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विश्लेषण / भारत में सोशल मीडिया ने बनाया नया लोकतंत्र

डॉ. संजय शुक्ला | UPDATED Nov 22 2018 3:14PM IST
विश्लेषण / भारत में सोशल मीडिया ने बनाया नया लोकतंत्र

यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि 21 वीं शताब्दी की दुनिया सोशल मीडिया की है, वर्तमान दौर में सोशल मीडिया लोगों के जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है। भारत जैसे चुनावी लोकतंत्र वाले देश में हाल के वर्षों में सोशल मीडिया सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरी है। देश और दुनिया के अमूमन सभी राजनेता विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सक्रिय हैं आज के दौर में किसी भी राजनेता की लोकप्रियता का पैमाना उसके सोशल मीडिया पेज पर फॉलोअर्स की संख्या से आंकी जा रही है।

सोशल मीडिया जनमानस के वैचारिक अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम बन चुका है, इस माध्यम ने समाज के हर आयु व वर्ग को हर मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखने का मौका दिया है। दरअसल इंटरनेट के विकास के साथ ही सोशल नेटवर्किंग के द्वारा इस नए मंच का उदय हुआ है, यह मंच मनोरंजन, राजनीतिक, सामाजिक, अकादमिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विषयों पर परस्पर और सामूहिक विचार-विमर्श का सबसे प्रभावशाली साधन बन चुका है।

सोशल मीडिया की इसी ताकत को पहचानते हुए देश व विदेश के सभी राजनीतिक दल इस माध्यम को अपने पक्ष में करने में जुटे हुए हैं। हमारे देश में पिछले एक दशक के दौरान चुनाव आयोग के सख्ती के कारण चुनाव प्रचार अभियानों में जहां प्रचार साधनों के उपयोग पर भारी कमी आयी है वहीं अब इसका विकल्प सोशल मीडिया ने ले लिया है।

फलस्वरूप हर चुनावों के दौरान चुनाव आयोग की पैनी नजर इस माध्यम पर रहती है। गौरतलब है कि सभी राजनीकि दलों के अपने-अपने आईटी सेल हैं जिसमे आईटी प्रोफेशनल्स से लेकर सोशल मीडिया के नब्ज के जानकार इसमें सक्रिय है, यह सेल विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपने पार्टी व उम्मीदवारों के नीतियों का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।

सोशल मीडिया केवल राजनीतिक और चुनावी अभियान में ही प्रभावकारी माध्यम नहीं है अपितु यह शासन व प्रशासन के संचालन व कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में भी बेहतर साधन बन चुके हैं। सही अर्थों में सोशल मीडिया लोकतंत्र की मुख्य अवधारणा ‘जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन' को फलीभूत करने में एक सशक्त माध्यम बन चुका है।

नि:संदेह भारतीय युवा देश के भविष्य के साथ-साथ देश के विकास और राजनीतिक बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, आज देश की 65 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। सूचना क्रांति के आज के दौर में भारतीय युवाओं के लिए सोशल मीडिया हर बदलाव का बहुत बड़ा जरिया बन चुका है।

एक शोध के मुताबिक देश के ‘शहरी इलाकों में प्रत्येक चार में से तीन युवा किसी न किसी रूप में सोशल मीडिया से जुड़ा हुआ है तथा 84 फीसदी युवा आबादी अपने मोबाइल फोन के द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे गूगल, फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम, मैसेंजर, ट्विटर, ब्लॉग और हाइक से जुड़े हुए हैं, विश्व भर में लगभग 200 सोशल नेटवर्किंग साईट्स हैं।

‘अन्ना आंदोलन' और ‘निर्भया आंदोलन' से लेकर बीते वर्ष में हुए राजनीतिक बदलाव में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है तथा इस लक्ष्य में सोशल मीडिया ने युवाओं के लिए वैचारिक संवाहक का काम किया है। सोशल मीडिया इस दौर की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है जिसनें पारंपरिक मीडिया की ताकत को भी विभाजित कर दिया है।

गौरतलब है कि ‘अन्ना आंदोलन' और ‘निर्भया आंदोलन' को सोशल मीडिया ने देशव्यापी उभार दिया था। तब के दौर में सोशल मीडिया की ताकत से लबरेज और देश के बहुसंख्यक युवाओं और छात्रें ने धर्म, जाति और लिंग से परे जाकर हाथ में तिरंगा थामकर जो जज्बा दिखाया था उसका ही परिणाम था कि सत्ता की चूलें ही हिलने लगी थीं।

तत्समय यह लगने लगा था कि देश के युवाओं में राजनीतिक चेतना के साथ-साथ अन्याय और भ्रष्टाचार के विरूद्ध खड़े होने का काफी जज्बा है तब यह भी आशा बलवती हुई थी कि देश के राजनीति में अब साकारात्मक बदलाव होगा। 2014 के आम चुनाव और दिल्ली विधानसभा चुनाव में सोशल मीडिया लोकतंत्र की एक नयी आवाज बनकर उभरी जिसने युवा मतदाताओं को सत्ता परिवर्तन के लिए लामबंद कर दिया।

लेकिन इसके बाद सोशल मीडिया में युवाओं की ऐसी कोई सक्रियता दिखाई नहीं दी। दरअसल युवाओं को समझना होगा कि महज सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हो सकता बल्कि उन्हें इसके लिए उन्हें सतत प्रयास करना होगा और सोशल मीडिया इसमें साकारात्मक माध्यम बन सकता है।

माना कि सोशल मीडिया नेटवर्किंग साइट्स ने भारतीय लोकतंत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है लेकिन इस परिवर्तन का साकारात्मक और नाकारात्मक प्रभाव भी समाज के सामने हैं। इस माध्यम का स्याह पक्ष युवाओं के लिए ज्यादा घातक साबित हो रहा है। सोशल मीडिया का नकारात्मक प्रभाव देश के राजनीतिक, सामाजिक समरसता और कानून व्यवस्था पर दृष्टिगोचर होने लगा है।

इसमें दो राय नहीं कि सोशल मीडिया संवाद-संपर्क के साथ-साथ प्रचार–प्रसार का एक सशक्त माध्यम हैं लेकिन इसका अनुचित इस्तेमाल भी हो रहा है। चूंकि देश की एक बहुत बड़ी आबादी युवाओं की है इसलिए वे कई राजनीतिक और धार्मिक संगठनों के निशाने पर हैैं। कई धार्मिक, जातिवादी और अलगाववादी चरमपंथी संगठन इस मीडिया का दुरुपयोग युवाओं को गुमराह करने, उनमें धार्मिक व जातिवादी कट्टरता का बीज बोने में कर रहे हैं।

सोशल मीडिया में महापुरुषों के बारे में आपत्तिजनक और विवादास्पद जानकारियां तथा फेक न्यूज व वीडियो परोसी जा रही हैं। बहरहाल संप्रेषण और सूचना का सबसे बड़ा साधन सोशल मीडिया धर्म और राजनीति के लिए दोधारी तलवार साबित हो रहा है। सोशल मीडिया देश के युवाओं और किशोरों के ‘शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डाल रहा है।

एक शोध के मुताबिक भारतीय युवा अपना 70 फीसदी समय सोशल मीडिया और इलेक्ट्रानिक गैजेट्स को दे रहे हैं जबकि अमरीका में यह आंकड़ा 40 फीसदी है। दूसरी ओर सोशल मीडिया व इंटरनेट क्रांति ने पारिवारिक व सामाजिक ताने-बाने, अंतरंगता और समरसता को छिन्न-भिन्न करने में कोई असर नहीं छोड़ा है।

युवाओं और किशोरों के लगातार सोशल मीडिया एडिक्ट होने का दुष्परिणाम यह हो रहा है कि वे समाज और परिवार से कटने लगे हैं। इन परिस्थितियों का सर्वाधिक खामियाजा परिवार के बुजुर्गाें को उठाना पड़ रहा है। एक ‘शोध के मुताबिक देश के 78 फीसदी बुजुर्गों ने कहा है कि मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट व सोशल मीडिया के चलते उनके बच्चे और नाती-पोते उनकी ओर ध्यान नहीं दे पाते फलस्वरूप वे अपने आप को उपेक्षित और अकेला महसूस करने लगे हैं।

विडंबना है कि इस वर्चुअल वर्ल्ड के जरिए बनने वाले मित्रता, प्रेम प्रसंगों व विवाहेत्तर और अनैतिक संबंधों की अंतिम परिणति तलाक, आत्महत्या, हत्या, अवसाद और नशाखोरी के रूप में सामने आ रही हैं। इन परिस्थितियों में विचारणीय है कि जो माध्यम हमें बिछड़ों से मिलाने में कारगर है आखिरकार वही साधन अपनों से जुदा भी कर रहा है।

बहरहाल भले ही इंटरनेट ने विकास को नए आयाम दिए हों लेकिन सोशल मीडिया का बढ़ता दुष्प्रभाव और बेढंगापन सरकार और समाज के लिए चिंता का विषय है। इन परिस्थितियों में विचारणीय है कि सोशल मीडिया भारतीय लोकतंत्र की ताकत तभी बन सकती है जब इसका उपयोग देश, समाज और व्यक्ति के हित में किया जावे, इसलिए इस दिशा में भारतीय समाज को सजग होना होगा।

(लेखक, शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, रायपुर में सहायक प्राध्यापक हैं।)


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