगा। इसके बाद भी रेलवे की कामकाज में स्वतंत्रता बनी रहेगी और रेलवे के वित्तीय अधिकार भी बने रहेंगे।
91 साल से आम बजट से पहले रेल बजट पेश होता आया है, लेकिन अब 2017 से सिर्फ आम बजट ही संसद में पेश होगा। वित्त मंत्रालय ही अब रेल मंत्रालय का बजट तय करेगा। हालांकि वित्त मंत्रालय और रेल मंत्रालय के बीच पेंशन की देनदारी, डिविडेंड, रेलवे को वित्त मंत्रालय से मिलने वाले ग्रॉस बजटीय सहायता और किराया तय करने का अधिकार जैसे मसलों पर अभी अंतिम फैसला होना बाकी है।
केन्द्र सरकार ने एक और अहम फैसले की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं। मोदी सरकार पहली जून से बजटीय प्रावधान लागू होने का इंतजार नहीं करना चाहती। फरवरी के अंतिम सप्ताह में बजट पेश करने के बजाय वह चाहती है कि बजट पहली फरवरी को पेश कर उसे 31 मार्च से पहले पारित कर दिया जाए ताकि पहली अप्रैल से सभी मंत्रालय बजट का लागू करने को स्वतंत्र रहें।
अभी योजनाओं परियोजनाओं पर धनराशि खर्च करने की समय सीमा कम रह जाती है। अगर बजट पेश करने का समय बदलता है तो सरकार अगला बजट सत्र 25 जनवरी 2017 से पहले बुला सकती है ताकि पहली फरवरी को आम बजट पेश किया जा सके।
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